Gen Z protest: जेन जी (Gen Z – 1997 से 2012 के बीच पैदा हुए लोग) ने मौजूदा पक्षपाती शासनप्रशासन के लिए बड़ी मुसीबत खड़ी कर दी है. सरकारी अमला पहले जंतरमंतर पर जेनजी के लड़केलड़कियों से निबटा, किसी तरह उन की मांग मान कर उन्हें वहां से हटाया, अब जेन एल्फा (वर्ष 2013 से 2025 के बीच पैदा होने वाले बच्चे) के नाम से जानी जाने वाली जेनरेशन सरकारी स्कूलों को ठीक कराने के लिए सारे देश में सक्रिय हो गई है. शासनप्रशासन चाहते तो यह हैं कि चाहे जेनजी हो या जेन एल्फा, सब को डराधमका कर गोलियों व लाठियों से सबक सिखा दिया जाए और बता दिया जाए कि गन पौवर कितनी बड़ी है लेकिन ये पीढ़ियां हैं कि मानती ही नहीं.
जेनजी के प्रोटैस्ट से निबटने के लिए जंतरमंतर के आसपास हजारों पुलिसवाले तैनात कर दिए गए थे. हर अफसर के पास पिस्टल और जवानों के पास लाठियां थीं. कहा तो यह जाता है कि कुछ लाठियों में कीलें लगी थीं. जंतरमंतर के चारों ओर सैकड़ों प्राइवेट बसें खड़ी थीं कि अमित शाह का हुक्म आते ही जेनजी प्रदर्शनकारियों को बसों में ठूंस कर सैकड़ों मील दूर जेलों में ठूंस दिया जाएगा. कई स्टेडियमों को अस्थाई जेल घोषित करने, इंटरनैट बंद करने, प्रदर्शनकारियों के लिए आ रहा खाना रोकने और बारिश से बचने के लिए तिरपाल तक न लाने देने की खबरें उड़ीं. फिर भी जेनजी पीढ़ी डटी रही. अब उसी की छोटी बहन जेन एल्फा स्कूलों में धरने दे रही है.
दोनों जेनरेशन (जेनजी और जेन एल्फा) कोई आसमान नहीं मांग रहीं. बस एक ही मांग है- हमारे स्कूल ठीक कर दो. भगवा मंडली की छत्रछाया में पिछले 30 सालों में जेनजी के लीडर्स ने जब से राम मंदिर को बनाने देश का पहला उद्देश्य बनाया, तब से एजुकेशन बैकफुट पर चली गई खासतौर पर उन बच्चों के लिए जो सरकारी स्कूलों की जेन एल्फा से निकल कर आते हैं. ये वही बच्चे हैं जो कांवड़ ढो कर सैकड़ों मील चल सकते हैं, रातरातभर मंदिर के आगेपीछे होने वाले जागरण व नाचगाने में शामिल हो सकते हैं. लेकिन जब पढ़ाई की बात आती है तो सरकारी स्कूल की हालत खस्ता मिलती है, टीचर तक नहीं मिलते. ये बच्चे ही फीडर स्टौक हैं जो मिलेनियल (वर्ष 1981 से 1996 के बीच पैदा होने वाले) पीढ़ी, जिसे जेनरेशन वाई भी कहते हैं, के नेताओं को भगवा कपड़े पहना कर गद्दी पर बैठाते हैं, टैंपल बिजनैस चमकाते हैं और सिस्टम यानी व्यवस्था में चोरी/भ्रष्टाचार करने की इजाजत देते हैं.
जेन एल्फा जो मांग रही है वह सरकार के लिए शायद इंपौसिबल है. इस पीढ़ी की मांग है कि देश के सभी, खासतौर से सरकारी, स्कूल ढंग से चलें. स्कूल के ढंग से चलने का मतलब ऐसा स्कूल जिस में एक भी टीचर की सैलरी कभी न कटती हो, जिस में प्रिंसिपल के कमरे की लाइट, पंखे और एसी कभी खराब न होते हों, जिस में बजट का पूरा पैसा समय पर आ जाता हो लेकिन कोई बाहरी औडिट नहीं करता हो कि वह ढंग से खर्च हुआ या नहीं, जिस के पास जरूरत से ज्यादा लैंड बाहर पड़ी हो.
जेन एल्फा पीढ़ी आज एजुकेशन की कीमत समझ रही है. हो सकता है लैंग्वेज मीडियम या पैसे की वजह से वह पढ़ने में पीछे हो इसलिए कि उस के टीचर क्लास में नहीं आते, पढ़ाते नहीं. फिर भी वह पढ़ती है, आगे बढ़ती है.
फैक्ट्स क्या कहते हैं, देखिए. 2025 के बोर्ड रिजल्ट्स के मुताबिक इंग्लिश मीडियम वाले सीबीएसई द्वारा आयोजित 12वीं की परीक्षा में 16.92 लाख बच्चे बैठे और 88.39 प्रतिशत पास हुए, जिन में 1 लाख 15 हजार से ज्यादा बच्चों ने 90 प्रतिशत से ऊपर अंक हासिल किए. सीबीएसई की 10वीं की परीक्षा में 23.71 लाख बच्चे बैठे, 93.66 प्रतिशत पास हुए और करीब 1 लाख 99 हजार बच्चों ने 90 प्रतिशत से ज्यादा मार्क्स लिए.
वहीं, लैंग्वेज मीडियम वाले स्टेट बोर्ड्स में सरकारी स्कूलों के बच्चों ने कमाल किया. केरल के 39 हजार से ज्यादा, तमिलनाडु के 26 हजार और कर्नाटक के डेढ़ लाख से ज्यादा सरकारी स्कूलों के बच्चों ने 90 प्रतिशत से ज्यादा अंक पाए, क्योंकि इन राज्यों में जोर एजुकेशन पर है, मंदिर पर नहीं.
पूरे देश के स्टेट बोर्ड्स की 12वीं में करीब 5 लाख जेन एल्फा के बच्चों ने 90 प्रतिशत से ऊपर स्कोर किया. उत्तर प्रदेश, जिस के स्कूल सब से ज्यादा खराब बताए जाते हैं, वहां भी लाखों जेन एल्फाओं ने फर्स्ट डिवीजन ली, जबकि आरोप है कि वहां टीचर मौज करते हैं, क्लास में प्राइवेट कोचिंग चलती है और रिश्वत दे कर नियुक्तियां हथियाई जाती हैं.
सच यह है कि जेन एल्फा वाले रिस्पौन्सिबल हैं जबकि जेन वाई और जेन जी के एक हिस्से वाले, जिन के पास पावर है, टैक्सपेयर्स का पैसा है, पुलिस है, स्कूल है, इररिस्पौन्सिबल हैं, अनकेयरिंग हैं. वे खुद को अनटचेबल मानते हैं और जम कर हिंदूमुसलिम करते हैं. जेन एल्फा उन्हें लैसन सिखा रही है, उन की क्लास ले रही है. थैंक्यू जेन एल्फा. Gen Z protest





