Cockroach Janta Party: शिक्षा व्यवस्था से लेकर सरकारी स्कूलों की बदहाली और अब चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली तक सवाल उठाने वाली कॉकरोच जनता पार्टी सत्ता और संवैधानिक संस्थाओं के दरवाजे पर लगातार दस्तक दे रही है. मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग और एसआईआर के खिलाफ उसके आंदोलन ने बहस को और तीखा कर दिया है. सवाल सिर्फ कॉकरोच जनता पार्टी का नहीं, बल्कि यह है कि क्या लोकतंत्र में सत्ता और संस्थाओं को लगातार जनता के सवालों के कठघरे में खड़ा करने वाले प्रेशर ग्रुप जरूरी हैं?
भारतीय जनता पार्टी के दलाल बने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने जिस तरह मनमाने तरीके से देश भर में मतदाता सूची विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान (एसआईआर) चला कर 13 करोड़ से अधिक लोगों से उनके मतदान के अधिकार को छीना है, उससे खीज कर कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने सोशल मीडिया पर लिखा – “Gyanesh, it’s done bro.” अगले ही दिन 24 सितंबर को दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई और ज्ञानेश कुमार को 48 घंटे के अंदर इस्तीफा देने की मांग रख दी.
पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने कहा यदि ज्ञानेश कुमार इस्तीफा नहीं देते हैं यो कॉकरोच देशव्यापी आंदोलन करेंगे और यह आंदोलन पिछले जंतर मंतर के आंदोलन से कहीं बड़ा होगा.
इस्तीफे के अल्टीमेटम के बीच अचानक रद्द हुए दौरे
मजे की बात यह कि ज्ञानेश कुमार को 25 सितंबर को मेरठ और 28 सितंबर को वाराणसी में युवा मतदाता जागरूकता कार्यक्रमों में जाना था. इन दोनों ही जगहों पर ज्ञानेश कुमार उस युवा वर्ग को सम्बोधित करने वाले थे जिनमें से अधिकांश लोगों को एसआईआर के जरिये मतदान के अधिकार से वंचित किया जा चुका है. चुनाव आयोग ने दोनों कार्यक्रम स्थगित कर दिए. आयोग ने इसकी वजह लॉजिस्टिक और अन्य प्रशासनिक कारण बताई और कहा कि इसका एसआईआर विवाद से कोई संबंध नहीं है. मगर सच्चाई तो छुप नहीं पाई.
फजीहत से डरे ज्ञानेश
याद होगा कि देश के बेरोजगार युवाओं के लिए कॉकरोच शब्द इस्तेमाल करने के बाद किस तरह सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत के हाथों से देश के प्रतिष्ठित कानून विश्वविद्यालय NALSAR के लॉ स्टूडेंट्स ने डिग्री लेने से मना कर दिया था. 450 से अधिक छात्रों ने चीफ जस्टिस को दीक्षांत समारोह का मुख्य अतिथि बनाने के प्रस्ताव पर असहमति जाहिर की थी और सवाल उठाया था कि जिस व्यक्ति की टिप्पणियों से युवाओं का अपमान हुआ है, क्या उसी के हाथों डिग्री लेनी होगी? देश भर में यह मामला सुर्ख़ियों में रहा और शायद उस फजीहत को याद करके ही मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने भी मारे डर के अपना दौरा रद्द किया.
अचानक तीन कुर्सियां एक साथ दिखाई दीं
लेकिन कहानी में मजेदार मोड़ इसके बाद आया. चुनाव आयोग ने आनन फानन में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई और अचानक तीन कुर्सियां एक साथ दिखाई देने लगीं. मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के साथ दोनों आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी से यह कहलवाया गया कि चुनाव आयोग में सभी फैसले तीनों की रजामंदी से होते हैं.
चिट्ठियां बाहर आईं तो सवाल गहराये
हालांकि कुछ दिन पहले ही दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों से संबंधित अनेक बातें सामने आयी थीं, वह चिट्ठियां निकल आयी थीं जो आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने लिखी थीं और जिसमें कहा गया था कि ज्ञानेश कुमार मनमाने तरीके से सभी फैसले ले रहे हैं, जो असंवैधानिक और लोकतान्त्रिक प्रक्रिया के खिलाफ हैं. इसके बाद ही कॉकरोच जनता पार्टी ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग करते हुए सवाल उठाया था कि आखिर चुनाव आयोग में फैसले कैसे होते हैं? कौन फैसला करता है? क्या मुख्य चुनाव आयुक्त अकेले निर्णय लेते हैं? क्या बाकी आयुक्त सहमत होते हैं?
और फिर देश ने देखा कि तीनों चुनाव आयुक्त एक साथ सामने आए. अचानक आवाज आई – “भाइयों, घबराइए मत, हम तीनों साथ हैं.” सवाल यह कि अगर सब कुछ ठीक था तो फिर सफाई देने की जरूरत क्यों पड़ी? अगर कॉकरोच दरवाजे तक न आते तो क्या बैठक इतनी जल्दी होती?
मेरठ से वाराणसी तक कॉकरोच का डर?
सीजेपी के कॉकरोच शायद इस पूरे घटनाक्रम को देखकर मुस्कुरा रहे होंगे. सोच रहे होंगे कि हमने तो केवल इस्तीफा मांगा था, कार्यक्रम तो आपने खुद स्थगित कर दिया!
तो क्या कॉकरोच जनता पार्टी इतनी शक्तिशाली हो गई है कि उसकी एक दहाड़ पर चुनाव आयोग का कार्यक्रम कैलेंडर कांपने लगे? भारतीय लोकतंत्र में यह बहुत दिलचस्प चीज देखने को मिल रही है. एक समय था जब चुनाव आयोग आम जनता के लिए लोकतंत्र की सुरक्षा, जनता के वोट की सुरक्षा और लोकतंत्र में विश्वास बनाये रखने का दूसरा नाम था. जनता के मन में चुनाव आयुक्त के प्रति सम्मान था, मगर आज मोदी सरकार ने पूरे तंत्र को इतना सड़ा दिया है कि सोशल मीडिया पर मुख्य चुनाव आयुक्त के लिए नाम लेकर लिखा गया – “Gyanesh, it’s done bro.” ज्ञानेश कुमार के लिए इससे ज्यादा जिल्लत की बात क्या होगी? खासकर तब जब एक तरफ इस्तीफे का अल्टीमेटम हो और दूसरी तरफ कार्यक्रम स्थगित हो जाए.
कॉकरोच आखिर चाहता क्या है?
कॉकरोच जनता पार्टी आज देश में एक प्रेशर ग्रुप की तरह काम कर रहा है. यह प्रेशर दरअसल विपक्षी पार्टियों को सरकार पर बना कर रखना चाहिए था, मगर विपक्ष खुद इतने टुकड़ों और अपनी अपनी क्षुद्र इच्छाओं के कुचक्र में फंसा है कि सरकार की मनमानियों को रोकने का दम उसमें नहीं बचा है. इसलिए कॉकरोच सामने आये हैं. सीजेपी का कहना है कि अगर मतदाता के वोट का भरोसा कमजोर हुआ तो स्कूल, नौकरी, सड़क, महंगाई सब पर आंदोलन का अर्थ कम हो जाएगा. इसलिए अब उसका अगला बड़ा सवाल चुनावी प्रक्रिया को लेकर ही है.
चुनाव के समय जनता महत्वपूर्ण, चुनाव के बाद क्यों नहीं?
भारत के लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि चुनाव के समय जनता बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है और चुनाव खत्म होते ही उसकी आवाज नक्कारखाने में तूती की आवाज बन कर रह जाती है. ऐसे माहौल में अगर कोई समूह सत्ता के सामने खड़ा होकर लगातार सवाल पूछने लगे, धरना दे, सरकारी स्कूलों की हालत कैमरे में कैद करे, अधिकारियों से जवाब मांगे, चुनावी व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल उठाने लगे, तो उसकी भूमिका पर बहस होना स्वाभाविक है.
इसी संदर्भ में कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी का उभार दिलचस्प है. नाम भले ही व्यंग्यात्मक हो, लेकिन पिछले कुछ महीनों में इस समूह ने भारतीय सार्वजनिक जीवन में एक गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या लोकतंत्र में सरकारों को लगातार जनता के दबाव में रखना भी जरूरी है? और जवाब है ‘हां, बहुत जरूरी है’.
मांग, बहस और अगला सवाल
सीजेपी बहुत ही ख़ास रणनीति के तहत आगे बढ़ रही है. उसने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे के साथ एसआईआर रोकने और आगामी चुनावों पर रोक लगाने जैसी मांगें रखी हैं. यह मांगें राजनीतिक रूप से बहुत बड़ी मालूम पड़ती हैं. लेकिन आंदोलन की राजनीति में यही रणनीति है.
पहले मांग बड़ी रखो, फिर बहस बड़ी होगी.
बहस बड़ी होगी तो मीडिया और सोशल मीडिया में चर्चा होगी.
जनता सवाल उठाएगी.
जनता पूछेगी तो संस्था को जवाब देने के लिए आगे आना होगा.
और संस्था जवाब देगी तो कॉकरोच फिर अगला सवाल लेकर खड़ा हो जाएगा.
यही प्रेशर ग्रुप की राजनीति है.
चुनाव आयोग की सबसे बड़ी परीक्षा
सीजेपी सवाल पूछती रहेगी.आज ज्ञानेश कुमार. कल एसआईआर, परसों ईवीएम, उसके बाद वीवीपैट, फिर मतदाता सूची, फिर चुनावी सॉफ्टवेयर, फिर नियुक्ति प्रक्रिया, फिर चुनाव आयोग की शक्तियां. सवालों की यह ट्रेन रुकने वाली नहीं है.
ज्ञानेश कुमार को इस्तीफा देना है या नहीं, यह सवाल अलग है. सीजेपी ने 48 घंटे का अल्टीमेटम दिया था. ज्ञानेश कुमार ने इस्तीफा नहीं दिया. इसलिए आंदोलन की तत्काल मांग पूरी नहीं हुई. लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि सीजेपी हार गई. क्योंकि प्रेशर ग्रुप का खेल चुनावी जीत-हार से अलग होता है. वह सरकार गिराने नहीं निकलता, बल्कि वह सरकार को असहज करने निकलता है. वह मंत्री को हराने नहीं निकलता बल्कि वह मंत्री को जवाब देने पर मजबूर करता है. वह अधिकारी को हटाने से ज्यादा महत्वपूर्ण समझता है कि अधिकारी जनता के सवाल का जवाब दे. और जब मामला चुनाव आयोग तक पहुंच जाए तो उसका लक्ष्य और बड़ा हो जाता है. उसे मतदाता को यह भरोसा दिलाना है कि उसका वोट सुरक्षित है और चुनावी प्रक्रिया पर सवाल पूछना उसका अधिकार है.
कॉकरोचों की बड़ी खूबी है कठिन परिस्थिति में भी जिंदा रहना
कॉकरोचों की एक जैविक विशेषता होती है. वे बहुत कठिन परिस्थितियों में भी जिंदा रह लेते हैं. कॉकरोच को मारना आसान है, लेकिन उसकी सबसे बड़ी ताकत उसकी संख्या और जीवित रहने की क्षमता है. एक व्यक्ति को गिरफ्तार किया जा सकता है. दस लोगों को रोका जा सकता है. सौ लोगों को समझाया जा सकता है. लेकिन अगर हजारों लोग अपने-अपने गांव और शहर की बदहाली की तस्वीरें सोशल मीडिया पर पोस्ट करने लगें तो वह सार्वजनिक सवाल बन जाता है और और सरकारें सार्वजनिक सवालों से बच नहीं सकतीं.
कॉकरोच इसी सिद्धांत पर चल रहे हैं. उन्हें सत्ता नहीं चाहिए. उन्हें सरकारी बंगला नहीं चाहिए. उन्हें मंत्री पद नहीं चाहिए. उन्हें टिकट नहीं चाहिए. उन्हें चाहिए बस कैमरा, माइक, सड़क और सोशल मीडिया, राजनीति को हिलाने के लिए यह काफी है.
एक वीडियो बनाइए. एक सवाल पूछिए. एक हैशटैग चलाइए. फिर देखिए, जिस अधिकारी तक पहुंचने के लिए जनता महीनों चक्कर काटती है, वह अगले दिन प्रेस कॉन्फ्रेंस करके उनकी बात सुनने, समस्याओं का निदान करने का वादा करता नजर आएगा.
शिक्षा मंत्री से चुनाव आयोग तक कॉकरोचों का कोहराम
सीजेपी ने खुद को एक युवा प्रेशर ग्रुप के रूप में स्थापित किया है. जून में परीक्षा व्यवस्था और पेपर लीक के सवाल पर इसका आंदोलन दिल्ली के जंतर-मंतर तक पहुंचा. कई सप्ताह चले आंदोलन के बाद 25 जुलाई 2026 को तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया. इसके बाद सीजेपी ने आंदोलन को अपनी बड़ी जीत बताया और प्रदर्शन समाप्त कर दिया. यह किसी भी लोकतंत्र के लिए मामूली घटना नहीं थी.
किसी मंत्री का इस्तीफा केवल एक व्यक्ति का पद छोड़ना नहीं होता. वह यह संदेश भी देता है कि सड़क पर बैठा नागरिक, यदि लगातार और संगठित तरीके से सवाल पूछता रहे, तो सत्ता को जवाब देना ही पड़ेगा.
शिक्षा के मुद्दे से निकलकर सीजेपी अब उस संस्था के दरवाजे पर पहुंच गई है जिसके फैसलों का सीधा संबंध लोकतंत्र की बुनियाद से है – भारत का चुनाव आयोग.
कॉकरोचों सावधान !
मगर कॉकरोचों को भी सावधान रहना होगा. व्यंग्य अपनी जगह है. उत्साह अपनी जगह है. लेकिन लोकतंत्र में आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत उसका तथ्य होता है. अगर सीजेपी चुनाव आयोग पर सवाल उठा रही है तो उसे हर आरोप के साथ दस्तावेज भी प्रस्तुत करने होंगे. अगर वह एसआईआर पर सवाल उठा रही है तो उसे मतदाता सूची, प्रक्रियाओं और संबंधित रिकॉर्ड के आधार पर बात करनी होगी.
लोकतंत्र में केवल सरकार से जवाब मांगना पर्याप्त नहीं है. आंदोलनकारियों को भी अपने दावों के लिए जवाबदेह होना पड़ता है. इसलिए सीजेपी की सफलता का अगला चरण इस बात से तय होगा कि वह अपने आरोपों को कितनी मजबूती से दस्तावेजों, आंकड़ों और स्वतंत्र जांच की मांग से जोड़ती है.
अगला निशाना ईवीएम है.यहां सीजेपी को और ज्यादा सावधानी की जरूरत होगी. क्योंकि ईवीएम से संबंधित किसी भी दावे को भावनाओं, सोशल मीडिया पोस्ट या राजनीतिक भाषण के बजाय तकनीकी प्रमाण, स्वतंत्र परीक्षण, न्यायिक रिकॉर्ड और चुनावी प्रक्रियाओं के दस्तावेजों के आधार पर रखना होगा. ईवीएम हो, वीवीपैट हो, मतदाता सूची हो या एसआईआर, हर सवाल का जवाब खुली जांच, पारदर्शी प्रक्रिया और प्रमाण से मिलना चाहिए.
सवाल जिंदा रहना चाहिए
नाम चाहे कॉकरोच जनता पार्टी हो या कोई और, लोकतंत्र को ऐसे नागरिक दबाव की जरूरत हमेशा रहेगी. क्योंकि लोकतंत्र में सबसे खतरनाक स्थिति वह नहीं है जब जनता सरकार के खिलाफ नारे लगाती है, बल्कि सबसे खतरनाक स्थिति वह है जब जनता सवाल पूछना ही बंद कर देती है. और फिलहाल कॉकरोच जनता पार्टी की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि उसने युवाओं को फिर से सवाल पूछने के लिए सड़क पर ला खड़ा किया है. Cockroach Janta Party





