Women Rights in India: त्योहारों का सीजन आते ही हर घर में एक ही तस्वीर नजर आती है. पति ऑफिस जाएगा, बच्चे फोन पर रील देखेंगे और औरत सुबह चार बजे उठ कर व्रत की तैयारी करेगी, दिन भर भूखी रहेगी, सबके लिए पकवान बनाएगी, करवा चौथ की कथा सुनेगी और पति की लंबी उम्र के लिए चांद देखेगी. दीवाली पर भी यही तमाशा. औरत घर लीपेगी, रंगोली बनाएगी, लक्ष्मी गणेश की मूर्ति लाएगी, दिया जलाएगी और रात को सबके खाने के बाद बचा हुआ खाएगी. इसे त्योहार कहते हैं लेकिन सवाल यह है कि यह किसका त्योहार है? औरत का या गैरबराबरी के साथ औरत की भूख और थकान पर टिका मर्द का?
त्योहारों का सीजन शुरू हो चुका है. ज्यादातर त्योहारों पर धर्म की मुहर चिपकी हुई है. हर त्यौहार पर एक धार्मिक कहानी जोड़ दी गई है इसलिए लगभग सभी त्योहारों में धर्म की भेदभाव और गैरबराबरी वाली सोच हावी रहती है. कारवा चौथ पर पति को पूजो, दीवाली पर लक्ष्मी गणेश को पूजो. ईद पर घर के मर्दों के लिए पकवान बनाओ. औरतें पूजा, रोजा और व्रत में लगीं रहें, दिन भर भूखी रहें, घर को सजाये, पकवान भी बनायें और मर्द सोफे पर बैठे मोबाइल में लगे रहें, पूरी रात जुआ खेलें, दारू पिए और दोस्तों संग घूमें. यह भेदभाव नहीं तो और क्या है? सारे त्योहारों में ऐसा ही होता है. संविधान औरतों को बराबरी का हक देता है लेकिन त्योहारों पर जेंडर इक्वेलिटी की बात बेमानी लगती है और त्यौहार औरतों पर बोझ बन जाते हैं.
लगभग हर त्योहार पर धर्म की मुहर चिपकी हुई है और हर त्योहार पर कोई न कोई भगवान की कहानी जोड़ दी गई है. औरत व्रत रखे, औरत भूखी रहे, औरत सजाए, औरत पकवान बनाए और मर्द भगवान बन कर अपनी पूजा का आनंद लेता रहे. ये भेदभाव नहीं तो और क्या है?
त्योहारों पर भेदभाव क्यों बढ़ जाता है?
अब आंकड़ों से देखिए कि त्योहारों पर ये भेदभाव कैसे बढ़ जाता है? करवा चौथ पर व्रत सिर्फ औरत रखती है पति के लिए, पति औरत के लिए व्रत नहीं रखता, कथा भी वही है कि सावित्री ने यमराज से पति को वापस ले लिया, वीरवती ने व्रत तोड़ा तो पति मर गया, कहानी का मोरल यही है कि पति भगवान है उसे पूजो.
नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे कहता है कि भारत में पैंतीस प्रतिशत औरतें खुद के लिए अकेले बाजार तक नहीं जा सकतीं लेकिन अस्सी प्रतिशत औरतें करवा चौथ का व्रत रखती हैं, यानी औरतों को बाजार जाने तक की आजादी नहीं है लेकिन उस पर व्रत का संस्कार जरूर थोपा गया है. ऑक्सफैम इंडिया की टाइम यूज सर्वे रिपोर्ट कहती है कि भारतीय औरतें रोजाना औसतन पांच से छह घंटे अनपेड केयर वर्क करती हैं. खाना, सफाई, पूजा की तैयारी यह सब काम औरतें ही करती हैं. त्योहारों पर ये आठ से दस घंटे हो जाता है और यही घरेलु काम मर्द सिर्फ छत्तीस मिनट करते हैं. एनएसएसओ के मुताबिक दीवाली के हफ्ते में औरतों का अनपेड वर्क तीस प्रतिशत बढ़ जाता है.
दीवाली पर लक्ष्मी को धन की देवी मानकर पूजा जाता है लेकिन इसी लक्ष्मी के देश में औरतें संपत्ति से आज भी बेदखल हैं. एग्रीकल्चर सेंसस के मुताबिक सिर्फ तेरह दशमलव नौ प्रतिशत जमीन महिलाओं के नाम पर है, लक्ष्मी की मूर्ति हर घर में है लेकिन लक्ष्मी रखने का हक औरत के पास नहीं है. भूख का भी जेंडर है. करवा चौथ, तीज, वट सावित्री, जितिया सब में औरत भूखी रहती है, विश्व स्वास्थ्य संगठन कहता है भारत में पंद्रह से उनचास साल की सत्तावन प्रतिशत औरतें एनीमिक हैं, भूखी रहने को संस्कार बताया जाता है लेकिन असल में तो यह कुपोषण का ही धार्मिक रूप है.
धर्म ने बनाया औरतों को गुलाम
मनुस्मृति में साफ लिखा है “पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने रक्षन्ति स्थविरे पुत्रा न स्त्री स्वातंत्र्यमर्हति. अर्थ है बचपन में पिता रक्षा करे, जवानी में पति, बुढ़ापे में पुत्र क्योंकि स्त्री स्वतंत्रता के योग्य नहीं है. इसी मनुस्मृति के दूसरे अध्याय में लिखा है कि औरत पुरुष को मोहित करने वाली होती हैं इसलिए उसे काबू में रखना जरूरी है. रामचरितमानस की एक चौपाई है ढोल गंवार शूद्र पशु नारी सकल ताड़ना के अधिकारी, तुलसीदास के इस इस दोहे का इस्तेमाल औरत को पीटने के जस्टिफिकेशन के तौर पर सदियों तक हुआ है.
कुरान में सूरा निसा की चौंतीसवीं आयत में लिखा है कि मर्द औरतों के ऊपर कव्वाम हैं अगर औरतें अपनी मर्जी चलाएं तो उन्हें पीटो. इसी सूरा की पंद्रहवी आयत में औरत को घर में बंद कर मारने तक की बात है जिसकी मॉडर्न इस्लामिक फेमिनिस्ट स्कॉलर्स जैसे आमिना वदूद ने कड़ी आलोचना की है और कहा है कि ये सातवीं सदी के अरब कबीलाई समाज का प्रोडक्ट है खुदा का नहीं.
हदीसों में भी औरत के टेढ़ी पसली से बनी होने की बातें मिलती हैं. बाइबिल के पहले तीमुथियुस अध्याय दो वचन बारह में लिखा है कि मैं औरत को सिखाने या मर्द पर अधिकार चलाने की इजाजत नहीं देता, लेविटिकस में पीरियड्स के दौरान औरत को अपवित्र माना गया है. बात किसी एक धर्म की नहीं है, लगभग सभी धर्मों में औरत की जगह घर, पर्दा, व्रत और सहनशीलता में तय की गई है क्योंकि धर्म की किताबें उस समय लिखी गईं जब औरत की कोई प्रॉपर्टी नहीं थी, वोट नहीं था, नौकरी नहीं थी. तमाम धार्मिक किताबों में औरतों को सिर्फ वस्तु की तरह देखा गया है, वह घर में रहे, शादी से पहले बाप की मर्जी से जिए और शादी के बाद पति और ससुराल की गुलाम बन कर जिए. यही औरतों का धर्म था.
धर्म बनाम संविधान
त्योहारों पर बीस हजार की साड़ी, सोने की अंगूठी और मेहंदी के शगुन और उसके श्रृंगार से औरत की गरिमा तय नहीं होती. यह तो गुलामी को मजबूत करने की सुविधाएं हैं जिन्हें संस्कार की आड़ में औरतों पर लादा गया है. इसमें बराबरी की बात नहीं है. रथ में जुतने वाले पालतू घोड़े को खूब सजाया जाता है, महंगे लगाम पहनाये जाते हैं, पैरों में नाल ठोकी जाती है और पीठ पर महंगा लबादा डाल दिया जाता है. यह आजादी नहीं बल्कि गुलामी को खूबसूरत बनाने की मशक्कत होती हैं. औरतों के साथ यह हजारों साल से होता आया है.
इतिहास में पहली बार संविधान ने कहा कि औरत और मर्द बराबर हैं. धर्म ने तीन हजार साल में जो नहीं दिया संविधान ने 1950 में एक लाइन में दे दिया. संविधान का अनुच्छेद 14 कहता है राज्य का हर नागरिक कानून के सामने बराबर हैं. अनुच्छेद 15(1) कहता है कि राज्य लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं करेगा, अनुच्छेद 15(3) कहता है कि राज्य औरतों के लिए विशेष प्रावधान बना सकता है, अनुच्छेद 16 कहता है कि औरत को नौकरी में बराबर का मौका मिलेगा.
संविधान का नज़रिया एकदम साफ है. औरत बाप की प्रॉपर्टी नहीं, पति की गुलाम नहीं बल्कि बराबर की नागरिक है. हिंदू उत्तराधिकार संशोधन कानून 2005 ने बेटी को बाप की प्रॉपर्टी में बराबर का हक दिया, मुस्लिम पर्सनल लॉ में भी शाहबानो केस के बाद से बहस शुरू हुई जिससे मुस्लिम औरतों को तीन तलाक जैसी कुप्रथाओं से मुक्ति मिली. औरतों को यह अधिकार धर्म से नहीं संविधान से हासिल हुआ. वहीं तमाम धार्मिक किताबों में औरतों को सिर्फ वस्तु की तरह देखा गया है. सदियों तक धर्म ने औरतों को मर्दों के पाँव तले दबा कर रखा लेकिन इतिहास में पहली बार संविधान में लिखा गया कि औरत और मर्द बराबर है.
त्योहारों के नाम पर पतियों को पूजने की परंपरा चलती है जिसमें औरत की गुलामी को संस्कार माना जाता है. असल में धर्म औरतों की गरिमा ही इस बात में देखता है कि वह अपने पिता, पति और परिवार के लिए कितनी आज्ञाकारी है? लेकिन संविधान के अनुच्छेद इक्कीस में औरत की गरिमा का मतलब उसकी व्यक्तिगत पहचान से है और हर इंडिविजुअल की गरिमा इस बात में है की उसे सम्मान और अवसरों में बराबरी हासिल है या नहीं.
संविधान कहता है बराबर काम का बराबर पैसा लेकिन धर्म ने त्योहार को रिचुअल बनाया जिसमें व्रत कथा और पकवान के नाम पर सारा बोझ औरतों पर डाल दिया. त्योहारों पर दीया जलाना बुरा नहीं है लेकिन दीया सिर्फ औरत ही जलाए, तेल सिर्फ औरत ही लाए और अंधेरा सिर्फ औरत के हिस्से में ही आए, यह बुरा है. दीवाली मनानी है तो लक्ष्मी की मूर्ति के साथ साथ जमीन के कागज पर भी औरत का नाम लिखिए, करवा चौथ मनाना है तो पति भी भूखा रहे या दोनों मिल कर खाना खाएं. इसमें क्या गलत है? ऐसे त्यौहार जो औरतों की बराबरी को खत्म करे, उन्हें त्याग की मूरत बना कर सारा बोझ उनके सर पर डाल दें, असल में यह त्यौहार नहीं बल्कि भूख, थकान और मुफ्त की मजदूरी का जश्न ही है.
त्योहार किसके हैं?
धर्म ने औरत को कभी इंसान माना ही नहीं. वह जीती जागती सामान थी. ऐसा सामान जिसपर कंट्रोल हमेशा पितृसत्ता का रहा. बेटी, बहन, पत्नी, माँ और बहू जैसे रिश्ते में बंधकर भी औरत वस्तु ही रही और हर त्योहार इसी रिश्ते को पूजता है, औरत को नहीं. रक्षाबंधन पर बहन भाई को राखी बांधती है और भाई उसकी रक्षा का वादा करता है. सवाल ये है कि बहन को रक्षा की जरूरत क्यों है? क्योंकि धर्म ने ही बाहर की दुनिया को खतरनाक बनाया है और फिर उसी खतरे से बचाने के नाम पर भाई को भगवान बना दिया. एनसीआरबी का डेटा कहता है कि महिलाओं के खिलाफ होने वाले 70 परसेंट से ज्यादा अपराध घर के अंदर होते हैं, जहां वही भाई, वही पति, वही पिता मौजूद होता है. घर में ही लड़कियां सुरक्षित नहीं है और धर्म चाहता है कि बाहर वालों के लिए औरत पत्थर की देवी बनी रहे. देवी पत्थर की है तो सुरक्षित है लेकिन बेटी जिंदा है तो खतरा है.
भाई दूज पर भी वही कहानी दोहराई जाती है. यम ने यमुना को वरदान दिया कि इस दिन अगर बहन भाई की लंबी उम्र मांगे तो वह पूरी हो जाती है. सवाल यह है कि क्या कभी भाई ने बहन की लंबी उम्र मांगी है? कभी किसी कथा में पति ने पत्नी के लिए व्रत रखा है कि पत्नी लम्बी आयु जिए? नहीं. क्योंकि धर्म की पूरी इकॉनमी ही इस बात पर टिकी है कि औरत देगी और मर्द लेगा. औरत व्रत देगी, मर्द उम्र लेगा. औरत सेवा देगी, मर्द आशीर्वाद देगा.
होली के गीतों में क्या है? रंगों के नाम पर औरतों के खिलाफ फूहड़ गाने चलते हैं. कीचड़ में औरत को खींच कर रंग लगाया जाता है, भाभी को रंग लगाने का अधिकार समझा जाता है. मथुरा-वृंदावन की होली को कल्चर कहते हैं लेकिन क्या उस होली में औरत की सहमति पूछी जाती है? जबरन रंग लगाना त्योहार है या उत्पीड़न? नेशनल कमीशन फॉर वीमेन की रिपोर्ट के अनुसार हर साल होली के आसपास छेड़छाड़ के मामले 20 परसेंट तक बढ़ जाते हैं लेकिन धर्म कहता है, बुरा न मानो होली है.
त्योहारों पर चलने वाला यह सिर्फ भावना का खेल नहीं है, ये बाजार का खेल भी है. धर्म ने संस्कार का ढोंग पैदा किया और बाजार ने उसी ढोंग को कमाई का साधन बना दिया. एसोचैम की रिपोर्ट कहती है कि हर साल सिर्फ करवाचौथ पर ही 15 से 20 हजार करोड़ का कारोबार होता है. यह पैसा साड़ी, ज्वेलरी, मेहंदी, गिफ्ट और ब्यूटी पार्लर के नाम पर खर्च होता है. असल में यह पैसा औरत की ही सेविंग का होता है और वह यह पैसा अपने पति की लम्बी उम्र के नाम पर खर्च कर देती है. फायदा किसे होता है? बाजार को, जो मर्द चलाते हैं. लक्ष्मी के नाम पर दीवाली में जो सोना खरीदा जाता है यह सोना मर्द के पैसे से औरत के नाम पर खरीदा जाता है लेकिन लॉकर की चाबी मर्द के पास ही रहती है. वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के अनुसार भारत में 22 हजार टन सोना घरों में गहने के रूप में है और यह गहना 85 परसेंट औरतें ही पहनती हैं लेकिन सवाल यह है कि इन गहनों पर मालिकाना हक कितनी औरतों के पास है?
संविधान ने दी ताकत
संविधान ने औरत को पहली बार बाजार से निकाला और नागरिक बनाया. हिंदू मैरिज एक्ट 1955 से पहले पति चाहे जितनी शादी कर सकता था, धर्म इसकी इजाजत देता था. संविधान ने इस घटिया प्रथा को अपराध घोषित किया और एक मर्द बराबर एक औरत का कॉन्सेप्ट दिया. धर्म में तलाक पाप था लेकिन संविधान ने इस पाप से भी मुक्ति दिलाई जिसका सबसे बड़ा लाभ औरतों को मिला. धर्म की व्यवस्था में सिर्फ औरत के लिए शादी सात जन्मों का बंधन थी. मर्द तो कई शादियां कर कर सकता. संविधान की बदौलत ही औरतो के लिए जन्मजन्मांतर के इस फालतू रिश्ते से निकलना आसान हो गया. विधवा का सिर मुंडवा देना धर्म था लेकिन संविधान ने उसी विधवा की दोबारा शादी और पेंशन देने की व्यवस्था की.
एक और बड़ा फर्क है. धर्म कहता है पाप करो तो अगले जन्म में औरत बनोगे, मतलब यह कि औरत बनना सजा है. गरुड़ पुराण में लिखा है कि पापी आदमी अगले जन्म में स्त्री योनि में जन्म लेता है. इस तरह धर्म ने तो औरत होना ही सजा बना दिया. संविधान कहता है औरत होना सजा नहीं, पॉवर है. पंचायत में 50 फीसदी रिजर्वेशन और लोकसभा में 33 फीसदी रिजर्वेशन की बात इसी पॉवर का रिजल्ट है. यह धर्म ने नहीं, संविधान ने सोचा.
जब अगली बार कोई कहे कि त्योहार तो संस्कृति हैं तो पूछिए किसकी संस्कृति? जो संस्कृति औरत को भूखा रख कर खुश होती है, जो संस्कृति औरत के हाथ में मेहंदी लगा कर उसके हाथ से कलम छीन लेती है, जो संस्कृति औरत को लक्ष्मी कह कर उसकी जेब खाली रखती है, असल में वह संस्कृति नहीं, शोषण है. असली त्योहार वो होगा जिस दिन रक्षाबंधन पर भाई बोलेगा बहन तू नौकरी कर मैं घर संभालता हूं, जिस दिन करवा चौथ पर पति बोलेगा चलो दोनों मिलकर खाना बनाते हैं और दोनों मिलकर चाँद देखते हैं, जिस दिन दीवाली पर लक्ष्मी की मूर्ति के साथ बेटी के नाम की एफडी का कागज भी रखा जाएगा. ऐसा जब तक नहीं होगा तब तक हर त्योहार एक रिमाइंडर है कि धर्म अभी भी चल रहा है और संविधान अभी भी सिर्फ किताब में है.
ईद, रमजान और औरत
हिंदू त्योहारों की तरह इस्लाम के त्योहारों में भी नेकियों का हिसाब औरत के जिस्म और उसकी मौजूदगी से तय होता है. रमजान का महीना इबादत का महीना कहा जाता है लेकिन घर में इसका बोझ सिर्फ औरतों पर होता है? तीन बजे सुबह उठकर सहरी औरत ही बनाती है. शाम को इफ्तारी में दस तरह के पकवान भी औरत ही बनाती है. दिन भर रोजा रख कर भी औरत किचन में खड़ी रहती है. रोजा मर्द का भी है लेकिन इफ्तारी की जिम्मेदारी औरत की है. कई घरों में औरत खुद रोजे से रहती है फिर भी उसे चूल्हे के सामने खड़े हो कर सबके लिए खाना बनाना पड़ता है, रोजा की भूख अलग और किचन की गर्मी अलग.
ईद पर नई टोपी, नया कुर्ता मर्द के लिए सिलाया जाता और औरत को नया बुर्का गिफ्ट में दिया जाता है. ईद की नमाज की सफ़े सिर्फ मर्दो से भरी होती हैं. मस्जिदों में औरतों के लिए कोई जगह ही नहीं. भारत में सिर्फ 8 से 10 प्रतिशत मस्जिदों में औरतों के नमाज की जगह है. ईदगाह में हजारों मर्द नमाज पढ़ते हैं, औरत घर में रह कर सेवइयां बनाती है. ईद मिलन में मर्द गले मिलते हैं, औरतें अंदर कमरे में एक दूसरे से मिलती हैं. ईद का बाजार भी मर्द का है, बकरीद पर बकरा मर्द खरीदता है, कुर्बानी मर्द देता है, गोश्त के तीन हिस्से का फैसला भी मर्द करता है.
यहाँ भी कहानी वही है जो करवा चौथ में थी. शब-ए-बारात पर औरतें रात भर जाग कर हलवा बनाती हैं, मर्द कब्रिस्तान जा कर दुआ मांग आता है. मोहर्रम पर मर्द ताजिया उठाता है, मातम करता है, औरत घर में बैठ कर रोती है. जुमे की नमाज, ईद की नमाज, जनाजे की नमाज सब में औरत की गैर मौजूदगी ही मजहब है.
निकाह में मेहर औरत का हक है लेकिन कितनी औरतों को मेहर का पैसा सच में मिलता है? कई जगह मेहर 786 रुपये या एक कुरान की किताब रख दी जाती है, जो सिर्फ कागज पर ही लिखा रह जाता है. कड़वा सच यह है कि तलाक का हक एक तरफा मर्द के हाथ में रहता है. हलाला जैसी प्रथा में औरत को फिर से एक और निकाह से गुजरना पड़ता है ताकि पहले पति से फिर निकाह कर सके. ये सब त्योहारों की तरह ही है, इनमें औरत की मर्जी की कोई गुंजाईश ही नहीं, इस्लाम में तो मर्द की मर्जी से औरत की जिंदगी तय होती है.
बुर्का और पर्दे को भी त्योहार के लिबास की तरह पेश किया जाता है. ईद पर नया बुर्का पहनो, शराफत दिखेगी. यह बुर्का किसके लिए है? मर्द की नजर से बचने के लिए. यानी औरत का कपड़ा भी मर्द की नजर तय करेगी. गर्मी में पचास डिग्री में भी औरत काले बुर्के में रहे ताकि मर्द की नियत पाक रहे. ये भी वही सोच है जो करवा चौथ पर औरत को भूखा रखती है ताकि पति की उम्र बढ़े, दोनों में औरत का जिस्म मर्द की नियत और मर्द की उम्र के लिए कुर्बान होता है इसीलिए धर्म कोई भी हो, गैरबराबरी का पैटर्न एक ही है. हिंदू धर्म में औरत को व्रत में भूखा रखा गया, इस्लाम में औरत को त्योहार में अदृश्य कर दिया गया. एक में औरत दिखती है पर सिर्फ सजी हुई, भूखी, थकी हुई. दूसरे में औरत दिखती ही नहीं, वो किचन में है, पर्दे में है, घर में है. दोनों में मर्द सेंटर में है.
संविधान ने इसीलिए धर्म से अलग रास्ता दिया. संविधान कहता है कि हर मामले में औरत का हक बराबर है. संविधान कहता है तीन तलाक असंवैधानिक है, सुप्रीम कोर्ट ने 2017 में इसे खत्म किया, यह हक कुरान से नहीं संविधान से मिला. संविधान कहता है मेहर भीख नहीं हक है, औरत की प्रॉपर्टी है. मुस्लिम औरतों को भी पैतृक संपत्ति में हक मिलना चाहिए, ये बात ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड नहीं, संविधान की बराबरी की सोच कहती है.
त्योहार अगर सच में खुशी का है तो वो औरत के लिए भी होना चाहिए. ईद की सेवइयां सिर्फ औरत क्यों बनाए, मर्द क्यों नहीं बनाए? रमजान में सहरी का खाना मर्द क्यों नहीं बनाए? ईदगाह में औरतों के लिए जगह क्यों नहीं है? जब तक इन सवालों का जवाब नहीं मिलेगा तब तक ईद भी औरत के लिए सिर्फ किचन का त्योहार रहेगी, जैसे दीवाली हिंदू औरत के लिए झाड़ू-पोछे का त्योहार है.
धर्म को निकालना क्यों जरुरी?
क्या त्योहार मनाना बंद कर दें? नहीं. त्योहार इंसान की जरूरत हैं, मेलमिलाप, मिलकर खाना, हंसना, छुट्टी लेना, एन्जॉय करना यह ख़ुशी त्योहारों की बदौलत ही मिलती है. दिक्कत त्योहार से नहीं, त्योहार के अंदर बैठे धर्म से है इसलिए अब धर्म को त्योहार से निकाल कर संविधान को डालने का वक्त है. धर्म को निकालने का मतलब है की इसे सेकुलर और डेमोक्रेटिक बनाया जाये और धर्म की कहानियों को बदला जाये.
वीरवती ने व्रत तोड़ा तो पति मर गया, करवाचौथ की कहानी से यह डर निकाल दीजिये. इसकी जगह नई कहानी लिखिए कि वीरवती ने पढ़ाई की और डॉक्टर बन गई. वट सावित्री में सावित्री ने यमराज से पति को वापस लिया, ये ठीक है लेकिन अब सावित्री यमराज से अपनी खुद की जिंदगी भी मांगे. रक्षाबंधन पर भाई रक्षा करेगा, ये वादा हटा दीजिये. अब नया वादा लिखिए कि भाई-बहन दोनों एक दूसरे की बराबरी से रक्षा करेंगे, दोनों कमाएंगे, दोनों घर संभालेंगे. ईद पर सिर्फ मर्द कुर्बानी देगा इसमें से कुर्बानी वाली कहानी से धर्म को अलग कर दीजिये. कुर्बानी का मतलब बकरा काटना नहीं, अपनी मर्दानगी की अकड़ काटना होना चाहिए. हिजाब के पीछे की कहानी को बदलिए और औरत को बुर्के में ढंकने की बजाय मर्द को तमीज सिखाइये.
संविधान के आधार पर त्योहार मनाने का मतलब है तीन चीजें लागू की जाएँ. पहला, सहमति. बिना सहमति का रंग उत्पीड़न है, त्योहार नहीं. दूसरा, बराबर काम. दीवाली की सफाई सिर्फ औरत नहीं करेगी, मर्द भी करेगा. रमजान की सहरी और ईद की सेवइयां सिर्फ औरत नहीं बनाएगी, मर्द भी बनाएगा. तीसरा, बराबर पैसा. करवा चौथ पर बीस हजार की साड़ी के साथ बीस हजार की किताब भी आनी चाहिए, दीवाली पर सोने के साथ बेटी के नाम की जमीन का कागज भी आना चाहिए, बकरीद पर गोश्त के साथ मेहर का पैसा भी औरत के हाथ में आना चाहिए.
यह कदम महज छोटे बदलाव नहीं बल्कि क्रांति साबित होंगे क्योंकि जब त्योहार की कहानी से धर्म बाहर होगा तब अगली पीढ़ी की सोच बदलेगी. बेटी देखेगी की त्योहारों पर माँ भूखी नहीं है, माँ भी खाना खा रही है तो बेटी सीखेगी कि भूखा रहना संस्कार नहीं है. जब बेटा देखेगा कि बाप भी झाड़ू लगा रहा है तो बेटा सीखेगा कि झाड़ू सिर्फ औरत का काम नहीं है.
संविधान ने हमें यही सिखाया है. अनुच्छेद 51A भारत के सभी नागरिकों से कहता है कि वैज्ञानिक सोच रखो और परंपराओं में लगातार सुधार करो. यह सुधार त्योहारों में भी क्यों न हो? तो आइये इस साल से एक नया नियम बनायें. हर त्योहार से पहले घर में एक बैठक हो जिसमें यह सवाल उठाये जाएँ कि इस त्योहार में कौन भूखा रहेगा? कौन थकेगा? कौन कमरे में रहेगा? कौन बाहर जाएगा? कौन पैसा खर्च करेगा? कौन पैसा रखेगा? अगर जवाब में हर बार औरत ही आ रही है तो समझिए की यह धर्म वाला त्योहार है. इसे वहीं रोक दीजिये और संविधान वाला त्योहार बनाइये जहां मर्द और औरत मिलकर किचन संभालेंगे, साफ सफाई भी दोनों मिलकर करेंगे, सब मिलकर एन्जॉय करेंगे, सब बाहर जाएंगे और पैसा भी सबका बराबर खर्च होगा. त्योहारों से धर्म निकल जाएगा तो त्योहार खत्म नहीं होंगे बल्कि और ज्यादा बड़े और खूबसूरत हो जायेंगे क्योंकि तब त्यौहार सिर्फ आधे लोग नहीं बल्कि पूरे लोग मनाएंगे. Women Rights in India




