Youth Unemployment Crisis: 23 अगस्त को मोदी सरकार के नीति आयोग ने जो रिपोर्ट जारी की है, वह देश की नकली व बनावटी अर्थव्यवस्था की चमकदार तसवीर के पीछे छिपी एक दूसरी ही हकीकत दिखाती है. रिपोर्ट के मुताबिक, देश की करीब 45 फीसदी आबादी मजदूरी कर के अपना जीवन किसी तरह खींचतान कर चला रही है. इन में बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जिन्हें सालभर नियमित काम नहीं मिलता. करीब 20 फीसदी से ज्यादा लोग दिहाड़ी मजदूर हैं जिन्हें महीने के पूरे 30 दिन काम मिलना जरूरी नहीं है. उन की दिहाड़ी शहर और गांव के अनुसार 300 रुपए से ले कर 700 रुपए प्रतिदिन तक होती है. इस में उतने दिन का पैसा मिलता है जितने दिन काम कराया जाता है.
यानी, देश की बड़ी आबादी के सामने आज भी सब से बड़ा सवाल यह है कि अगले महीने घर का चूल्हा कैसे जलेगा?
रिपोर्ट का एक और आंकड़ा बेहद चिंताजनक है. देश में 15 से 29 साल की उम्र के करीब 8 करोड़ 70 लाख नौजवान ऐसे हैं जो न पढ़ रहे हैं, न नौकरी कर रहे हैं और न ही किसी तरह की ट्रेनिंग ले रहे हैं. यह संख्या किसी भी देश के लिए खतरे की घंटी होनी चाहिए. जिस देश की सब से बड़ी ताकत उस की युवा आबादी को बताया जाता है, अगर उसी देश के करोड़ों नौजवान शिक्षा, रोजगार और कौशल से बाहर खड़े हैं तो उसे जनसांख्यिकीय लाभ कैसे कहा जा सकता है?
इसे जनसांख्यिकीय लाभांश यानी ‘डैमोग्राफिक डिविडैंड’ कहने के बजाय ‘डैमोग्राफिक डिजास्टर’ कहना ज्यादा ठीक होगा. सब से बड़ी समस्या यह है कि देश में नियमित वेतन वाली नौकरी करने वालों की संख्या बेहद कम है. नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक केवल 21.7 फीसदी लोग ही नियमित वेतन वाली नौकरी में हैं. बाकी आबादी का बड़ा हिस्सा या तो असंगठित क्षेत्र में काम करता है, दिहाड़ी पर निर्भर है या अपना छोटामोटा काम कर के किसी तरह परिवार चला रहा है.
ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जिस देश में करोड़ों लोगों के पास स्थाई रोजगार नहीं है, वहां विकास की वह मंजिल कैसे हासिल होगी जिस की तसवीर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बारबार देश के सामने पेश करते हैं?
सरकार के आंकड़ों के मुताबिक करीब 81.5 करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज दिया जा रहा है. सरकार इसे अपनी बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश करती है. यह एक मूर्ख का छाती पीटना है जो कभी कमीज दिखाने के लिए पूरे गांव में घूमता है. निश्चित रूप से भूखे व्यक्ति को भोजन मिलना जरूरी है लेकिन यह सवाल भी उतना ही जरूरी है कि आजादी के 80 साल बाद भी 80 करोड़ लोगों को ऐसी स्थिति में क्यों रहना पड़ रहा है कि उन्हें जीवन चलाने के लिए सरकारी मुफ्त अनाज पर निर्भर होना पड़े? कितनी हैरानी की बात है कि 80 करोड़ लोग अपनी दो वक्त की रोटी खुद नहीं जुटा पा रहे हैं? दूसरी हैरानी की बात यह है कि देश इतना अन्न आसानी से पैदा कर पा रहा है कि इन 80 करोड़ लोगों को खिलाया जा सके.
मुफ्त अनाज देना किसी देश की स्थाई आर्थिक नीति नहीं हो सकती. यह जरूरत के समय राहत का उपाय हो सकता है. यह किसी अर्थव्यवस्था की मजबूती का प्रमाण नहीं है. मजबूत अर्थव्यवस्था वह होती है जिस में लोगों के पास सम्मानजनक और स्थाई रोजगार हो, उन की आमदनी बढ़ रही हो और वे अपनी जरूरतें सरकारी मदद के बिना पूरी करने की स्थिति में हों.
यह भी समझने की जरूरत है कि देश की कुल आबादी में बड़ी संख्या बच्चों और बुजुर्गों की है. नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक 59 साल से अधिक उम्र के लोगों और 5 साल से कम उम्र के बच्चों की संख्या करीब 27 करोड़ है. स्वाभाविक रूप से इस आबादी का बड़ा हिस्सा कामकाजी नहीं है. इसलिए केवल कुल आबादी का आंकड़ा देख कर आर्थिक ताकत का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता. असली सवाल यह है कि काम करने की उम्र वाले लोगों के लिए कितने रोजगार उपलब्ध हैं और उन की आमदनी कितनी है? और, यहीं सरकार के विकास के दावों की सब से बड़ी परीक्षा होती है.
एक रिपोर्ट के मुताबिक, देश के करीब 61 फीसदी नौजवान बेरोजगार हैं. यह आंकड़ा अपनेआप में इतना बड़ा है कि इसे किसी राजनीतिक बयान से ढका नहीं जा सकता. हर साल लाखों युवा कालेजों और विश्वविद्यालयों से डिग्रियां ले कर निकलते हैं लेकिन उन के सामने नौकरी के पर्याप्त अवसर नहीं हैं. डिग्री बढ़ रही है, लेकिन रोजगार नहीं बढ़ रहा है. जिस ‘डैमोग्राफिक डिविडैंड’ को भारत की सब से बड़ी ताकत बताया जाता था, उसे मोदी सरकार ने ‘डैमोग्राफिक डिजास्टर’ में बदल दिया है.
दरअसल, रोजगार का सवाल सिर्फ बेरोजगार नौजवान का सवाल नहीं है. यह पूरे देश की अर्थव्यवस्था का सवाल है. जिस के पास नौकरी नहीं होगी, उस की आमदनी नहीं होगी. आमदनी नहीं होगी तो वह सामान नहीं खरीदेगा. मांग नहीं बढ़ेगी तो कारोबार नहीं बढ़ेगा. कारोबार नहीं बढ़ेगा तो नई नौकरियां पैदा नहीं होंगी. यानी, रोजगार की कमी पूरी अर्थव्यवस्था को कमजोर करती है.
इसी तरह शिक्षा का सवाल भी रोजगार से सीधे जुड़ा हुआ है. आज 40 साल बाद सरकारी स्कूलों की हालत पर लगातार सवाल उठ रहे हैं और दूसरी तरफ निजी संस्थानों में शिक्षा इतनी महंगी होती जा रही है कि आम परिवारों के लिए बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाना मुश्किल होता जा रहा है. ऊपर से प्रतियोगी परीक्षाओं और भरती परीक्षाओं में होने वाली गड़बड़ियों व पेपर लीक ने नौजवानों का भरोसा और कमजोर किया है.
सब से दुखद स्थिति यह है कि बड़ी रकम खर्च कर के डिग्री हासिल करने के बाद भी लाखों युवाओं को ऐसी नौकरियां नहीं मिलतीं जिन से वे अपने परिवार का भविष्य सुरक्षित कर सकें.
किसी देश की असली तरक्की उस के शेयर बाजार, अरबपतियों की संख्या या जीडीपी के आंकड़ों से नहीं मापी जाती. असली विकास तब दिखाई देता है जब आम आदमी की आमदनी बढ़े, नौजवानों को रोजगार मिले, मजदूर को पूरे साल काम मिले, बच्चों को अच्छी व सस्ती शिक्षा मिले और परिवार बिना सरकारी खैरात के सम्मान के साथ जीवन जी सके.
आज देश को जरूरत नारों की नहीं, नौकरियों की है. डिग्रियों की नहीं, रोजगार देने वाली शिक्षा की है. मुफ्त अनाज की नहीं, ऐसी आमदनी की है जिस से आदमी अपने घर का राशन खुद खरीद सके. अगर सरकार के पास इस बुनियादी सवाल का जवाब नहीं है तो दुनिया की तीसरी सब से बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का दावा किस आधार पर किया जा रहा है?
भारतीय युवा जब विदेशों में जाते हैं तो जम कर काम करते हैं और जल्दी ही दूसरे देशों के कर्मियों से आगे निकल जाते हैं. दरअसल, हमारी ब्यूरोक्रैसी, पौलिटिक्स और रिलिजन देश की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार हैं, मोदी सरकार और उस से जुड़े सैकड़ों मंदिर, संस्थान, उद्योगपति और सहयोगी खूब लाभ उठा रहे हैं. Youth Unemployment Crisis




