Cricketer Struggle Story: नया नया पैसा कैसे लाइफ और लाइफ स्टाइल बदलता है इसके उदाहरण हर किसी के आसपास मिल जाएंगे. लेकिन जो लोग पैसे की अधिकता के चलते अपने काम और मकसद से भटक जाते हैं उनका हश्र अपने दौर के हाहाकारी बल्लेबाज विनोद कांबली सरीखा होते देर नहीं लगती. उलट इसके जो लोग पैसे को मेनेज करना जानते हैं और लाइफ स्टाइल बेलेंस रखते हैं वे सचिन तेंदुलकर जैसे लाइफ एन्जॉय कर रहे होते हैं.

इंग्लेंड क्रिकेट टीम का वह साल 1993 का भारत दौरा था. मुंबई के बानखेड़े स्टेडियम में दूसरा टेस्ट मेच चल रहा था. दर्शक उस वक्त चौंक उठे जब महज दूसरा टेस्ट खेल रहे एक नवोदित लेफ्ट हेंड बेट्समेन ने ताबड़तोड़ शाट्स लगाते इंग्लेंड की गेंदबाजी के चिथड़े उड़ा दिए. इस अजीब सी वेशभूसा बाले युवा बल्लेबाज ने मैदान के चारों तरफ गेंद पहुंचाई. लेकिन उसके फुटवर्क और टाइमिंग दोनों देखने लायक लगभग चमत्कृत और सम्मोहित कर देने बाले थे. उसकी बेटिंग स्टाइल परम्परागत नहीं थी, बालर के एक्शन के पहले ही वह शाट तय कर लेता था और क्रीज से बाहर आते आगे बढ़कर गेंद को पूरी बेरहमी से कूटे जा रहा था.

इस बल्लेबाज ने शानदार 224 रनों की लंबी पारी खेलते दुनिया भर के क्रिकेट प्रेमियों के साथ साथ समीक्षकों का भी ध्यान अपनी तरफ खींचा. लगभग काला होते हुए भी वह विकट का आकर्षक दिखता था. चौड़ा चेहरा, कसरती बदन, घुंघराले बाल और कान में लटकती लम्बी बाली उसे औरों से अलग बनाती थी. इस प्रतिभावान खिलाडी का नाम विनोद कांबली था जिसे हर किसी ने लम्बी रेस का घोडा करार दिया था.

अगले ही मैचों में उसने यह साबित भी कर दिखाया. तीसरे ही टेस्ट में कांबली ने फिर दोहरा शतक लगाते शानदार 227 रन बना डाले. इस बार उसने दिल्ली के फिरोजशाह कोटला पर जिम्बाब्बे के गेंदबाजों को जमकर कूटा और लगातार दो डबल सेंचुरी बनाने बाले बेट्समेन के क्लब में अपना नाम दर्ज करा लिया. बेक टू बेक डबल सेंचुरी इसके पहले कसी भारतीय बल्लेबाज ने नहीं ठोकी थी. यह रिकार्ड तब तक दुनिया के दो महान बल्लेबाजों आस्ट्रेलिया के डान ब्रेडमेन और इंग्लेंड के वेली हेमंड के नाम ही था. इन दोनों ने ही यह रिकार्ड 1930 के लगभग बनाए थे
बहुत कम वक्त में ही विनोद कांबली से दुनिया भर के बालर यूँ ही नहीं थर्राने लगे थे. वह यहीं नहीं रुके बल्कि अगले टेस्ट मैचों में उन्होंने शतकीय परियां श्रीलंका दौरे के दौरान खेलकर जता दिया था कि पिछला करिश्माई प्रदर्शन कोई इत्तफाक नहीं था. अपने शुरूआती सात टेस्ट मैचों में ही उन्होंने आठ सौ से भी ज्यादा रन अपने खाते में दर्ज कराते सबसे तेज महज 14 परियों में एक हजार रन बनाने का भी रिकार्ड अपने नाम कर लिया था. गौरतलब बात यह है कि यह रिकार्ड अभी तक कोई खिलाडी तोड़ नहीं पाया है.

शराब ने डुबोया कैरियर

अब तक विनोद कांबली पर दौलत और शोहरत दोनों बरसने लगीं थी. चारों तरफ उनकी बेटिंग स्टाइल और लुक के चर्चे होने लगे थे. मेटल की जगह अब वह सोने के भारीभरकम गहने संगीतकार बप्पी लहरी की तरह पहनने लगे थे. औसत से ज्यादा वजनी ब्रेसलेट, गले में सोने की दो तीन चैने दिखना आम बात थी. उंगलिया तरह तरह की अंगूठियों से भरी रहती थीं. इससे भी ज्यादा ध्यान खींचता था उनका वेस्टइंडीज खिलाडियों से मेच करता लुक जो हर कभी बदल जाया करता था. कभी वह अपने गंजे सर के नीचे फ्रेंचकट दाढ़ी रख लेते थे तो कभी पूरी तरह क्लीन शेव हेड यानी सफाचट हो जाते थे.

इस वक्त में विनोद कांबली के चर्चे इस कदर होने लगे थे कि उनसे दो साल पहले डेब्यू करने बाले उनके स्कूली साथी बल्लेबाज और जिगरी दोस्त सचिन तेंदुलकर को भी उन्होंने पछाड़ दिया था. इन दोनों के ही कोच रमाकांत आचरेकर थे. ऐसा लगने लगा था कि कांबली और तेंदुलकर के रहते और चलते भारतीय बल्लेबाजी को अब आसानी से चुनौती नहीं दी जा सकती. लेकिन जल्द ही यह सिलसिला टूट गया. जिस तेजी से विनोद कांबली का ग्राफ आसमान छूने लगा था उससे भी ज्यादा तेजी से जमीन पर ओंधे मुंह आ गिरा, वजह थी शराब की लत जिसने उन्हें ढेरों बीमारियाँ सौगात में दीं.

दौलत ने बदली आदतें

नवधनाड्य अक्सर कैसे दौलत के गुरुर, चमक दमक, दिखावे और उसके बेजा इस्तेमाल के चलते कंगाल और तबाह हो जाते हैं इसकी जीती जागती मिसाल विनोद कांबली हैं. जो इन दिनों ठाणे के एक वृद्धाश्रम में गुजर कर रहे हैं. उनकी शारीरिक और मानसिक हालत देख लगता नहीं कि ये वही विनोद कांबली हैं जिनके मैदान में आते ही हलचल होने लगती थी. और दर्शक सांस रोके उनके शाट्स देखने बैचेन रहते थे. मैदान के बाहर वे जब भी जहाँ भी स्पॉट होते थे वह नेशनल न्यूज़ की शक्ल ले लेती थी. लेकिन अब उनकी बदहाली नेशनल न्यूज़ बन गई है. कभी पिच पर फर्राटे से दौड़ने बाला यह बल्लेबाज बिना सहारे के चल नहीं पा रहा.

अब विनोद कांबली के हाथ में न दौलत है और न ही शोहरत है तो अपनी इस दयनीय हालत के जिम्मेदार भी वही हैं. अपनी कामयाबी के दिनों से ही उन्होंने बेतहाशा शराब पीना शुरू कर दिया था. नतीजतन खेल पर से उनका ध्यान उचटने लगा. ड्रेसिंग रूम में भी वह धुत रहते अपने साथी खिलाडियों से लड़ने झगड़ने और उलझने लगे थे. देर रात की हाई प्रोफाइल पार्टियाँ उनकी जिंदगी का हिस्सा बन गई थीं. जल्द ही अनुशासनहीनता और गैरजिम्मेदाराना व्यवहार विनोद कांबली की पहचान बन गए.

इससे हुआ यह कि उनकी हाहाकारी बेटिंग टांय टांय फिस्स होने लगी और टीम से उन्हें निकाल दिया गया. हालाँकि घरेलू प्रतिस्पर्धाओं में शानदार प्रदर्शन के चलते उन्हें बार बार टीम में वापस लिया गया. यह भी कम हैरानी बाली बात नहीं कि विनोद कांबली ऐसे पहले और इकलौते क्रिकेटर हैं जिन्होंने एक दो नहीं बल्कि नौ बार टीम में वापसी की लेकिन हर बार नाकाम रहे. इसी नाकामी ने उन्हें कहीं का नहीं छोड़ा खेल तो खेल उनका पारिवारिक जीवन भी शराब की लत के चलते बर्बाद हो गया. इस लत ने उनसे अपना फार्म और एकाग्रता दोनों छीन लिए.

पारिवारिक जीवन पर भी पड़ा असर

फिर तो हर कभी उनसे ताल्लुक रखते किस्से और हादसे सुर्ख़ियाँ बनने लगे. पहली पत्नी नोएला लुईस से दुर्व्यवहार के चलते तलाक हुआ तो दूसरी पत्नी एंड्रिया हेविट भी उनके दुर्व्यवहार का शिकार होने लगी. साल 2023 में तो विवाद थाने तक जा पहुंचा था, जब एंड्रिया ने बांद्रा पुलिस स्टेशन में उनके खिलाफ मारपीट यानी घरेलू हिंसा की रिपोर्ट दर्ज कराई थी. उनका आरोप था कि विनोद ने शराब के नशे में उन पर बल्ले और कुकिंग पेन के हेंडल से हमला किया था.

इसके पहले भी नशे में उन्होंने अपनी घरेलू नौकरानी को तीन दिन तक बंधक बनाए रखा था. फिर साल 2018 में मुंबई के एक माल में उन्होंने एक सिंगर अंकित तिवारी के बुजुर्ग पिता की पिटाई कर दी थी. नशे के आदी हो चुके इस खिलाडी को ऐसा लगा था कि उस बुजुर्ग ने उनकी पत्नी एंड्रिया को गलत मंशा से छुआ था. यह विवाद भी थाने तक गया था. विनोद कांबली की बेजा हरकतों की लिस्ट उनकी उपलब्धियों से बहुत ज्यादा लम्बी है. जिनमे शराब के नशे में गाड़ी चलाते गिरफ्तार होना, दूसरी गाड़ियों को टक्कर मारना और अपनी ही सोसाइटी के गेट तोड़ देने जैसी हरकतें शामिल हैं. वह इतने एग्रेसिव हो चले थे कि दो बार उन्हें हार्टअटैक आया फिर धीरे धीरे दूसरी बीमारियाँ घेरने लगीं मसलन डायबिटीज, यूरिन इन्फेक्शन, डिप्रेशन, मोबिलिटी, याददाश्त कमजोर होते जाना और दिमाग में खून का थक्का जमना यानी ब्लड क्लाटिंग होना.

साल 2000 में उनके क्रिकेट कैरियर का विधिवत अंत हो गया तो पैसा भी खत्म होने लगा. इसके बाद भी उनकी रईसों बाली ठसक और आदते ज्यों की त्यों थीं. इन्ही आदतों में शुमार थी रोजाना की महंगी शराब जिसे खरीदने में उनका घर तक बिकने की नौबत आ गई थी. एक वक्त में तो अपनी सोसाइटी का मेंटेनेस 18 लाख रु भरने भी उनके पास पैसों का इंतजाम नहीं था. कुल जमा सार और सबक ये कि शराब की लत ने विनोद कांबली से सब कुछ छीन लिया और वे पाई पाई के मोहताज हो गए. क्रिकेट छूटने के बाद उन्होंने फिल्मो और राजनीति में भी किस्मत आजमाई जो उनसे इस तरह रूठी हुई थी कि 2009 के विक्रोली विधानसभा चुनाव में उन्हें तीन हजार के लगभग ही वोट मिले. यह चुनाव उन्होंने गुमनाम सी लोक भारती पार्टी के टिकिट पर लड़ा था. इन असफलताओं से सबक लेकर संभलने के बजाय झल्लाहट में वे और पीते गए. एक वक्त ऐसा भी आया कि उन्हें रिकार्ड 14 बार नशा मुक्ति केंद्र में भर्ती कराया गया.

कुछ फिल्मों में भी उन्होंने काम किया जो उन्हीं की तरह फ्लाप साबित हुईं. इनमे साल 2003 में संजय दत्त और सुनील शेट्टी जैसे एक्टर्स के साथ आई `अनर्थ` उनमे से एक थी. फिर 2009 में एक और क्रिकेटर अजय जडेजा के साथ `पल पल दिल के पास` नाम की फिल्म उन्होंने की लेकिन दर्शक इस फिल्म के भी पास नहीं आए, दूर ही रहे.

अमीरी देती है ये बीमारियाँ

मिडिल क्लास फेमिली से ताल्लुक रखने बाले विनोद कांबली के पास जब पैसा आया और कामयाबी मिली तो वे इन दोनों को ही नहीं संभाल पाए. ऐसा किसी के भी साथ हो सकता है और हो सकता है क्या, अक्सर होता ही है कि जरा सा पैसा आते ही लोग आसमान में उड़ने लगते हैं. स्टेटस के साथ साथ उनकी लाइफ स्टाइल भी बदल जाती है. यह लाइफ स्टाइल अक्सर नशे की लत के चलते बदलती है जिसमे आदमी आलसी, विलासी लापरवाह और आरामतलब हो जाता है जिससे कई बीमारियाँ उसे घेर लेती हैं.

इसका एक और बेहतर उदाहरण अपने दौर की टेलेंटेड और ग्लेमरस ऐक्ट्रेस मीना कुमारी हैं. जिन्हें फिल्म इंडस्ट्री ने `ट्रेजेडी क्वीन` के ख़िताब से नवाजा था. उन्हें भी शराब की लत ने तबाह किया था. इसमें कोई शक नहीं कि मीना कुमारी फिल्मों में जितनी कामयाब रहीं व्यक्तिगत जीवन में उससे भी ज्यादा दुश्वारियां उनके हिस्से में आईं. एक वक्त में उन्होंने फिल्मो से बेशुमार पैसा कमाया था जिसे वे शराब में उड़ाती रहीं. साल 1972 में उनकी आखिरी फिल्म पाकीजा के रिलीज होने के बाद से ही वे पैसों की तंगी से जूझने लगीं थीं.

शराब की लत ने उनका लीवर ख़राब कर दिया था जिससे वे लीवर सिरोसिस नाम की घातक बीमारी का शिकार हो गईं थीं. मीना कुमारी की हालत तो यह थी कि वे लीवर का इलाज भी करा रहीं थीं और शराब भी नहीं छोड़ पा रहीं थीं. उनका जमा पैसा इलाज और शराब में खर्च होते होते खत्म हो गया था. अपनी मौत से पहले इस ऐक्ट्रेस के पास मुंबई के सेंट एलिजाबेथ नर्सिंग होम का 3500 रु का बिल भरने के भी पैसे नहीं थे. अपने फ़िल्मकार पति कमाल अमरोही से तलाक के बाद मीना पहले डिप्रेशन का शिकार हुईं फिर क्रानिक इंसोमनिया की गिरफ्त में आ गई. शराब की लत ने इन बीमारियों को और बढ़ाया ही था.

यह कतई जरुरी नहीं कि शराब की या दूसरे किसी नशे की लत ही बीमार करती हो बल्कि पैसों के आने के बाद बिगडती लाइफ स्टाइल भी इसकी कम जिम्मेदार नहीं होती. अक्सर पैसा आने के बाद लोगों की रहन सहन और खानपान की आदते भी बदल जाती हैं. महंगा खाना हर्ज की बात नहीं लेकिन अगर वह खाना ज्यादा कैलोरी, वसा यानी फेट और शकर बाला हो तो डायबिटीज की वजह बनता है. ऐसे काम जिनमे बैठे बैठे पैसा आता हो आदमी को शारीरिक मेहनत से दूर कर देते हैं जिससे खाना वक्त पर और सलीके से पचता नहीं जो दर्जनों बीमारियों की वजह है

डायबिटीज के अलावा मोटापा, ब्लड प्रेशर, गाउट, कोरोनरी आर्टरी डिजीज, स्ट्रोक, डिप्रेशन और इंसोमनिया बगैरह जिन्हें लगझरी डिजीज या `डिजीज आफ एफ्लुएंस` यानी समृद्ध समाज की बीमारियाँ कहा जाता हैं का खतरा बना रहता है. यह ठीक है कि अमीरों के पास इलाज और दवा के लिए भी पैसा होता है इसलिए वे महंगा और बेहतर इलाज करवा लेते हैं. लेकिन ये बीमारियाँ जीवन की गुणवत्ता तो बिगाड़ ही देती हैं.

ऐसे बचें

पर वक्त रहते न संभला जाए तो हालत विनोद कांबली और मीना कुमारी सरीखी होते भी देर नहीं लगती. इसलिए पहली कोशिश बीमारियों से बचने की हर किसी की होनी चाहिए. जिसके लिए जरुरी है शारीरिक मेहनत, वक्त पर नींद और जरुरी पोषक तत्वों व फाइबर से भरपूर खाना. पैसा आता है तो सुख सहूलियतों के साथ साथ कई तनाव भी लाता है. ऐसे में स्ट्रेस मेनेज करने के कई तरीकों में से सबसे बेहतर है कसरत और खाली वक्त में किताबे और पत्रिकाएं पढ़ना. जिनमे बकवास नहीं बल्कि जिंदगी सलीके से जीने का मेसेज और जानकारियां होती हैं. मेग्जींस में तो मनोरंजक सामग्री भी खूब होती है जो मूड को हल्का रखती है.

एक मलाईदार महकमे में ऊँचे ओहदे पर नौकरी कर रहे एक सीनियर इंजीनियर नाम न छापने की शर्त पर आपबीती सुनाते कहते हैं कि गरीबी में जैसे तैसे पढ़ाई पूरी करने के बाद पैसा आने लगा तो सबसे पहले तो उन्होंने अपने शौक पूरे किए जो स्वभाविक बात थी. लेकिन यह अस्वभाविक तब हो गई जब उन्हें सिगरेट, जुए और शराब की लत लग गई. जो शख्स कभी सुबह 5 – 6 बजे उठकर कसरत करता था, नौकरी ईमानदारी से करता था, वक्त पर खाता और सोता था वह धीरे धीरे कब एक के बाद एक कई बीमारियों की गिरफ्त में आ गया. यह उसे तब पता चला जब डाक्टरों ने कहा कि आप अपनी आदतें सुधारें नहीं तो लीवर और किडनी दोनों फेल हो जाएंगे.

कभी पेरासिटामोल तक खाने से कतराने बाले यह इंजीनियर साहब अब खाने से ज्यादा दवाइयां खाते हैं. सुबह उठते ही खाली पेट थायराइड की फिर नाश्ते के बाद सुगर और बीपी की, लंच में एंटीआक्सीडेंट और रात को फिर सुगर और प्रोसटेड की इसके बाद नींद की गोली जिन्हें खाने के बाद भी अक्सर नींद आने से इंकार कर देती है . पिछली जांच में पता चला कि लीवर फेटी हो रहा है और क्रिटेनाइन भी मामूली बढ़ा हुआ आया है.

मेरा शरीर अब बीमारियों की हवेली बनता जा रहा है, वह बताते हैं, इसकी बड़ी वजह पैसे से बिगड़ी लाइफ स्टाइल है. लापरवाही भी भारी पड़ रही है कि वक्त रहते संभल जाता तो यह नौबत नहीं आती लेकिन अब तो संभलने का वक्त भी हाथ से फिसल गया है. वह तिक्त स्वर में बताते हैं क्योंकि पैंक्रियाज में बनने बाले दो एन्जाइम्स लाइपेज और एमाइलेज भी कुदरती तौर पर नहीं बन रहे. इससे नया डर जो दहशत की शक्ल ले चुका है वह पेंक्रियोटाइटिस नाम की घातक बीमारी का है जिसका कोई इलाज नहीं इसकी सर्जरी भी आसान नहीं.

उनकी कमाई का एक बड़ा हिस्सा डाक्टरों, दवाइयों आर जांचो पर खर्च हो रहा है और अनिश्चितता बनी हुई है सो अलग. अब दूध, दलिया और खिचड़ी भी एहतियात के साथ खाना पड़ते हैं कि क्या पता कब क्या थोडा सा भी कम ज्यादा खा लेने से सुगर बढ़ जाए या कम हो जाए , लीवर पर असर न हो और किडनी और ज्यादा डेमेज न हो. उनके साथी इंजीनियर मजे से जिंदगी जी रहे हैं हालाँकि उम्र के मुताबिक छुटपुट बीमारियाँ उन्हें भी हैं लेकिन इस हद तक नहीं कि दिन का चैन छिन जाए और रातों की नींद भी उड़ जाए.

एक ही वक्त में पैसा सचिन तेंदुलकर पर भी विनोद कांबली से ज्यादा बरसा था. लेकिन वे बौराए नहीं और अपना पूरा फोकस अपने खेल और कैरियर पर रखा. साल 1993 से लेकर 1995 तक जब सचिन सुबह उठकर नेट प्रेक्टिस कर रहे होते थे, वर्जिश कर रहे होते थे , बेटिंग के नए नए गुर सीख रहे होते थे और डाइट फालो कर रहे होते थे तब कांबली बिस्तर में पड़े पिछली रात की खुमारी उतरने का इंतजार कर रहे होते थे.

नतीजा सामने है अरबपति हो चुके सचिन तेंदुलकर की फिटनेस दुनिया देख रही है और कंगाल हो चुके विनोद कांबली का कोई नाम भी नहीं लेता जो सचिन की तरह कैरियर पर ध्यान देते तो उनसे काफी आगे होते. क्योंकि क्रिकेट के पंडित आज भी मानते हैं कि कांबली तेंदुलकर से ज्यादा टेलेंटेड और वेरायटी शाट्स बाले बेट्समेन हैं. लेकिन जिस पैसे की ख्वहिश लिए वे क्रिकेट में आए थे उसी पैसे ने उन्हें कहीं का नहीं छोड़ा. Cricketer Struggle Story

 

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