CJI Gen Z: सीजेपी के 10 अक्तूबर के प्रस्तावित प्रोटेस्ट पर सरकार के साथ साथ सुप्रीम कोर्ट भी कितना व्यथित और असहज है इसकी बानगी दिल्ली पुलिस द्वारा दिल्ली में 57 मेट्रो स्टेशनों को बंद करने के मामले पर सुनवाई के दौरान देखने में आई जब सीजेआई सूर्यकांत ने यह टिप्पणी की कि आप मक्खी मारने के लिए हथोड़े का इस्तेमाल नहीं कर सकते. गौरतलब है कि दिल्ली पुलिस के इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई थी जिसकी सुनवाई के दौरान यह कमेंट सीजेआई ने किया

जिस प्रोटेस्ट को लेकर पूरा देश हिला हुआ है, सरकार खाना भी ढंग से नहीं खा पा रही उसे सुप्रीम कोर्ट कितने हल्के में ले रहा है यह सीजेआइ के इस ताने से पता चलता है. जिसमे उन्होंने जेन जी की हैसियत गिराते उसे अब मक्खी के ख़िताब से नवाज डाला. इसके पहले भी उन्होंने युवाओं को काकरोच कहा था जिसके चलते अभिजीत दिपके ने सीजेपी का गठन किया था.

प्रोटेस्ट के नतीजे क्या निकलेंगे यह बाद की बात है लेकिन देश के भविष्य और कर्णधारों जेन जी के बारे में उच्च स्तरीय राय क्या है यह सीजेआई महोदय के कमेंट्स से दुखद रूप में एक बार फिर सामने आया. इसके पहले भाजपा सांसद और अभिनेत्री कंगना रानौत जेन जी की तुलना गटर के कीड़ों से कर चुकी हैं. इसे थोडा साफिस्टीकेटेड शेप देते प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी युवाओं के लिए दिमागी नक्सली विशेषण प्रदान कर चुके हैं.

भक्त समुदाय तो न जाने क्या क्या उन्हें कहता रहता है लेकिन सीजेआई की टिप्पणी को भिनभिनाती मक्खी की तरह चेहरे से नहीं उड़ाया जा सकता.
यह कुंठा भी है और पूर्वाग्रह भी है एक तरह से प्रोटेस्ट को हतोत्साहित करने की न्यायिक कोशिश भी है. क्योंकि जो लड़ाई जेन जी लड़ रही है वह निहायत ही संवेदनशील गंभीर और संविधान सहित लोकतंत्र को तानाशाही और मनमानी से बचाने की है.

जिसमे उसका साथ न देना कोई गुनाह नहीं लेकिन जेन जी को मक्खी, मच्छर, काकरोच गटर की कीड़े, और दिमागी नक्सली कहना देश की यंग जनरेशन का अपमान नहीं तो और क्या है. अपमान का यह रिवाज़ कोई आजकल का नहीं है बल्कि पौराणिक काल से चला आ रहा है जिसके तहत सत्ता पर ऊँगली उठाने बालों को तर्क करने और सवाल पूछने बालों को पापी दुष्ट म्लेछक्ष नींच दुर्जन श्वान अधर्मी बगैरह कहते नीचा दिखाया जाता था.

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