Ritika Chopra: भारतीय लोकतंत्र में असली चुनाव तो वोटिंग से बहुत पहले शुरू हो जाता है. जब मतदाता सूची तैयार होती है और यह तय होता है कि किस नागरिक का नाम उस सूची में है और किसका नाम नहीं है. अगर किसी नागरिक का नाम मतदाता सूची में नहीं है तो उसके पास चाहे जितनी राजनीतिक समझ हो, चाहे वह कितने ही साल से भारत का नागरिक और मतदाता क्यों न रहा हो, चुनाव के दिन उसका वोट नहीं पड़ सकता इसलिए मतदाता सूची लोकतंत्र की बुनियादी नींव है और यह काम चुनाव आयोग का होता है लेकिन बीजेपी की सत्ता ने चुनाव आयोग को मुट्ठी में कैद कर लोकतंत्र की बुनियाद को हो खोखला कर दिया है.

23 सितंबर 2026 को द इंडियन एक्सप्रेस की पत्रकार रितिका चोपड़ा की जांच रिपोर्ट ने इसी बात को उजागर किया है. रिपोर्ट के मुताबिक चुनाव आयोग के तीन सदस्यों में से दो चुनाव आयुक्तों, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले दस महीनों में कम से कम 14 बार लिखित रूप से अपनी आपत्ति दर्ज की. इन आपत्तियों में नए मतदाताओं को जोड़ने, मतदाता सूची से नाम हटाने, नाम वापस जोड़ने, Form 6 में बदलाव और मतदाता डेटा को कंट्रोल करने वाले डिजिटल सिस्टम के बेहद महत्वपूर्ण हिस्से शामिल थे.

रितिका चोपड़ा की रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यह है कि यह जानकारी चुनाव आयोग के अंदर दर्ज किए गए दस्तावेजों और आपत्तियों से सामने आई है. द इंडियन एक्सप्रेस की जांच के मुताबिक सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने कई मौकों पर इस बात पर आपत्ति जताई कि चुनाव से जुड़े कई महत्वपूर्ण फैसले उनकी जानकारी के बिना लिए गए और बाद में उन्हें पूरे आयोग के फैसले के रूप में जारी किया गया.

रिपोर्ट के मुताबिक फॉर्म 6 में बदलाव किया गया जिससे पहली बार वोट देने वाले व्यक्ति से यह जानकारी मांगी गई कि उसका या उसके माता-पिता अथवा दादा-दादी का नाम पिछली SIR के दौरान बनी मतदाता सूची में था या नहीं? दोनों चुनाव आयुक्तों ने इस बदलाव को लेकर सवाल उठाए और कहा कि इससे युवा और पहली बार वोट देने वाले मतदाताओं को परेशानी होगी. मामला केवल Form 6 तक सीमित नहीं था. मतदाता डेटा और ECINet नाम के सेन्ट्रल डिजिटल सिस्टम को लेकर भी दोनों चुनाव आयुक्तों ने चिंता जाहिर की थी. दोनों का सवाल यह था कि अगर मतदाता सूची से जुड़े महत्वपूर्ण फैसलों की तकनीकी प्रक्रिया दिल्ली में मौजूद सेन्ट्रल सिस्टम के जरिये से कंट्रोल होगी और इसमें राज्यों के चुनाव अधिकारियों की भूमिका सीमित होगी तो जवाबदेही किसकी होगी?

इस पूरे मामले का सबसे गंभीर पहलू यह है कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने अपनी चिंताओं को केवल चुनाव आयोग के अंदर दर्ज करके छोड़ नहीं दिया. रिपोर्ट के अनुसार जब उन्हें लगा कि उनकी आपत्तियों का समाधान नहीं हो रहा है तो उन्होंने कैबिनेट सचिव तक अपनी शिकायत पहुंचाई. यानी मामला अब केवल तीन सदस्यीय चुनाव आयोग के भीतर मतभेद का नहीं रह गया, बल्कि यह सवाल बन गया है कि देश की सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्थाओं में से एक के भीतर फैसले किस तरीके से लिए जा रहे हैं?

इंडियन एक्सप्रेस की जांच के अनुसार दोनों आयुक्तों ने मतदाता सॉफ्टवेयर की जिम्मेदारियों के बंटवारे को लेकर भी कैबिनेट सचिव को पत्र लिखे. यहां एक बात साफ समझनी जरूरी है. चुनाव आयोग में मतभेद होना अपने आप में लोकतंत्र विरोधी बात नहीं है. लोकतांत्रिक संस्थाओं में असहमति होना सामान्य बात है. असली सवाल यह है कि असहमति को दर्ज करने की व्यवस्था कितनी पारदर्शी है? फैसले किस प्रक्रिया से लिए जाते हैं और जिन अधिकारियों की संवैधानिक जिम्मेदारी चुनाव की निष्पक्षता सुनिश्चित करना है, उनकी आपत्तियों का जवाब किस तरह दिया जाता है?

SIR यानी Special Intensive Revision का उद्देश्य मतदाता सूची को अपडेट करना और उसमें मौजूद गलत, मृत, स्थानांतरित या अयोग्य नामों की पहचान करना है लेकिन इस प्रक्रिया का पैमाना काफ़ी बड़ा है. द इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक जून 2025 में बिहार से शुरू हुई SIR प्रक्रिया के तीन चरणों में 30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की ड्राफ्ट मतदाता सूचियों से अब तक करीब 13.37 करोड़ नाम बाहर हुए हैं. यह संख्या SIR से पहले मौजूद मतदाताओं की तुलना में लगभग 14.1 प्रतिशत है. असली चिंता यह है कि इतने बड़े पैमाने पर नागरिकों को अपने मताधिकार को बचाए रखने के लिए दस्तावेज और प्रक्रिया के सामने खड़ा होना पड़ रहा है.

भारत में हर नागरिक के पास एक जैसा दस्तावेजी रिकॉर्ड नहीं है. शहरों में रहने वाला पढ़ा-लिखा और आर्थिक रूप से मजबूत व्यक्ति पुराने दस्तावेज निकाल सकता है, ऑनलाइन प्रक्रिया समझ सकता है और जरूरत पड़ने पर प्रशासनिक कार्यालय तक जा सकता है. लेकिन मजदूर, प्रवासी कामगार, गरीब महिला, बुजुर्ग, भूमिहीन व्यक्ति, बेघर नागरिक, आदिवासी या ऐसे परिवार जिनके पास पुराने जन्म, परिवार और निवास संबंधी रिकॉर्ड व्यवस्थित नहीं हैं उनके लिए यही प्रक्रिया एक सजा बन जाती है इसीलिए मतदाता सूची की शुद्धता के साथ-साथ यह भी देखना जरूरी है कि शुद्धता के नाम पर कोई वास्तविक नागरिक मताधिकार से बाहर न हो जाए.

इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह होना चाहिए कि मतदाता सूची सुधार की प्रक्रिया का बोझ समाज के कमजोर तबकों पर कितना पड़ रहा है? अगर किसी गरीब मजदूर का नाम गलती से सूची से बाहर हो जाता है तो उसके लिए दोबारा नाम जुड़वाना केवल एक ऑनलाइन फॉर्म भरने की बात नहीं है. उसके लिए काम से छुट्टी लेना, सरकारी कार्यालय जाना, दस्तावेज जुटाना और कई बार यह साबित करना पड़ सकता है कि वह वही नागरिक है जिसका नाम पहले मतदाता सूची में मौजूद था. यही वजह है कि SIR को लेकर बहस केवल “फर्जी वोटर हटाने” बनाम “वोटर बचाने” की राजनीतिक बहस नहीं होनी चाहिए. असली सवाल यह होना चाहिए कि सही मतदाता को बिना अनावश्यक बोझ के उसके मताधिकार की गारंटी कैसे दी जाए?

यही लोकतंत्र की असली कसौटी है. फर्जी नाम हटाना जरूरी है तो हटाए जाने चाहिए. मृत व्यक्ति के नाम हटाने हैं तो हटाए जाने चाहिए. एक व्यक्ति के कई स्थानों पर नाम हैं तो उन्हें ठीक किया जाना चाहिए लेकिन इसके साथ यह भी सुनिश्चित करना होगा कि वास्तविक मतदाता गलती से बाहर न हो जाए क्योंकि फर्जी नाम का वोट गलत है लेकिन वास्तविक नागरिक का वोट छीन लेना भी लोकतंत्र के लिए सही नहीं है. चुनाव आयोग की पूरी प्रक्रिया का उद्देश्य दोनों गलतियों को कम करना होना चाहिए.

लोकतंत्र को किसी पवित्र मंदिर या धार्मिक संस्था की तरह देखने के बजाय उसे इंसानों द्वारा बनाई गई जवाबदेह व्यवस्था के रूप में देखना ज्यादा जरूरी है. चुनाव आयोग कोई मंदिर नहीं है और चुनाव आयुक्त कोई पुजारी नहीं हैं. वे संविधान और कानून के तहत जिम्मेदारी निभाने वाले अधिकारी हैं इसलिए उनसे आस्था नहीं, जवाब मांगा जाना चाहिए. उनसे यह नहीं पूछा जाना चाहिए कि “आप पर विश्वास करें या नहीं”, बल्कि यह पूछा जाना चाहिए कि फैसला किस नियम के तहत लिया गया? किस अधिकारी ने लिया? किस रिकॉर्ड पर लिया? किस सॉफ्टवेयर में दर्ज हुआ और उस फैसले को चुनौती देने वाले नागरिक के लिए क्या रास्ता है?

बीजेपी ने 2023 में इलेक्शन कमिश्नर अपॉइंट करने का कानून बदला. पहले सेलेक्शन पैनल में चीफ जस्टिस होते थे. अब गृहमंत्री और प्रधानमंत्री का बहुमत है. ज्ञानेश कुमार इसी नए कानून से बने पहले CEC हैं. यानी जिस पार्टी को चुनाव लड़ना है, वही अंपायर चुनेगी और जब अंपायर ही एक पक्ष की फील्डिंग सेट करे तो समझो मैच फिक्स है. 2023 के कानून में आयोग के कामकाज को लेकर यह व्यवस्था भी है कि जहां तक संभव हो आयोग का काम सर्वसम्मति से किया जाए और जहां सर्वसम्मति न हो वहां बहुमत का प्रावधान लागू हो इसलिए इस पूरे विवाद का कानूनी सवाल यह है कि क्या संबंधित फैसले वास्तव में आयोग की निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार लिए गए और क्या सभी सदस्यों को निर्णय प्रक्रिया में पर्याप्त रूप से शामिल किया गया? लेकिन रितिका चोपडा की रिसर्च साबित करती है कि चुनाव आयोग में नियमों को ताक पर रख कर फैसले लिए गये.

राहुल गांधी ने इसे वोट चोरी कहा है. पी चिदंबरम ने कहा है कि अगर 2 कमिश्नर खिलाफ हैं तो CEC का फैसला कमीशन का फैसला कैसे हो सकता है? सवाल यह है कि 13 करोड़ नाम किसके कटे? उस मजदूर के जो पलायन करता है और दलित मुस्लिम और आदिवासियों के नाम सबसे ज्यादा काटे गये है क्योंकि इन कमजोर वर्गो के आधार और पते का प्रूफ भी कमजोर है. फॉर्म 6 में नया सवाल जोड़कर इसी तबके को फंसाया गया. यह नोटबंदी की तरह वोटबंदी है.

बीजेपी को पता है कि वह महंगाई, बेरोजगारी, करप्शन और IIT में साहिल वाकोडे जैसे दलित छात्रों की मौत पर वोट नहीं मांग सकती इसलिए वह वोटर लिस्ट से ही विरोधी वोटरों का वोट काट रही है. मतलब जब अपनी लाइन बड़ी न हो तो विरोधी की लाइन छोटी कर दो. यह लोकतंत्र के नाम पर धर्मतंत्र है. इलेक्शन कमीशन एक संवैधानिक संस्था थी. बीजेपी ने उस संस्था को मंदिर बनाकर उसमें अपना पुजारी बैठा दिया है और यहां भी राममंदिर वाला झोल है. जब 2 पुजारी कह रहे हैं कि गर्भगृह में चोरी हो रही है तो मुख्य पुजारी कह रहा है कि सब सर्वसम्मति से हो रहा है.

रितिका चोपड़ा ने मरती हुई मीडिया को जिंदा किया है. उन्होंने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि 14 बार ऑब्जेक्शन फाइल में दर्ज है, यह कोई आरोप नहीं, रिकॉर्ड है. अब सवाल बीजेपी से है. अगर 13 करोड़ नाम कटे और आपके 2 कमिश्नर ही कह रहे हैं कि यह इलीगल है तो यह चुनाव है या जनेऊवादी जनगणना? इसलिए अगर इस खबर पर विपक्ष जांच की मांग कर रहा है तो इसमें गलत क्या है? पूरी जांच होनी चाहिए. सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में संसदीय कमेटी के जरिये इस मामले की जांच हो और SIR पर तुरंत रोक लगनी चाहिए.

चुनाव आयोग को संविधान का चौथा स्तंभ माना जाता है लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने सत्ताधारी बीजेपी के एजेंट की तरह काम किया. 12 मार्च, 2026 को टीएमसी की अगुआई में लोकसभा के 130 और राज्यसभा के 63 सांसदों ने मिल कर ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए महाभियोग नोटिस दिया. यह भारत के इतिहास में चुनाव आयोग के सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ पहला महाभियोग नोटिस था. नोटिस में 7 आरोप लगाए गए. ज्ञानेश कुमार ने पद पर रहते हुए पक्षपातपूर्ण बरताव किया और चुनावी धोखाधड़ी की जांच में जानबूझ कर बाधा डाली.

एसआईआर की आड़ में बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम गलत तरीके से काटे गए और नागरिकों से उन के वोटिंग राइट छीन लिए गए. एसआईआर का असल मकसद सत्ताधारी पार्टी को फायदा पहुंचाना था. अप्रैल 2026 में फिर 73 सांसदों ने 9 नए आरोपों के साथ राज्यसभा में नोटिस दिया. ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आरोप कितने गंभीर हैं, यह आंकड़ों से समझिए. पहले नोटिस पर 193 सांसदों के साइन थे. लोकसभा के 130 और राज्यसभा के 63. नियम कहता है- चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए 100 लोकसभा और 50 राज्यसभा सांसद चाहिए लेकिन लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला और राज्यसभा सभापति सी पी राधाकृष्णन दोनों ने नोटिस खारिज कर दिया. उन का कहना था- प्रस्ताव में कोई दम नहीं है. इस तरह 200 से ज्यादा सांसदों की आवाज को दबा दिया गया.

जब चुनाव आयोग खुद कठघरे में खड़ा हो जाए तो चुनाव की विश्वसनीयता खत्म हो जाती है. ज्ञानेश कुमार ने गैरसंवैधानिक आचरण किए. आयोग ने बीजेपी के पक्ष में फैसले लिए और विपक्ष की शिकायतों पर आंख बंद कर ली. जब 193 सांसद भी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रस्ताव पास नहीं करा पाए तो आम जनता को क्या न्याय मिलेगा? चुनाव आयोग अब स्वतंत्र संस्था नहीं बल्कि सरकार के इशारे पर चलने वाला विभाग बन गया है. Ritika Chopra

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