Elderly Prisoners: अस्सी और नब्बे साल की उम्र घर परिवार के साथ बिताने की होती है. अगर इस उम्र में कोई जेल में पड़ा हो तो जाहिर है कोई खूंखार मुजरिम ही होगा लेकिन भारत की जेलों में पड़े उम्रदराज कैदियों में ज्यादातर वो लोग हैं जो लम्बे समय से विचाराधीन हैं या अपनी सजा पूरी कर चुके हैं फिर भी उनकी कोई सुनवाई नहीं. कभी कभी सरकार की अनुकम्पा पर ऐसे कैदियों की रिहाई होती है और फिर इस रिहाई को उपलब्धि बताकर सरकार अपनी पीठ खुद थपथपा लेती है. 2 अक्टूबर को ऐसा ही कुछ बिहार में हुआ है.

2 अक्टूबर को गांधी जयंती के दिन केंद्रीय कारा बक्सर से 4 बुजुर्ग कैदियों की रिहाई हुई. इनमें 84 साल के हरिवंश राम, रामवृक्ष कोइरी की उम्र 93 साल है, रामाश्रय कोइरी 80 वर्ष के हैं और सत्यनारायण राम की आयु 83 वर्ष की है. सभी रोहतास सासाराम के रहने वाले हैं. इसी दिन मुक्त कारागार बक्सर से 3 से पटना के रहने वाले 73 साल के विश्वनाथ यादव, पश्चिमी चम्पारण के 81 साल के हंसराज चमार और सहरसा के निवासी 78 साल के बलराम की रिहाई हुई.

प्रक्रिया के मुताबिक जिला स्तरीय समिति की अनुशंसा पर राज्य स्तरीय समिति ने उम्र, लंबे समय तक जेल में रहने का समय, आचरण और स्वास्थ्य को देखते हुए इन कैदियों की रिहाई को मंजूरी दी. 2 अक्टूबर को जेल का दरवाजा खुलने पर इन बुजुर्ग कैदियों के परिवार के लोग जेल के बाहर इंतजार कर रहे थे.

बक्सर की जेल से 2 अक्टूबर को जो सात बुजुर्ग बाहर आए, उनकी कहानी न्याय की नहीं, अन्याय की कहानी है. 73 साल के विश्वनाथ से लेकर 93 साल के रामवृक्ष तक, इन लोगों ने अपनी पूरी जिंदगी जेल की सलाखों के पीछे काट दी. सवाल यह है कि अगर इन्हें आज छोड़ा जा सकता था तो इन्हें दशकों तक अंदर क्यों रखा गया? क्या इसलिए कि इनके पास बड़े वकील करने के लिए पैसा नहीं था? ये गरीब थे, दलित थे, पिछड़े समाज से आते थे. यही भारतीय न्याय व्यवस्था का सबसे कड़वा सच है.

इस देश में न्याय अमीरों के लिए तुरंत मिलता है और गरीबों के लिए यह तारीखों की लम्बी प्रक्रिया बन जाती है. बड़े लोग अरबों का घोटाला करके भी जमानत पर बाहर घूमते हैं, उनके केस हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में सुने जाते हैं लेकिन बक्सर के ये सात बुजुर्ग, जिनकी उम्र अब चलने फिरने की भी नहीं बची, वो आचरण अच्छा होने के बाद भी सिर्फ सरकार की अनुकम्पा का इंतजार करते रहे. गांधी जयंती पर सरकार ने एहसान किया तब जाकर इन बेबस कैदियों की रिहाई का दरवाजा खुला. यह अधिकार नहीं, दया थी. गरीबों, दलितों और मुस्लिमों को इस सिस्टम में न्याय के नाम पर दया ही मिलती है, हक नहीं मिलता.

सोचिए, 93 साल का आदमी जब जेल से बाहर आएगा तब उसकी जवानी, उसका परिवार, उसके सपने सब खत्म हो चुके होंगे. अब रिहाई का क्या मतलब रह जाएगा? सिस्टम ने उसकी जिंदगी ले ली और बदले में अनुकम्पा पर रिहाई का एक कागज थमा दिया. जब वकील महंगा हो, अपील की फीस न हो, पैरवी करने वाला कोई न हो और जाति छोटी हो तब यही होता है. इसमें कोई आश्चर्य नहीं की भारतीय जेलों में बंद 76 फीसदी कैदी वो हैं जिन्हें कोर्ट ने अभी मुजरिम साबित नहीं किया है मतलब यह कि ये कैदी अभी विचाराधीन हैं और इन विचाराधीन कैदियों में ज्यादातर गरीब, दलित, आदिवासी और मुस्लिम हैं. यह कैदी सालों से बिना सजा के सजा काट रहे हैं.

बक्सर की यह घटना साबित करती है कि भारत का न्याय तंत्र अमीरों की जेब में है. गरीब के लिए जेल ही अदालत है और जेल ही फैसला. जब तक पैसा और जाति का प्रभाव न्याय पर हावी रहेगा, तब तक विश्वनाथ और रामवृक्ष जैसे हजारों बुजुर्ग जेलों में मरते रहेंगे और सिस्टम गांधी जयंती पर फोटो खिंचवाकर अपनी पीठ थपथपाता रहेगा. Elderly Prisoners

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