Israel Palestine Conflict: यह बिडंबना ही है कि जिस होलोकास्ट यानी बहुहत्या के शिकार यहूदी एडोल्फ हिटलर के जमाने में जरमनी, पोलैंड व चेकोस्लोवाकिया में हुए थे, लाखों की संख्या में जिंदा गैसचैंबरों में या गोलियां की बौछारों से मार दिए गए थे, वही यहूदी आज इजराइल से सटे गाजा में फिलिस्तीन के पुराने निकासियों को पूरी तरह मार डालने की साजिश रच रहे हैं.
इस बार का स्वीडन नोबेल पुरस्कार संस्था ने उन नवी पिल्ले को शांति पुरस्कार दिया है जिन्होंने ने गाजा में हुए निहत्थों के नरसंहार की रिपोर्ट बहुत मेहनत से तैयार कर की थी. वे संयुक्त राष्ट्र संघ आयोग की चेयरपर्सन थीं जो पेलेस्टाइन में हुए अपराधों पर रिपोर्ट तैयार करने के लिए बनाया गया था.
इजराइली यहूदी इस से बड़े खफा हैं क्योंकि वे तो यही चाहते हैं कि हिटलर के अत्याचारों की द्वितीय विश्वयुद्ध की कहानियों के पीछे आज के उन के सारे अत्याचार छिप जाएं. जिन यहूदियों को नोबेल पुरस्कार मिला है उन्हें उकसाया जा रहा है कि वे जिस भी क्षेत्र के हों, लौटा दें. अफसोस यह है कि समझदार और तार्किक यहूदी जानते हैं कि कोई आप की एक आंख फोड़े तो आप किसी दूसरे की एक आंख फोड़ दो तो उसे न्याय नहीं कहा जा सकता.
आज की दुनिया शांति पर टिकी है पर अफसोस यह है कि धर्मों पर टिकी सरकारें हर समय बहाने ढूंढ़ती रहती हैं कि कैसे किसी से युद्ध किया जाए. द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका के चर्च ने पूरी तरह लोकतांत्रिक व तार्किक अमेरिका को कोरिया व वियतनाम के युद्धों में धकेल दिया था क्योंकि वहां अनीश्वरवादी कम्युनिज्म आ रहा था और बाद में अफगानिस्तान, इराक, लीबिया के युद्धों में धकेल दिया क्योंकि वहां इसलामी राज था. आजकल ट्रंप यहूदी इजराइल के साथ मिल कर शिया इसलामी ईरान के खिलाफ युद्ध छेड़े हुए हैं.
इन युद्धों में परिवार मरते हैं, घर टूटते हैं, बच्चे दूध के लिए बिलखते हैं. लाखों सैनिक तो मरते ही हैं, उन से ज्यादा आम नागरिक दुख झेलते हैं. कुछ के घरों पर बम गिरते हैं, कुछ गोलियों के शिकार होते हैं तो कुछ सेनाओं के नरसंहार के.
यहूदी इजराइल गाजा और वैस्ट बैंक की मुसलिम आबादियों को बिलकुल समाप्त कर के उस जगह को अपने देश में मिलाना चाहता है और इस के लिए वह हर समय खूंखारी मूड में रहता है.
यह ऐसा ही है जैसा दानवों के छोड़े जाने पर विश्वामित्र का राम को दशरथ से मांग कर ले जाना था और वामन अवतार के विष्णु ने राजा बलि की हत्या की थी. आमतौर पर सेनाओं द्वारा नरसंहार धर्म के इशारे पर किए गए हैं, अपने लोगों की सुरक्षा के लिए नहीं. दुनियाभर में यह भ्रम फैला हुआ है कि सैनिक अपने लोगों की रक्षा करता है. जबकि, हकीकत यह है कि सैनिक तो उन तानाशाहों की रक्षा करता है जो किसी धर्म के आदेश पर चल रहे हैं.
भारतीय मूल की नवी पिल्ले, जो अब 85 वर्ष की हैं, को बधाई कि उन्होंने निहत्थे लोगों की मौतों पर आवाज बुलंद की और शांति का नोबेल पुरस्कार पाया. Israel Palestine Conflict




