Vote Right: आम जनता को वोट का हक चाहिए गीता के उपदेश नहीं
दिनांक – 7 अक्तूबर 2026
स्थान – इंदिरा गाँधी स्टेडियम दिल्ली
आयोजक – भाजपा दिल्ली इकाई
अवसर – विकसित भारत संकल्प सभा
प्रधान वक्ता – नरेन्द्र मोदी
भाषण का आधार और सार – श्रीमद्भागवद्गीता
लगभग साढ़े सैंतीस मिनिट के भाषण में प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी अपने मुख्यमंत्री और प्रधानमन्त्री के तौर पर 25 साल पूरे हो जाने पर पिछ्ल्रे 12 सालों की तरह गिनाते रहे कि वे क्या क्या देश के लिए कर चुके हैं और क्या क्या करना चाहते हैं. विकास और वादों का यह टानिक जनता खूब पी चुकी है लेकिन ताकत इससे नहीं आती दिख रही. मोदी ने इसे भांपा और जल्द ही गीता के उपदेश देना शुरू कर दिए जिससे लोग उबासी न लें बल्कि मन लगाकर सुनें
अब भला कौन हिन्दू होगा जो गीता के उपदेश कान में पड़ने पर सतर्क होकर न बैठ जाए लिहाजा मोदी के मुंह से गीता के श्लोक सुनकर लोगों को यकीन हो गया कि धर्म अभी जिंदा और सलामत है. पंचर सुधारक काफ़िर अब्दुल और बाकी मुसलमान उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाए हैं. और जब तक मोदी जी पीएम रहेंगे तब तक धर्म का कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता.
और जब तक चुनाव आयोग जैसी `पवित्र` संस्था और ज्ञानेश कुमार जैसे उसके मुखिया हैं तब तक तो मोदी का प्रधानमन्त्री बनते रहना तय है. यही गारंटी और इत्मीनान भारत की सवर्ण हिन्दू जनता मोदी से चाहती है. बाकी विकास फिकास तो टाइम पास मूंगफली जैसी बातें हैं जिन्हें भाजपा का नवोदित नेता या गली का पार्षद भी कर लेता है.
7 अक्तूबर को कांग्रेसी वोट चोरी और वोट के हक को लेकर अपनी जनता की लड़ाई लड़ रहे थे जिसे इग्नोर करना मोदी के लिए मुंह छिपाकर निकलने जैसी बात होती. इस पर वे सीधे सीधे कुछ बोलते तो जो बबाल विपक्ष और जेन जी काटती उससे भी मुंह छिपाना उन्हें मुश्किल हो जाता इस धर्म संकट से बचने के लिए उन्होंने गीता का सहारा लिया और उसकी आड़ में वोट के हक पर अपनी बात कह दी.
गीता के अध्याय 2 के प्रचिलित श्लोक कर्मण्येवाधिकारस्ते माँ फलेषु कदाचन ..का हवाला देते उन्होंने कहा, गीता ने उन्हें सिखाया है कि कर्म ही हमारा धर्म है. मनुष्य का अधिकार सिर्फ उसके कर्मों पर है ..इसके आगे जो उन्होंने नहीं कहा वह यह है कि अधिकार वोटों पर नहीं है उन पर तो हमारा हक है. . राहुल गाँधी और अभिजीत दिपके को मोदी का यह फैसला कान खोलकर सुन और समझ लेना चाहिए कि वोट तो मिथ्या है. दरअसल में तो प्रधानमन्त्री उपर बाला चुन कर भेजता है जनता तो सिर्फ उसकी प्रेरणा से इवीएम मशीन में बटन दबाती है.
जो लोग कमल फूल का बटन नहीं दबाते उन पर एसआईआर की गाज ज्ञानेश कुमार गिरा देते हैं. यह हकीकत में ऊपर बाले की इच्छा का सम्मान करना है. जो कुछ म्लेच्छ टाइप के लोग ईश्वरीय इच्छा का सम्मान और पालन नहीं कर रहे थे. उन्हें चुनाव आयोग ने घोर पाप से बचा लिया है नहीं तो इस पाप के एवज में क्या क्या नर्क में जाकर भुगतना पड़ता है इसका जिसे शौक हो वह गीता के साथ साथ गरुड़ पुराण भी पढ़ ले.
इस एक श्लोक पर ही वे नहीं रुके, रुक भी नहीं सकते थे क्योंकि गीता कोई संविधान थोड़े ही है जिसे पढ़ना जरुरी हो. भला संविधान भी कोई पढ़ने की चीज है पढ़ने की चीज तो गीता है जिसमे कृष्ण ने कुरुक्षेत्र में धूल फांकते अर्जुन को हाहाकारी उपदेश यह दिया था कि तू अपनों को सामने देख डर मत. इनका वध ही तेरा क्षत्रिय धर्म है. अगर तू नहीं लडेगा तो अपयश यानी बदनामी को प्राप्त होगा लोग तुझे कायर कहेंगे.
एक क्षत्रिय बहुत कुछ बर्दाश्त कर सकता है लेकिन बुजदिली का मेडल सीने पर नहीं लगा सकता लिहाजा अर्जुन का डर, जिज्ञासा, संशय बगैरह एक झटके में छू हो गए. यानी वह कृष्ण के झांसे और उकसावे में आ गया और हस्तिनापुर की गद्दी को याद करते टूट पड़ा कौरवों पर और 18 दिन बाद जीत भी गया.
मोदी ने दूसरा श्लोक अनासक्त कर्म का श्लोक के ही जरिए सुनाया यह श्लोक है तस्माद असक्त सततं कार्य कर्म समाचार… इसका जिक्र उन्होंने यह बताने के लिए किया कि बिना किसी निजी महत्वाकांक्षा या लालच के देशहित को सर्वोपरि रखकर निरंतर प्रयास करते रहना ही उनका एकमात्र संकल्प है.
अब कहने सुनने को कुछ नहीं रह गया था विकसित भारत संकल्प सभा गीता के श्लोकों में डूब गई थी सो पब्लिक तालियाँ पीटती रही. लेकिन जाने क्यों पहले की तरह मोदी मोदी नहीं चिल्लाई. शायद गीता के प्रवचन सुन पब्लिक का गला रुंध गया था. अब ये प्रवचन जनता के किस काम के थे यह तो कृष्ण जाने जिसने गीता का उपदेश अर्जुन को दिया था जनता को नहीं अब अगर यह नीट के पेपर की तरह लीक हो गया तो यह संजय की गलती थी जो अंधे धृतराष्ट्र को युद्ध का आँखों देखा हाल क्रिकेट कमेंट्री सरीखा सुना रहा था. इसलिए गीता लीक का दोषी तो उसे ही ठहराया जाना चाहिए
अब यह गीता घर घर घुस गई है. लोग इसे पढ़ते समझते नहीं है बल्कि उसका सार बाबाओ और मोदी जैसे नेताओं से सुनने इकट्ठा हो जाते हैं. दिल्ली की राहुल और दिपके बाली जनता जो कुल 85 फीसदी के इर्द गिर्द है वह संविधान की प्रति हाथ में लिए ज्ञानू के इस्तीफे पर अडी है. उसे गीता, रामायण और मनु स्मृति से कुछ लेना देना होता तो खामोखा में दिमागी नक्सली का तमगा और ख़िताब उसे नहीं मिलते.
गीता के उपदेशों के झांसे में अब जनता नहीं आ रही तो भगवा गैंग को कोई नया टोटका मार्केट में लाना चाहिए. जिसकी धमक से लोग जंतर मंतर और दिल्ली में जमा न हों वोट का हक न मांगे बल्कि गाएं यह कि श्री कृष्ण गोविन्द हरेमुरारी हे नाथ नारायण वासुदेवा….. .




