Ragging Incident: पक्की खबर है कि होली से लौटने के बाद 11 मार्च, 2023 की रात छत्तीसगढ़ राज्य के कवर्धा जिले के बोड़ला ब्लौक के तरेगांव स्थित एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय में 11वीं के छात्रों ने 6ठी के छात्रों की जहां जम कर रैगिंग ली, वहीं घटना का वीडियो बना कर लाइक व कमैंट के चक्कर में उसे इंस्टाग्राम पर प्रसारित कर दिया.
रैगिंग के दौरान सीनियर छात्रों ने जूनियर छात्रों के न केवल बाल काटे बल्कि अपितु उन की लातघूंसों से जीभर कर मरम्मत भी की. उसी दौरान कुछ सीनियर छात्रों ने घटना का वीडियो बनाया और अगले दिन वाहवाही के फेर में इंस्टाग्राम में पोस्ट कर दिया.
जबकि, जूनियर छात्र सहमेसहमे व डरेडरे से रहे. उन्होंने इस की शिकायत खौफ के मारे कहीं नहीं की. वीडियो देखने के बाद जब घटना की सूचना जिला कलैक्टर को लगी, तब स्थानीय प्रशासन की आंखें खुलीं. वह हरकत में आया. प्रारंभिक जांच कर 7 नाबालिगों समेत 8 छात्रों के खिलाफ नामजद केस दर्ज किया.
फिर मामले की गंभीरता के मद्देनजर और सियासी हलकों व पालकों के दबाव को देखते हुए एक बालिग छात्र को जेल व 7 नाबालिग छात्रों को बाल सुधारगृह भेज दिया. साथ ही साथ, छात्रावास अधीक्षक मालिक राम मरकाम को जहां निलंबित किया, वहीं स्कूल के प्राचार्य प्रमोद प्रकाश को शोकौज नोटिस जारी कर दिया गया.
कहने को तो स्कूलोंकालेजों व उन के होस्टलों में यूजीसी, सीबीएसई और राज्यों के बोर्डों द्वारा रैगिंग के सख्त नियम बनाए गए हैं और हरेक स्कूलकालेज व होस्टल में एंटीरैगिंग सैल का गठन किया गया है लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि हर स्कूल और कालेज में आज भी रैगिंग बदस्तूर जारी है. इस का जीताजागता सुबूत कवर्धा जिले की उक्त घटना है, जिस में रगड़ाई के भुक्तभोगी जूनियरों ने खौफ के चलते मुंह बंद रखना उचित समझा.
बता दें कि छग की राजधानी रायपुर के पेंशनबाड़ा और दीनदयाल उपाध्याय नगर होस्टल में कुछ साल पहले आदिवासी छात्रों से रैगिंग का सनसनीखेज मामला सामने आया था. उस पर संज्ञान लेते हुए आदिवासी विकासमंत्री ने सभी होस्टलों में एंटीरैगिंग सैल गठित करने के निर्देश दिए थे. बावजूद इस के, प्रदेश में एंटीरैगिंग कानून का पालन गंभीरता से नहीं किया जा रहा.
नवप्रवेशित, खासकर ग्रामीण परिवेश से आ कर शिक्षण संस्थाओं व होस्टलों में नएनए दाखिला लिए हुए, विद्यार्थियों के लिए रैगिंग अब भी खौफ का पर्याय बना हुआ है.
यही वजह है कि रैगिंग से न केवल विद्यार्थी बल्कि उन के पालक तक खौफजदा रहते हैं कि न जाने कब उन के चिरागों के साथ कोई दर्दनाक हादसा घट जाए कि वह उसे दिल में ले बैठे और आपे से बाहर हो कर कोई आत्मघाती कदम उठा ले. यही वजह है कि साल 2009 में डा. राजेंद्र प्रसाद मैडिकल कालेज, धर्मशाला में रैगिंग से प्रताड़ित विद्यार्थी अमन काचरू की मृत्यु ने मुल्क को हिला कर रख दिया था.
उस दिल दहलाने वाली मौत से भारत के सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए एक उपसमिति का गठन किया था, जिस ने रैगिंग को शिक्षण संस्थानों का नासूर बताया था और इस को परिभाषित कर इस के खिलाफ नियम बनाने पर बल दिया था. उस के बाद यूजीसी ने रैगिंग को परिभाषित किया और नियम बनाया, जो समस्त शिक्षण संस्थाओं में आज भी लागू है.
इतना ही नहीं, छात्रों के अधिकारों के लिए नैशनल कमीशन फौर प्रोटैक्शन औफ चाइल्ड राइट्स यानी एनसीपीसीआर ने नवंबर 2017 में सभी निजी व सरकारी संस्थानों में चल रहे होस्टलों के लिए गाइडलाइन बनाई थी.
बावजूद इस के, तमाम राज्यों में पिछले 10 बरसों में हजारों मामले रैगिंग के आ चुके हैं. ज्यादातर प्रकरणों में लीपापोती कर दी जाती है. मामले को जानबूझ कर दबाया व छिपाया जाता है. वजह, छात्रावासों व कालेजों में रैगिंग के नियमों का कड़ाई से पालन न होना है.
यह भी जाहिर है कि ज्यादातर छात्रावासों में अनधिकृत रूप से बाहरी लोग रहने लगते हैं और छात्रावास व कालेज प्रबंधन आंखें मूंदें बैठे रहता है.
गाइडलाइन के मुताबिक, होस्टल संचालक का नाम, पता, मोबाइल नंबर, छात्रावास में निवास करने वाले छात्रछात्राओं की संख्या, कमरों की संख्या, बेड संख्या की जानकारी न केवल होस्टल के सूचना फलक पर चस्पां करनी होती है बल्कि इस की जानकारी उच्चाधिकारियों को भी दी जानी होती है.
खेद का विषय यह है कि फंसने वाली ऐसी जानकारी जानबूझ कर छिपा दी जाती है. कालेज हो या होस्टल, किसी विद्यार्थी की रैगिंग होना न केवल संगीन अपराध है बल्कि विद्यार्थी जीवन में लगने वाला एक ऐसा आघात व बदनुमा दाग है जो विद्यार्थी को शारीरिक व मानसिक तौर पर झकझोर कर रख देता है.
अगर विद्यार्थी गांव से शहर पढ़ने आया हुआ है और पहले साल ही रैगिंग का शिकार हो जाता है, तो वह पूरी तरह टूट जाता है या फिर उस में बदले की भावना पनपने लगती है.
उस की यह पीड़ा हताशा या अवसाद में बदल जाती है, जो उस को अपराध की दुनिया में ले जाती है. कुल मिला कर रैगिंग से त्रस्त छात्र का कैरियर बरबाद होना तय माना जाता है.
रैगिंग पर सख्ती के बावजूद इस से जुड़ी घटनाओं में इजाफा देख कर यूजीसी ने राज्य सरकारों को भी जवाबदेह बनाने की योजना पर काम किया है.
इसे ले कर पहली बार सभी राज्यों के मुख्य सचिवों व उच्चशिक्षा सचिवों को चिट्ठी लिख कर मदद मांगी गई है. इस में रैगिंगमुक्त राज्य बनाने सहित इन नियमों को तोड़नेवालों के खिलाफ सख्ती से पेश आने को कहा गया है.
विदित हो कि रैगिंग को ले कर यूजीसी की मुहिम पहले विश्वविद्यालय और दूसरे शिक्षण संस्थानों तक ही सीमित थी. इस में खास बात यह है कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी यूजीसी ने राज्यों को यों ही चिट्ठी लिख कर मदद नहीं मांगी है बल्कि यह मदद तब मांगी है जब उस की कोशिशों के बाद भी रैगिंग की घटनाओं में कोई खास कमी नहीं दिखी है.
यूजीसी के मुताबिक, कई मामले ऐसे भी दर्ज हुए हैं जिन में रैगिंग ने किसी की जिंदगी को खत्म कर दिया, किसी परिवार को उजाड़ दिया, किसी को आत्महत्या के लिए प्रेरित किया, तो कई परिवार संतानहीन हो गए.
रैगिंग के मामले में विश्वविद्यालय, महाविद्यालय या विद्यालय प्रशासन ही पूरी तरह से दोषी है, जो रैगिंग सामने आने पर उस को ढ़ांकने के काम में जुट जाता है. जबकि होना यह चाहिए कि एंटी रैगिंग सैल शैक्षणिक सत्र में निरंतर सक्रिय रहे. हरेक मामले का तत्काल संज्ञान ले. तुरंत समझाइश दे. त्वरित जांचपड़ताल करे और दोषी छात्रों को दंडित करे, ताकि कानून का भय कायम रहे.
जहां तक कायदेकानून की बात है, यूजीसी के मुताबिक किसी छात्र या छात्रा को उस के रंगरूप, पहनावे को ले कर टिप्पणी करना, बेढंगे नामों से पुकारना व प्रताड़ित करना रैगिंग कहलाता है.
विद्यार्थियों की क्षेत्रीयता, भाषा, जाति, नस्ल, पारिवारिक पृष्ठभूमि के आधार पर उस को लज्जित करना भी रैंगिग माना जाता है.
छात्रों से उन की मरजी के बिना जबरन किसी प्रकार का अनावश्यक कार्य करवाना रैगिंग के दायरे में आता है.
रैगिंग एक दंडनीय अपराध होने के साथसाथ विद्यार्थी के भरोसे को तोड़ने वाली घटना है. एंटीरैगिंग कानून के तहत दोषी पाए जाने पर रैगिगकर्ता को 3 साल की सश्रम कैद और आर्थिक दंड लगाए जाने का प्रावधान है. यह सजा नाकाफी व एकांगी है. इस के लिए स्कूलकालेज व होस्टल प्रबंधन को भी दोषी ठहरा कर सजा मुकर्रर किया जाना जरूरी है, ताकि वे कानून के खौफ से जहां स्वयं नियमकायदों का संजीदगी से पालन करते रहें, वहीं अन्यों से भी करवाते रहें. Ragging Incident
लेखक – वीरेंद्र देवांगन





