Drishyam 3 Review: बौलीवुड में जब कोई फौर्मूला हिट होता है तो निर्देशक उस का दूध निकालने में कोई कसर नहीं छोड़ते. फिल्म ‘दृश्यम 3’ भी इसी फौर्मूला सरीखी है कि एक ही लाश और एक ही थ्योरी के आधार पर 3 फिल्में बना डाली गई हैं. हालांकि, दिलचस्प यह भी है कि तीनों फिल्में दर्शकों को इंगेज करने में कामयाब दिखती हैं. 2015 से शुरू हुआ विजय सालगांवकर (अजय देवगन) का किस्सा अब 2026 में आ कर कन्क्लूजन पर पहुंचा है. सवाल यह कि फिल्म अपने मुकाम तक पहुंच पाई?

निर्देशक अभिषेक पाठक ने मलयालम फिल्म ‘दृश्यम’ के तीसरे भाग से इसे अलग पेश करने की कोशिश की है. मलयालम वर्ज़न, जिस में मोहनलाल हैं, में निर्देशक जीतू जोसेफ ने सस्पैंस और चालाकी वाले खेल के बजाय इमोशन और फैमिली ड्रामा पर ज्यादा जोर दिया था. लेकिन इस के हिंदी वर्जन में इमोशनल ड्रामा नहीं, बल्कि वही चौथी फेल विजय और पुलिस के बीच तीखा माइंडगेम दिखाया गया है.

हालांकि फिल्म का क्लाइमैक्स कुछ खास चौंकाता नहीं है मगर जिन्होंने 2 भाग इस के देख लिए हैं उन्हें कनैक्ट जरूर करते हैं. फिल्म में इस बार क्राइम ब्रांच के नए एसपी राजवीर सिंह तोमर (जयदीप अहलावत) की एंट्री होती है. तोमर सिगरेट का धुआं उड़ाते हुए केस की फाइल दोबारा खोलता है. इस बार लड़ाई कोर्ट में है, विजय कोर्ट से इस मामले की फाइल बंद करवाना चाहता है. वहीं तोमर नए सिरे से मामले को फिर शुरू करता है, जिस में नए सुबूतों को जुटाया जाता है.

पुलिस स्टेशन के नीचे डीएनए टैस्ट की बात होती है, कोर्टकचहरी के चक्कर कटते हैं और बेंगलुरु के बड़े वकील इंद्रजीत शेट्टी (प्रकाश राज) को मैदान में उतारा जाता है. चूंकि इस फिल्म का टैस्ट सीट पर बैठा दर्शक समझ चुका है, सो, पूरा सस्पैंस प्रेडिक्टेबल लगता है जो आगे खुलने से पहले ही दिमाग में खुल जाता है.

यह फिल्म चूंकि कन्क्लूजन है तो कसावट पहले 2 भागों जैसी नहीं है, इसे बस अच्छा एंड देने की कोशिश की गई है. फिल्म के क्लाइमैक्स में विजय और उस के परिवार को कोर्ट से बरी कर दिया जाता है. उन के खिलाफ सुबूत नहीं मिलते, जो सुबूत मिलते भी हैं तो उस से पहले विजय उन्हें निपटा देता है.

अभिषेक पाठक ने पटकथा में कुछ नए ट्विस्ट डालने की कोशिश जरूर की है, जैसे महाभारत के संदर्भ देना या कोर्टरूम ड्रामा को थोड़ा लाउड बनाना. लेकिन यह सब फिल्म की सुस्ती को छिपा नहीं पाता. फिल्म का पहला हाफ तो पुलिस में कट जाता है. दूसरे हाफ में जब कोर्टरूम ड्रामा शुरू होता है, तो लगता है कि अब कुछ नया देखने को मिलेगा. मगर कुछेक ट्विस्ट के बाद निर्देशक के पास खास दिखाने को बचता नहीं.

अभिनय के मोरचे पर बात करें तो अजय देवगन पूरे समय अपने पुराने ‘ब्लैंक’ चेहरे के साथ घूमते नजर आते हैं. फिल्म में उन का काम और संवाद भी काफी सीमित हैं. विजय सालगांवकर का किरदार कन्क्लूजन तक पहुंचते हुए सुन्न हो चुका है. अजय के चेहरे पर न डर दिखता है और न ही कोई दूसरा भाव. जयदीप अहलावत एसपी तोमर के किरदार में शानदार लगता है. एक सीन में जब वह शादी के रिश्ते की बात के लिए सालगांवकर के घर बिन बुलाए मेहमान बन कर पहुंचता है, तो वहां का माहौल इंटैंस बना देता है.

तबू के पास इस बार करने के लिए कुछ खास नहीं था. प्रकाश राज ने वकील के रोल में चिल्लाने का काम किया है. श्रिया सरन और बाकी कलाकारों के पास भी खास नहीं था. हां, सबइंस्पैक्टर गायतोंडे के रोल में कमलेश सावंत प्रभावित करता है, उस के कौमिक पंच शानदार डिलीवर होते हैं, लेकिन उस का किरदार भी अंत आतेआते गायब हो जाता है.

फिल्म की सिनेमेटोग्राफी पहले 2 भागों जैसी बढ़िया है. कई सीन ऐसे हैं जिन्हें एडिटिंग टेबल पर आसानी से काटा जा सकता था. कुल मिला कर यह फिल्म इस कहानी को खत्म करने के लिए बनाई गई लगती है, जो दर्शकों को संतुष्ट करती है. फिल्म में गाने नहीं हैं, मगर बीजीएम स्कोर सस्पैंस फिल्म के मुताबिक अच्छा है.

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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