Baba Ramdev Political Decline: 2012 से 14 के बीच का दौर याद करिए, दिल्ली में रामलीला मैदान था, बाबा रामदेव काले धन पर अनशन कर रहे थे, कांग्रेस सरकार के भ्रष्टाचार पर बड़े-बड़े सेमिनार कर रहे थे. रामदेव कह रहे थे कि एक दिन में काला धन वापस लाएंगे, पेट्रोल 35 रुपये हो जाएगा. अरविंद केजरीवाल, अन्ना हजारे और किरण बेदी सब एक ही मंच पर थे. उस वक्त रामदेव का मकसद योग नहीं, सत्ता परिवर्तन था. कैमरे पर वो कांग्रेस के खिलाफ मैदान में खड़े एक संत थे लेकिन कैमरे के पीछे वो बीजेपी के लिए जमीन तैयार कर रहे थे.

2014 से पहले बीजेपी को एक भगवा चेहरे की जरूरत थी जो हिंदुत्व को हेल्थ और स्वदेशी के नाम पर बेच सके और रामदेव को एक राजनीतिक छतरी की जरूरत थी जो उसके बिजनेस को जमीन, लाइसेंस और सुरक्षा दे सके. ये साठगांठ 2014 में खुल कर सामने आया. 2014 में मोदी के शपथ ग्रहण में सबसे आगे चलने वाले रामदेव ही थे. इसके बाद हर सरकारी योग दिवस पर मंच पर रामदेव ही नजर आने लगे और हर चुनाव में बीजेपी के लिए प्रचार करने लगे.

इस तगड़ी चाटुकारिता के लिए रामदेव को इनाम भी तगड़ा मिला. हरिद्वार से लेकर लखनऊ तक हजारों एकड़ जमीन पतंजलि को कौड़ियों के भाव मिली और FSSAI से लेकर आयुष मंत्रालय तक हर जगह पतंजलि के लिए रेड कार्पेट बिछ गया लेकिन 2024 के बाद खेल बदल गया. सुप्रीम कोर्ट ने पतंजलि के भ्रामक विज्ञापनों पर रामदेव को फटकार लगाई, माफी मंगवाई, कोरोनिल घोटाले पर सवाल उठे, सरसों के तेल से लेकर घी तक में मिलावट के आरोप लगे, बृजभूषण शरण सिंह जैसे बीजेपी के ही नेता ने रामदेव को मिलावट का सम्राट तक कह दिया.

तब बीजेपी की कोर टीम ने समझ लिया कि रामदेव अब एसेट नहीं, लायबिलिटी है. आज की बीजेपी को योगी और मोदी जैसे खुद के संत चाहिए, उधार के बाबा नहीं चाहिए. इसलिए पिछले एक साल से आप देखिए, अमित शाह, राजनाथ सिंह और नितिन गडकरी जैसा कोई बड़ा केंद्रीय मंत्री या कोई बड़ा मुख्यमंत्री रामदेव से खुल कर नहीं मिल रहा. फोटो-ऑप बंद है, भाव देना बंद है और यहीं से रामदेव की बेचैनी शुरू हुई है और वह दुर्वासा की नकल करने लगे हैं.

जब राजा भाव नहीं देता तो संत श्राप देने लगता है. रामदेव को सत्ता से पहले जैसी पुचकार नहीं मिल रही तो वह बिलकुल बौखला गये हैं. कभी एलोपैथी को गाली देते हैं, कभी महिलाओं पर टिप्पणी करते हैं, कभी मुसलमानों पर जहर उगलते हैं और कभी भारत जोड़ो यात्रा पर तंज कसते हैं. ये सब उसी बेचैनी का हिस्सा है कि मैं अभी भी सत्ता के लिए उपयोगी हूँ. मुझे मेनस्ट्रीम से अलग मत करो, वरना मैं श्राप दे दूंगा.

पिछले 4 महीने का हिसाब देखिए तो आपको बीजेपी की नई रणनीति समझ आएगी. रामदेव मिले हैं तो किनसे मिले हैं? 21 जून 2026 को योग दिवस पर आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू के साथ विजयवाड़ा में मिले जहां रामदेव ने नायडू को कर्मयोगी कहा. 16 जुलाई और फिर सितंबर में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के साथ हरेला पर्व पर पेड़ लगाने पहुंच गये और 23 सितंबर को बृजभूषण शरण सिंह से सुलह करने के लिए दिल्ली पहुंच गये. यह सारे चेहरे कौन हैं? ये बीजेपी की कोर टीम नहीं है बल्कि यह परिधि के बाहर वाले मुख्यमंत्री हैं. यह वो छोटे राज्यों के मुख्यमंत्री हैं जिन्हें पतंजलि की फैक्ट्री, जमीन और योग टूरिज्म का लालच है. उत्तराखंड में पतंजलि का सबसे बड़ा बेस है, हरिद्वार में हजारों करोड़ का साम्राज्य है इसलिए धामी से मिलना रामदेव की मजबूरी है. आंध्र में नायडू को योग और आयुर्वेद वाला टूरिज्म चाहिए इसलिए उन्हें रामदेव की जरूरत पड़ी.

रामदेव की इस उलटबांसी के बीच दिल्ली दरबार खामोश है. यह ख़ामोशी संकेत है कि बीजेपी रामदेव को किनारे धकेल रही है लेकिन धीरे-धीरे, झटके से नहीं. बीजेपी को पता है कि रामदेव के पास अभी भी 10 करोड़ व्हाट्सएप फॉलोअर, 5000 स्टोर और गांव-गांव में हिंदू प्रचारकों का मजबूत नेटवर्क है. फिलहाल उसे एकदम दुश्मन बनाना नुकसानदेह है इसलिए तरीका ये है कि बाबा को छोटा करते जाओ, उन्हें इतना छोटा कर दो कि वह राष्ट्रीय मंच से गायब होकर राज्य स्तर का बाबा बन कर रह जाएं.

बीजेपी का रामदेव से पीछा छुड़ाने का दूसरा कारण और भी बड़ा है. बीजेपी को अब रामदेव की जरुरत ही नहीं है. 2014 में बीजेपी को पतंजलि के स्वदेशी का नारा चाहिए था, आज बीजेपी के पास खुद वोकल फॉर लोकल है. 2014 में बीजेपी को रामदेव का हिंदुत्व चाहिए था, आज बीजेपी के पास खुद योगी, हिमंता, मोहन यादव जैसे दर्जनों हिंदुत्व के चेहरे हैं. 2014 में बीजेपी को रामदेव के मंच से काला धन का जुमला चाहिए था, आज बीजेपी खुद ईडी, सीबीआई से विपक्ष को डराती है. जब दुकान खुद चलने लगे तो दलाल की जरूरत खत्म हो जाती है.

रामदेव का राजनीतिक पतन नजदीक है, ये सच है, और इसीलिए वो बेचैन है. बेचैनी इस बात की नहीं है कि पतंजलि का घी नहीं बिक रहा बल्कि बेचैनी इस बात की ज्यादा है कि अब सत्ता के गलियारे में उनकी कुर्सी नहीं लग रही. 2014 से 2019 तक रामदेव राजगुरु थे, 2019 से 2024 तक वो व्यापारी गुरु बन गये लेकिन 2024 के बाद उनकी राजनैतिक पकड़ और अकड़ नीचे चली गई.

दुर्वासा की नकल वही करता है जिसे डर हो कि उसके श्राप से भी अब कोई नहीं डरेगा. रामदेव आज उसी मोड़ पर खड़े है. बीजेपी ने उन्हें इस्तेमाल किया, अमीर बनाया और अब अपने इसी एहसान को रामदेव की कमजोरी बना कर उनसे किनारा कर लिया है. वैसे राजनीति का पुराना नियम है, दुर्वासा और रामदेव जैसे संत सत्ता के लिए झूठ का माहौल खड़ा तो करते हैं लेकिन बाद में सत्ता इन जैसे संतों को पालती नहीं बल्कि उनका इस्तेमाल कर उन्हें किनारे कर देती है.

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