Save Democracy: लोकतंत्र, बस, वोटतंत्र बन कर न रह जाए, यह जनता के देखने का काम ही नहीं, बल्कि फर्ज भी है. लोकतंत्र सिर्फ राजा या शासक चुनने की प्रक्रिया नहीं है. यह शासन के बंदूक और जेलों वाले मुलाजिमों से बचने का अकेला तरीका है. बंदूक जरूरी नहीं कि गोलियों से भरी हो. यह आईएएस अफसर तुकाराम मुंढे जैसी भी हो सकती है जो जनता के हितों की आड़ में रैस्तरांओं और होटलों पर सरकारी फौजपाटे के साथ छापेमारी करते हैं.
सरकार का जुल्म हजार तरीके के होते हैं. सडक़ पर चलते हुए पहचानपत्र दिखाने से ले कर सैंट्रल परीक्षाएं कराने तक हो सकता है. सरकार का जुल्म अपने भाईबंद या जाति को नौकरियां दिलाने से ले कर अपने लिए बड़े महंगे विमान खरीदने से ले कर सडक़ों पर गड्ढों तक का हो सकता है. जुल्म पानी के सैलाब से बचा न पाने से ले कर पानी की कमी से त्रस्त जनता की न सुन कर खुद के स्विमिंग पूलों में मजा लेने का भी हो सकता है.
लोकतंत्र वह होता है जहां सरकार के हर काम पर नजर रखने को देशद्रोह, पाकिस्तानी या नक्सली न कहा जाए. जहां पहले जेल में ठूंसने का काम हो, बाद में बताया जाए कि आप ने क्या कहा, क्या लिखा, क्या पढ़ा, क्या सुना. आप अपना लोकतंत्र बचाने के लिए क्या कर रहे हैं?
अगर लोकतंत्र नहीं बचाया तो आप की नौकरी पर हर समय काला साया मंडराता रहेगा. आप का मकान बुलडोजरों से गिराने की लिस्ट में सदा रहेगा. आप की बिजलीपानी सरकार के हाथों में है तो वह कभी भी बंद की जा सकती है. आप की दुकान पर छापा पड़ सकता है. आप के छोटे या बड़े या बहुत बड़े धंधे को हथिया कर मित्रों का न दे दिया जाए, इस के लिए आप को लोकतंत्र को बचाए रखना होगा.
राजाओं और धर्मों ने कभी लोकतंत्रों का समर्थन नहीं किया है. धर्मों ने लोकतंत्रों का आह्वान किया है कि राजा का कहा मानो, उसे दान उसी तरह दो जैसे धर्म को देते हो. उन दोनों के लिए मारोमरो. उन दोनों को अपनी औरतें, बेटियां, बीवियां उपहार में दो. मोटा टैक्स दो लेकिन यह न पूछो कि पैसे का क्या हुआ. दोनों को कल्पित भगवान का हिस्सा मानो.
सदियों के इस जंजाल से निकलने के लिए हजारों ने बड़ी मेहनत की. ठीक है लाखों या करोड़ों ने दूर से देखा पर समर्थन दिया, पैसा दिया, कभीकभार घर से निकल कर सडक़ों पर आने की हिम्मत दिखाई.
आज दुनियाभर में सिर्फ 300 साल पुराना लोकतंत्र आखिरी सांसें ले रहा है. कुछ देशों में तो वह घुसने से पहले ही मार डाला गया, धार्मिक फौजी जूतों के नीचे कुचल दिया गया.
भारत में लोकतंत्र पूरी तरह से जनता के हाथों में 1950 से लागू संविधान के जरिए मिला. इस के पहले चुनाव होते थे पर अंगरेज सरकार की चाटुकारिता करने के लिए, जिस का लाभ वल्लभभाई पटेल और सुभाष चंद्र बोस दोनों ने उठाया. उन्होंने टैक्स के पैसे से अच्छा वेतन पाने का सुख भी उठाया. आज के शासकों के पूर्वजों ने अंगरेज शासकों की चाटुकारिता की या धर्म की सेवा की, लोकतंत्र से उन का लेनादेना रहा नहीं.
आज ऐसे लोगों के हाथों में लोकतंत्र ब्रैक हो रहा है जिन्होंने इस के लिए किए गए सैक्रिफाइस की कहानियां भी नहीं सुनीं और न सुनने का धैर्य है उन में. आज जो मूर्तियां लग रही हैं देशभर में, उन में से 75 फीसदी उन की हैं जिन्होंने अंगरेजों, राजाओं, तानाशाहों, नवाबों के समय जनता को इकठ्ठा किया पर अपने दानदक्षिणा के लिए, जनता को लोकतंत्र का हक दिलाने के लिए नहीं जहां वह अपने आज और कल का फैसला सही ढंग से कर सके. आज लोकतंत्र के नाम पर सरकारी नौकरी पाना रह गया है जो जनता पर जुल्म ढहाने का जरिया है.
आज के लोकतंत्र में बिहार से मुंबई, बेंगलुरु जा रहे मजदूरों के लिए सडक़ें, रेलें नहीं बन रहीं, जबकि मंदिरोंतीर्थों पर ले जाने के लिए बन रही हैं. आज कारों की बड़ी फैक्ट्रियां लग रही हैं पर सरकार समर्थकों के लिए बड़ी गाडिय़ां बनाने के लिए. आज प्रगति के नाम पर शानदार एयरकंडीशंड स्कूल बन रहे हैं, फाइवस्टार होटल बन रहे हैं, फाइवस्टार होटलों जैसे अस्पताल बन रहे हैं.
आज सैकड़ों स्टार्टअप बन रहे हैं जो केवल अमीर, सरकारों और धर्म के निकट लोगों के पास इकट्ठा हुए पैसे को खर्च करने का तरीका बता रहे हैं. अमीरों के लिए लोन की सुविधाएं अपार हैं. जीटीवी का सुभाषचंद्रा 22,000 करोड़ रुपए का लोन ले कर बैठा है, उस से 6.5 करोड़ रुपए ले कर उस के लोन को रफादफा किया जा रहा है. यह लोकतंत्र की समाप्ति का एक ताजा उदाहरण है.
आज कौकरोच कह कर विरोध करने वाले को कुचला जा रहा है, कौकरोच जनता पार्टी के जंतरमंतर प्रोटैस्ट में 2,500 से ज्यादा अपराधी पुलिस ने घुसा दिए ताकि सभी को बदनाम किया जा सके और इसे ही लोकतंत्र पर घाव करना कहा जाता है. इसे बचाना आम लोगों का दायित्व है क्योंकि तानाशाही का पहला निशाना वे ही बनेंगे, अमीर नहीं. द्वितीय विश्वयुद्ध के समय इंगलैंड के अमीरों ने मन बना लिया था कि वे हिटलर के आगे समर्पण कर देंगे चाहे गरीबों और गैरईसाईयों को जिंदा जला दिया जाए. उन के सुखों पर आंच नहीं आएगी, यह उन्हें विश्वास है. Save Democracy




