Sanatan Yatra: पिछले लोकसभा चुनाव नतीजों ने एक बार फिर साबित कर दिया था कि भाजपा बगैर सवर्ण वोटों के चुनाव नहीं जीत सकती लेकिन कांग्रेस अगर पूरे दमखम से चुनाव लड़े तो बिना सवर्ण वोटों के भी चुनाव जीत सकती है. आंकड़े इस तथ्य की कुछ इस तरह पुष्टि करते हैं.  ये आंकड़े सीएसडीएस यानी सेंटर फार द स्टडी आफ डेवलपिंग सोसाइटीज सहित विभिन्न एजेंसियों के हैं.

1 – 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को लगभग 53 फीसदी और कांग्रेस को महज 14 फीसदी सवर्णों ने वोट दिया था. इस चुनाव में भाजपा को 240 और कांग्रेस को 99 सीटें मिलीं थीं.

2 – 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को 61 फीसदी और कांग्रेस को महज 13 फीसदी के लगभग सवर्ण वोट मिले थे. इस चुनाव में भाजपा को हाहाकारी तरीके से 303 और कांग्रेस को 52 सीटें मिलीं थीं.

3 – 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को करीब 48 फीसदी सवर्णों ने वोट दिया था जबकि कांग्रेस को केवल 13.8 फीसदी सवर्ण वोट मिले थे.. इस चुनाव में भाजपा को पहली दफा रिकार्ड 282 सीटें मिलीं थीं. जबकि एतिहासिक दुर्गति की शिकार कांग्रेस को 44 सीटों से ही तसल्ली करना पड़ी थी..

मेसेज बहुत साफ़ है कि कांग्रेस कितना भी जोर लगा ले अब कभी 20 फीसदी से ज्यादा सवर्ण वोट हासिल नहीं कर सकती. क्योंकि बकौल प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी देश राममय है. वे दशहरे के अपने संबोधन में यह बात न भी कहते तो यह एक स्वयं सिद्ध और स्थापित तथ्य है कि देश वाकई में राममय है और भाजपा घोषित तौर पर राम बालों यानी सवर्णों की पार्टी है. इन्ही मुट्ठी भर सवर्णों के लिए भगवा गैंग मंदिर बनवाती है, धर्म को पोषित करती है. ब्रांडेड बाबाओं से लेकर नुक्कड़ तक के मंदिरों में बैठे पंडे पुजारी उसके प्रचारक हैं जो हिन्दुओं को मुसलमानों का डर दिखाकर नोट और वोट दोनों लूटा करते हैं. इन लोगों का प्रमुख काम नरेन्द्र मोदी को सनातन का रक्षक और राहुल गाँधी व उनके परिवार को सनातन का भक्षक साबित करना है.

ऐसे में कांग्रेस के पास इकलौता रास्ता यही बचता है कि वह अपने परम्परागत वोट बेंक दलित, आदिवासी, पिछड़ों और मुसलमानों पर फोकस करे. इसके लिए उसे किसी रामायण या गीता की नहीं बल्कि 2024 के चुनाव प्रचार की तरह संविधान की दुहाई देते रहना है. अब उसके हक में एक अच्छी बात सीजेपी के प्रोटेस्ट से उपजा माहौल भी है. जिसकी बुनियाद ही भीमराव आम्बेडकर और उनका बनाया संविधान है. बड़ी तादाद में सवर्ण युवतियां की भी सीजेपी के प्रोटेस्टो में सक्रिय भागीदारी निभा रही है.जो धर्म को स्त्री विरोधी और शोषक मानती हैं.

ऐसे में दिग्गज और बुजुर्ग तजुर्बेकार कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह की सत्य सनातन स्वाभिमान यात्रा कतई गैरजरूरी साबित हो रही है. जिसमे जो इने गिने बड़े चेहरे दिखाई दे रहे हैं वे सवर्णों के ही हैं. इक्का दुक्का दलित पिछड़े भी दिख रहे हैं लेकिन उन्हें न तो सत्य से कोई मतलब है न सनातन से और स्वाभिमान तो उनमे भगवा गैंग ने छोड़ा ही नहीं इसीलिए वे कांग्रेस में हैं.

इस यात्रा के जरिए दिग्विजय की मांग है कि राममंदिर के चढ़ावा चोरों को सजा मिले और मंदिरों में आर्थिक पारदर्शिता हो. उज्जैन से शुरू हुई 950 किलोमीटर की यह यात्रा अयोध्या में जाकर समाप्त होगी. यानी व्यक्तिगत उद्देश्य धूमधड़ाके से रामलला के दर्शन कुछ इस तरह करना है कि कोई उदारवादी कांग्रेसी एतराज न जता पाए. वैसे भी ऐसा होना नहीं हैं क्योंकि दिग्विजय सिंह अपनी जमीन खो चुके हैं.

लेकिन जो कुछ भी बचा खुचा समर्थन उनके साथ है वह यात्रा के दौरान जय जय श्रीराम के नारे लगा रहा है पूजा अर्चना कर रहा है. दिग्विजय के साथ चल रहे रथ में रखी राम सीता लक्ष्मण और हनुमान की मूर्तियों की आरती उतार रहा है. कुल जमा यह छोटा सा कारवां शुद्ध धार्मिक है और किसी चल समारोह या शोभा यात्रा सी ही इमेज पेश करता है.

रही बात चढ़ावा चोरी और उसके दोषियों की तो इससे किसी को कोई सरोकार नहीं है. हर सनातनी ने मान लिया है कि चढ़ावे के पैसे पर ब्राह्मण पंडे पुजारियों का हक होता है. जिसे वे जिस तरीके से मुनासिब समझें ले लें, हमे उससे क्या. हमारे धर्म में कहीं नहीं लिखा कि चढ़ाए हुए पैसे का हिसाब भगवान के दूतों से मांगों. हम तो चढ़ाने के बाद सोचते भी नहीं कि यह पैसा कहाँ गया और इसका किसने क्या किया और क्यों भाजपा और भगवा गैंग अपने ही बालों के खिलाफ काररवाई करेंगे. होने के नाम पर जो होना था वह हो चुका है ब्राह्मणों के बजाय यादवों और गैरब्राह्मणों को फसा दिया गया है क्योंकि बकौल मनु स्मृति चढ़ावे पर ब्राह्मणों के अलावा किसी और का हक नहीं होता.

उलट इसके दलित पिछड़े और आदिवासी जरुर सोच सकते हैं और अधिकतर सोच भी रहे हैं कि हमे इस यात्रा से क्या मिलना है. कांग्रेस को भी अगर भाजपा की तरह धरम करम की ही शो बाजी करना है तो उससे अच्छी तो भाजपा है जो 24 X 7 यही करती रहती है.. अगर कांग्रेस को हमारा वोट और समर्थन चाहिए तो उसे तो संविधान पर ही टिके रहना पड़ेगा. जिससे हम बिना किसी धार्मिक डर या नुकसान के उसे वोट कर सकें.

अपनी सनातनी और धार्मिक इमेज सार्वजनिक कर दिग्विजय सिंह दरअसल में कांग्रेस को ही नुकसान पहुंचा रहे हैं. लेकिन कांग्रेस के पास भी सिवाय ख़ामोशी ओढ़े रहने के कोई और रास्ता है नहीं क्योंकि यह पार्टी की यात्रा नहीं है. पर वोटर को यह बात समझाने का भी कोई तरीका उसके पास नहीं. अक्सर दिग्विजय सिंह पर भाजपा की मदद करने के आरोप कांग्रेसी ही लगाते रहे हैं तो यह यात्रा उनकी पुष्टि ही करती है. इस यात्रा से सवर्ण वोटों में इजाफे के तो कोई आसार नहीं लेकिन दलित पिछड़े और मुस्लिम वोटों के कांग्रेस से कटने की आशंका जरुर है. Sanatan Yatra

 

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