Godse Gandhi: 10 अक्टूबर 2026 को दिल्ली की सड़कों पर जो कुछ हुआ, उसे सिर्फ एक राजनीतिक प्रदर्शन कहकर खत्म कर देना आसान है लेकिन तस्वीर को थोड़ा गहराई से देखें तो यह लड़ाई सिर्फ सीजेपी बनाम चुनाव आयोग की लड़ाई नहीं बल्कि इसके केंद्र में एक बड़ा सवाल है. अगर चुनाव कराने वाली संस्था की निष्पक्षता पर ही सवाल उठने लगे और अगर आम जनता अपने हक के लिए सड़क पर उतरने को मजबूर हो जाए तो लोकतंत्र आखिर किस दिशा में जा रहा है?

10 अक्टूबर को सीजेपी के साथ तमाम विपक्षी दल इसी सवाल को लेकर दिल्ली की सड़कों उतरे. ममता बनर्जी, ध्रुव राठी और सीजेपी के कई नेता गिरफ्तार भी हुए. इससे यह बात साफ है कि 10 अक्टूबर का प्रोटेस्ट भारतीय राजनीति में मील का पत्थर साबित हुआ है हालांकि यह शुरुआत है और इस आंदोलन का अंत क्या होगा किसी को मालूम नहीं लेकिन इतना तय है की अब यह आंदोलन इतिहास बदल कर ही खत्म होगा.

10 अक्टूबर को दिल्ली में सीजेपी के आह्वान पर जो ऐतिहासिक जमावड़ा हुआ उसकी पृष्ठभूमि 6 अक्टूबर को ही तैयार हो गई थी. 6 अक्टूबर को राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने जिस हिम्मत के साथ बीजेपी की तानाशाही सत्ता को चुनौती दी थी वह अपने आप में एक ऐतिहासिक घटना है. 6 अक्टूबर के प्रोटेस्ट को रोकने के लिए पुलिस ने बैरिकेड लगा रखे थे. कई विपक्षी नेताओं को पुलिस ने हिरासत में लेकर बसों में बैठाना शुरू किया. अखिलेश यादव, अभिषेक बनर्जी, डेरेक ओ’ब्रायन और दूसरे विपक्षी नेता भी इस कार्रवाई की चपेट में आए लेकिन जब पुलिस को लगा कि प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेकर आंदोलन खत्म किया जा सकता है तभी राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने पूरी रणनीति बदल दी.

दोनों पुलिस की कार्रवाई से बचते हुए पास के आकाशवाणी भवन परिसर में पहुंच गए और वहां बैठ गए. बाद में कांग्रेस के दूसरे नेता भी वहां पहुंच गए. पुलिस उन्हें वहां से हटने के लिए कहती रही लेकिन राहुल गांधी का कहना था कि अगर उन्हें सड़क पर बैठने नहीं दिया जा रहा तो आखिर लोकतंत्र में विपक्ष बैठे कहां? उन्होंने सवाल किया कि क्या वे इंडिया गेट पर बैठें, जंतर-मंतर पर बैठें या सड़क पर बैठें? बस जगह बता दीजिए, हम वहीं बैठ जाएंगे. यहीं से राहुल गांधी ने 10 तारीख के प्रोटेस्ट की प्रासंगिकता तय कर दी. हालांकि 10 अक्टूबर के प्रोटेस्ट में राहुल गांधी दिल्ली में मौजूद नहीं थे, वह तमिलनाडु में थे फिर भी देश की राजधानी में उबाल आ चुका था और इस दौरान सीजेपी के साथ कांग्रेस के हजारों युवा सड़कों पर थे.

महात्मा गांधी ने अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ सत्याग्रह और अहिंसा को हथियार बनाया था. उनका विचार था कि अन्याय के सामने चुप रहना समाधान नहीं है. सत्ता चाहे कितनी भी ताकतवर क्यों न हो, जनता के शांतिपूर्ण प्रोटेस्ट से ही सत्ता को चुनौती दी जा सकती है. आज राहुल गांधी का आंदोलन उसी गांधीवादी परंपरा से अपने आपको जोड़ने की कोशिश करता दिखाई देता है. फर्क इतना है कि आज लड़ाई विदेशी शासन के खिलाफ नहीं बल्कि वोट चोरी से सत्ता में बैठी बीजेपी की तानाशाही सरकार के खिलाफ है.

एक तरफ गांधी का भारत है जिसमें असहमति, डाईवर्सिटी, सेकुलरिज्म और आंदोलन की जगह है. दूसरी तरफ वह राजनीति है जो राष्ट्रवाद और धर्म की आड़ में गोडसे की विचारधारा पर चलती है. आज की बीजेपी सरकार और RSS की राजनीति देश को उस दिशा में ले जा रही है जहां धर्म और राष्ट्रवाद हावी है और जनता के जरुरी मुद्दे हाशिये पर धकेल दिए गये हैं. आरएसएस की यह मानसिकता सिर्फ जनता के ही खिलाफ नहीं है बल्कि यह लोकतांत्रिक संस्थाओं पर भी भारी पड़ रही है.

एक तरफ मंदिर, धर्म, हिंदू-मुस्लिम, राष्ट्रवाद और धार्मिक पहचान की राजनीति है. दूसरी तरफ राहुल गांधी लगातार बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक न्याय, संविधान और वोट के अधिकार की बात कर रहे हैं. पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने भारत जोड़ो यात्रा से लेकर जातीय जनगणना, सामाजिक न्याय और संविधान जैसे कई महत्वपूर्ण मुद्दों को अपनी राजनीति का हिस्सा बनाया है. महात्मा गांधी ने आजादी की लड़ाई में जनता को सत्ता के सामने खड़ा करना सिखाया था. आज राहुल गांधी संविधान और वोट के सवाल पर जनता के बीच खड़े हैं इसलिए उन्हें भले ही “नया गांधी” न माना जाये लेकिन एक बात तय है. जब लोकतंत्र के सवाल सड़क पर आ जाएं तो इतिहास सड़क पर उतरने वालों को सिर्फ नेता नहीं, युगपुरुष के रूप में ही याद करता है.

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