Jantar Mantar Protest: जंतर-मंतर कभी खगोलीय गणनाओं का केंद्र था, आज लोकतंत्र की धड़कन है. यहां उठने वाली आवाजें संसद से लेकर सत्ता के गलियारों तक गूंजती हैं और जनता की तकलीफों को राष्ट्रीय मुद्दा बनाती हैं. लेकिन जब विरोध की आवाज सत्ता को बेचैन करने लगे, तो प्रदर्शन की जगह ही छीनने की कोशिश होने लगती है. कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन के बाद जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाने का फैसला इसी सवाल को जन्म देता है कि क्या मोदी सरकार जनता की आवाज सुनने से डर रही है, या अब उसे सवाल पूछने वाले नागरिक ही खटकने लगे हैं?
जंतर-मंतर का निर्माण 18वीं सदी में जयपुर के महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने करवाया था. दिल्ली की यह ऐतिहासिक वेधशाला खगोलीय गणनाओं, सूर्य की स्थिति और समय मापने के लिए बनाई गई थी. लेकिन समय के साथ इसके आसपास की सड़क ने एक बिल्कुल अलग पहचान बना ली - जनता की आवाज उठाने वाली जगह के रूप में.
आजादी के बाद दिल्ली में बोट क्लब और इंडिया गेट के आसपास का इलाका बड़े प्रदर्शनों के लिए महत्वपूर्ण था. मगर 1988 में जब किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में बोट क्लब पर हुए विशाल किसान आंदोलन ने सत्ता को यह अहसास कराया कि संसद और सरकारी दफ्तरों के इतने करीब जमा हुई बड़ी भीड़ राजनीतिक दबाव का कितना बड़ा माध्यम बन सकती है, तो उसके बाद वहां प्रदर्शनों पर पाबंदियां बढ़ गयीं.
जुलाई 2026 में दिल्ली के जंतर मंतर पर मोदी सरकार के शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को कुर्सी से उतरने को मजबूर करने वाले कॉकरोच जनता पार्टी के जबरदस्त प्रदर्शन ने 1988 किसान आंदोलन की याद ताजा कर दी. उस समय भी भीड़ के दबाव और डर ने सत्ता को प्रदर्शन स्थल को स्थानांतरित करने के लिए मजबूर किया और आज जब एक बार फिर वैसी ही स्थितियां बन गई हैं. आज जबकि मोदी का सिंहासन डोल रहा है तो एक बार फिर प्रदर्शन स्थल को बदलने का ऐलान किया गया है.
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