Saudi Arabia Death Penalty: 14 अक्टूबर को सऊदी अरब ने नज़रुल इस्लाम और सीती अख्तर को मौत की सजा दे दी. दोनों बांग्लादेशी नागरिक थे. दोनों पर आरोप यह था कि इन्होने मस्जिद में शारीरिक संबंध बनाये. एक गरीब लड़का और लड़की जो बांग्लादेश से सऊदी कमाने गये थे, उन्हें प्रेम करने की कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी. सवाल यह है कि क्या कोई मजहबी इमारत इंसान की जिंदगी से बड़ी हो सकती है?

इस बर्बर हत्याकांड पर सऊदी गृह मंत्रालय का बयान है कि दोनों ने मक्का की एक मस्जिद में अनैतिक काम किया था. अदालत ने दोनों के इस जुर्म को ताज़ीर के तहत मौत की सजा के लायक माना. 14 अक्टूबर को मक्का रीजन में दोनों को फांसी दे दी गई. सऊदी सरकार के बयान में यह तक नहीं लिखा है कि वह कौन सी मस्जिद थी? घटना कब हुई? गिरफ्तारी कब हुई? असली कृत्य क्या था? रिपोर्ट में सिर्फ अनैतिक काम जैसे गोल मोल शब्द लिखे गए हैं. न कोई सीसीटीवी. न कोई सार्वजनिक सबूत. सिर्फ पुलिस ने कहा और अदालत ने मान लिया. यह बेहद तकलीफदेह घटना है. दो इंसानों के प्रेम करने से इस्लाम खतरे में पड़ रहा था इसलिए धर्म को बचाने के लिए दो इंसानों की जान ले ली गई.

बांग्लादेशी मीडिया और नजरुल के परिवार के लोग कह रहे हैं कि मामला सेक्स का नहीं सिर्फ चुम्बन का था. नज़रुल 25 साल का था. वह नवंबर 2022 में क्लीनर का काम करने मक्का गया था. वह अपने परिवार का इकलौता कमाने वाला था. उसके पिता ने कर्ज लेकर उसे सऊदी भेजा था. नजरुल गिरफ्तारी के बाद तीन साल से ज्यादा जेल में रहा. जेल से वह हर रविवार अपनी मां को फोन करता था. 11 अक्टूबर को आखिरी फोन किया था. फिर सरकार ने उसकी जान ले ली. सवाल यह नहीं है कि मस्जिद में क्या हुआ? सवाल यह है कि क्या इसके लिए जान लेना जरूरी था?

सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि आखिर दोनों को अपना पक्ष रखने, वकील की मदद लेने और अपनी भाषा में कार्यवाही समझने का कितना अवसर मिला? क्या मस्जिद में चुम्बन इतना बड़ा अपराध है कि उसकी सजा मौत से नीचे कुछ नहीं? अगर मान लिया जाये कि यह सेक्स ही था तो क्या इस अपराध पर दोनों को मार देना सारी जिज्ञासा और संवेदना खत्म कर सकता है? कोई भी धार्मिक अड्डा जिसे इंसान ने ही बनाया हो क्या वह इंसान की जिंदगी से बढ़कर है? न्याय की कसौटी में दया और सुनवाई की गुंजाईश न हो तो वह न्याय नहीं हो सकता बल्कि यह नफरत होती है.

बांग्लादेश के दूतावास ने कहा कि उन्हें फांसी से पहले बताया तक नहीं गया. बांग्लादेशी एम्बेसी ने बाद में सऊदी विदेश मंत्रालय को नोट भेज कर जानकारी मांगी. अगर बंगलादेशी एम्बेसी को ही पता नहीं कि उनके दो लोगों को मारा जा रहा है तो सोचिये उन दोनों आम नागरिकों को कितना मौका मिला होगा? तीन साल तक जेल में सड़ाने के बाद एक शाही आदेश से गर्दन काट देना इंसाफ तो कतई नहीं है.

शरिया के ताज़ीर कानून के तहत दोनों को मौत की सजा हुई. ताज़ीर का मतलब ही है जज की मर्जी. जिस गुनाह के लिए कुरान या हदीस में सीधे सीधे सजा तय नहीं है वहां एक इस्लामिक मुफ़्ती सजा तय कर सकता है. ताजीर के तहत जज जो चाहे सजा दे सकता है. यह जज चाहे तो चुम्बन पर फांसी दे दे या हाथ पकड़ने पर मौत की सजा तय कर दे. इसमें कोई तय पैमाना नहीं है. कोई दया भी नहीं है. असल में यह कानून नहीं है. बल्कि यह 7वीं सदी की नफ़रत को 2026 में ढोने की मानसिकता ही है.

कोई भी धार्मिक अड्डा चाहे वह मस्जिद हो, मंदिर हो या चर्च हो, इंसान की जान से बड़ा नहीं हो सकता. धर्म को अगर दो गरीब मजदूरों के चुम्बन से खतरा है तो खतरे में धर्म नहीं है बल्कि खतरे में इंसानियत है. जो न्याय व्यवस्था, न्याय, सुनवाई, भाषा और दया को ही जगह न दे वह न्याय नहीं है. वह सिर्फ धर्म की नफरत है जिसे पवित्रता के नाम पर बेचा जा रहा है. नज़रुल का परिवार आज उसकी लाश वापस मांग रहा है. उसकी माँ उसकी मौत की खबर सुन कर हार्ट अटैक से मर गई. एक फैसला, दो लाशें और एक पूरा परिवार बर्बाद. इसी को सऊदी सरकार इस्लामी कानून कह रही है.

सऊदी अरब आज दुनिया को जो अपनी तरक्की दिखाता है कि देखो हमारे पास नियोम है. द लाइन जैसी मेगा सिटी है. बुर्ज से ऊंची इमारतें हैं. रॉकेट है. स्पेस मिशन की तैयारी है. यह सब तेल बेच कर खरीदे हुए इंजीनियरों का कमाल है. अमेरिकी कंपनी डिजाइन देती है. जर्मन कंपनी स्टील देती है. भारतीय और बांग्लादेशी मजदूर वहां अपना पसीना बहाते हैं. पैसे से खरीदी गई तकनीक और खुद ईजाद की गई डेमोक्रेसी में फर्क होता है. उधार की तकनीक से कितना भी तरक्की कर ली जाये जहां न्याय, डेमोक्रेसी और साइंटिफिक सोच न हो वहां बिल्डिंगे तो उंची होती हैं लेकिन इंसानियत पैरों तले रौंदी जाती है. तकनीक की तरह अगर डेमोक्रेसी और न्याय व्यवस्था भी अंग्रेजों से उधार ली गई होती तो आज सऊदी अरब में इस तरह दो प्रेम करने वालों का फैसला शरिया की किताब खोले बैठा एक मुफ़्ती नहीं कर पाता. कंस्टीटूशन चलता, सरिया नहीं.

उधार की तकनीक से इमारत बन सकती है. शहर बन सकता है. रॉकेट भी उड़ सकता है लेकिन लोकतंत्र और इंसाफ पैदा नहीं होता. तकनीक एक प्रोडक्ट है. उसे खरीदा जा सकता है लेकिन लोकतंत्र एक प्रक्रिया है. उसे जीना पड़ता है. न्याय एक संस्कृति है. उसे रोज लड़ कर कमाना पड़ता है. सऊदी अरब ने प्रोडक्ट खरीद लिया. लेकिन प्रक्रिया कभी सीखी ही नहीं.

अगर लोकतंत्र और न्याय भी अंग्रेजों से उधार लिया होता तो आज कहानी अलग होती. भारत का उदाहरण सामने है. यहां पश्चिम से सिर्फ तकनीक ही नहीं ली गई बल्कि डेमोक्रेसी और न्यायव्यवस्था भी ली गई. अगर यही घटना भारत में हुई होती तो पुलिस पकड़ती, एफआईआर होता, केस चलता, मीडिया सवाल पूछती, वकील दलील देता और जज संविधान खोलकर फैसला सुनाता. संविधान कहता है कि सजा अपराध के बराबर होनी चाहिए. अनुच्छेद 21 कहता है जीवन का अधिकार सबसे बड़ा है. नजरुल इस्लाम और सीती अख्तर के जुर्म के लिए ज्यादा से ज्यादा जुर्माना होता या कुछ दिन की सजा होती लेकिन दो प्रेमी जोड़ों की इस तरह कानून के नाम पर जान नहीं ली जाती.

सऊदी अरब में यह हैवानियत हुई क्योंकि वहां संविधान नहीं है. वहां शरिया की किताब है. जिसके तहत फैसले देने का ठेका एक मुफ्ती को दिया गया है जो तय करता है कि मजहब की पवित्रता भंग हुई है या नहीं? पवित्रता भंग हुई है तो गर्दन काट दो. इसमें सवाल नहीं पूछ सकते, तर्क नहीं कर सकते क्योंकि यहां सवाल पूछना ही कुफ्र है. इससे यह साबित होता है कि तेल के पैसे से कितनी भी चमकदार इमारत खड़ी कर ली जाये, जब तक जमीन पर कॉन्स्टिट्यूशन नहीं होगा तब तक यह इमारतें खोखली ही रहेंगी. इन इमारतों में लाइटें जलेंगी लेकिन दिमाग में अंधेरा ही रहेगा. रॉकेट अंतरिक्ष में जाएगा लेकिन सोच सातवीं सदी में ही अटकी रहेगी. Saudi Arabia Death Penalty

और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...