Babita Singh Reporting Movie: फिल्म ‘बबीता सिंह रिपोर्टिंग’ नारीवादी नजरिए से सवाल उठाती है कि क्या सिर्फ महिलाओं को रोबदार नौकरी, अच्छा पति, अच्छी ससुराल और माहौल मिल जाना ही पुरुषों जैसी बराबरी का एहसास दिला पाता है? दिलचस्प यह कि निर्देशक अम्बिएका पंडित ने इस सवाल को बड़े ही खामोश अंदाज में सामने रखा है. यह फिल्म आम सी ट्रेडिशनल पुलिस थ्रिलर जैसी है लेकिन असल में यह इंडियन मिडिल क्लास फैमिली में कसमसाती महिलाओं के जीवन के धागे खोलती है.
आमतौर पर क्राइम फिल्मों में पुलिस अफसर शराब की बोतलों में गम डुबोते या गुंडों को हवा में उछालते दिखते हैं. अधिकतर पुलिस बेज्ड फिल्में पुरुष किरदारों के इर्दगिर्द बुनी होती है जहां वह पत्नी और बच्चों को टाइम नहीं दे पाता, पत्नी का कहीं अफेयर होता है और बच्चा गलत संगत का शिकार बन जाता है. लेकिन इस फिल्म की मुख्य किरदार असिस्टैंट सबइंस्पैक्टर बबीता सिंह उर्फ ‘बेबी’ (निमिषा सजयन) एक ऐसी औरत है जो अपने वजूद को साबित करने के लिए लगातार संघर्ष कर रही है.
उसे यह नौकरी अनुकंपा पर मिली है. यही अनुकंपा के ताने उसे थाने में झेलने पड़ते हैं. वह चाहती है कि उसे फील्ड में खुद को साबित करने का मौका मिले. वहीं दूसरी तरफ सास और पति का दबाव है कि वह अपने ससुराल में समय बिताए. इस बीच सीनियर अफसर एसआई सेठी (राजेश कुमार) की गलती का इलजाम अपने सिर ले कर छुट्टी की खातिर सस्पैंड होना उस की मजबूरी बन जाता है. वहां पहुंचती है तो उसे पता चलता है कि उस के बचपन के दोस्त बंसी (बरुण सोबती) की हत्या हुई है. वह इस कत्ल की गुत्थी सुलझाने में लग जाती है, जो उस के लिए अपनी खोई हुई पहचान ढूंढ़ने की एक जिद बन जाती है.
फिल्म का कथानक ऊपर से मर्डर मिस्ट्री लगता है, लेकिन इस की असली जान इस का नारीवादी नजरिया है. लेखक अमित व्यास और अम्बिएका पंडित ने इसे किसी भाषण या मोनोलोग टाइप सोशल मैसेज की तरह नहीं परोसा है. वे बहुत ही बारीक सीन्स के जरिए दिखाते हैं कि कैसे समाज एक वर्किंग वीमेन को धीरेधीरे मानसिक रूप से कुचलता है.
फिल्म में कई सीन हैं जैसे, बेबी का पति शरद (अंशुमन पुष्कर) जो ‘अच्छा पति’ की कैटेगरी में है मगर बारबार खुद के सपोर्टिव होने का जिक्र करता है. वह एक आम भारतीय पुरुष है जो खुद को ‘अच्छा आदमी’ मानता है. वह बबीता को बारबार याद दिलाता है कि उस ने उस की जाति और वजन को दरकिनार कर उस से शादी की, इसलिए बबीता को जिंदगीभर उस का एहसानमंद होना चाहिए. वह उस पर हाथ नहीं उठाता, लेकिन शब्दों के चाबुक से रोज उस के अंतर्मन की खाल उधेड़ता है.
जब बेबी किसी बात पर अपना विरोध दर्ज कराने की कोशिश करती है, तो पति खुद रोने लगता है और खुद को पीड़ित बना लेता है. इन सींस में ‘गैसलाइटिंग’ का बेजोड़ उदाहरण देखने को मिलता है, जहां पीड़ित व्यक्ति ही अपने शोषक से माफी मांगने पर मजबूर हो जाता है.
फिल्म में सब से तीखा सीन वह है जहां पैर में चोट लगी होने के बावजूद बबीता अपनी ससुराल में मेहमानों की खातिरदारी कर रही है. घर मेहमानों से खचाखच भरा है, पैर का दर्द उस की आंखों में साफ दिख रहा है, लेकिन कोई भी फैमिली मैंबर उस की मदद के लिए हाथ नहीं बढ़ाता, जैसे ये काम उसी के हिस्से हैं. ससुराल का पूरा माहौल और दीवारों का रंग तक ऐसा रचा गया है जो घुटन का एहसास कराता है.
सब से बढ़िया पार्ट पुलिस महकमे के अंदरूनी पुरुषवादी रवैये को प्रामाणिक रूप से दिखाना है. थाने में बबीता का नाम ‘बेबी’ रखना कोई प्यार का नाम नहीं है, बल्कि यह उसे छोटा और कमतर महसूस करवाना है. जब पुरुष अधिकारी उसे ‘बेबी’ कहते हैं, तो वे अधिकार जताते हैं कि वह उन के बराबर कभी नहीं बैठ सकती.
फिल्म में निमिषा सजयन ने बढ़िया ऐक्टिंग की है. निमिषा का चेहरा किसी ग्लैमरस स्टार जैसा नहीं, बल्कि एक आम इंसान का चेहरा है. उस की आंखों में गुस्सा, लाचारी, थकान और खुद को बचाने की छटपटाहट एकसाथ तैरती है. जब वह केस की तफ्तीश में आगे बढ़ती है, तो वह केवल अपने दोस्त बंशी के कातिल को नहीं ढूंढ रही होती, बल्कि उस अकेले इंसान की याद को बचा रही होती है जिस ने कभी बचपन में उसे उस के भारी शरीर के लिए ताना मारने वालों से बचाया था.
बरुण सोबती ने बंशी के छोटे से किरदार में अच्छा काम किया है. उस का किरदार दिखाता है कि इस पुरुषवादी समाज में असल में कोमल पुरुष भी कुचले जाते हैं. वहीं अंशुमान पुष्कर ने मैनिपुलेटिव पति के रोल को बहुत बढ़िया जिया है.
फिल्म में कमियां हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. कई जगह फिल्म सुस्त भी चलती है. निर्देशक बबीता के इन्वैस्टीगेशन और संघर्ष को बैलेंस नहीं कर पाते. कई बार उन्होंने बबीता का खुद का संघर्ष इतना दिखा दिया है कि इन्वैस्टिगेशन कहीं दब सी जाती है. फिल्म का क्लाइमैक्स, जहां खुलासा होता है कि बंसी ने ख़ुदकुशी की, वह काफी जल्दबाज़ी में निबटाया गया महसूस होता है.
इस के बावजूद, ‘बबीता सिंह रिपोर्टिंग’ इसलिए अलग खड़ी होती है क्योंकि यह किसी फिल्मी चमत्कार या ‘सुपरकौप’ वाले मोड़ का सहारा नहीं लेती. बल्कि, वह छोटेछोटे कदम उठा कर अपने वजूद को वापस हासिल करने की शुरुआत करती है.
फिल्म की सिनेमेटोग्राफी डार्क टोन में रखी गई है. महल्ले, रास्ते, घर सभी नैचुरल लगते हैं. थ्रिल अंत तक बना रहता है. सहायक कलाकारों ने अच्छा काम किया है. फिल्म का बीजीएम ठीकठाक है, गाने नहीं हैं. Babita Singh Reporting Movie





