Blind Faith: जो बड़े कह दें, जो गुरु कह दें, जो पंडित कह दें, नेता कह दें, जो सरकार कह दे उसे मान लो. सवाल मत खड़े करो क्योंकि ज्ञान के ठेकेदार ये बड़े गुरु, पंडित, नेता और सरकारी अफसर हैं. आज नहीं सदियों से यह परंपरा चली आ रही है और धर्मों ने अपने भक्तों को जबरन यह जहर पिलाया है. हिंदू धर्म में सच बोलने पर किसी को भी पाप लग सकता है.
कुरुक्षेत्र के युद्ध के बाद जब युधिष्ठिर और पांडवों के सभी चचेरे भाइयों की, गुरुओं की, अपने खुद के बेटों की, साथियों की युधिष्ठिर की राजसत्ता और जमीन के लालच में मृत्यु हो गई तो उन्हें पश्चात्ताप तो हुआ पर चूंकि उस समय के ब्राह्मणों को उन्होंने भरपूर दानदक्षिणा दे दी थी, सो वे उन्हें राजगद्दी पर बने रहने को प्रोत्साहित कर रहे थे.
इन्हीं ब्राह्मणों में से एक चार्वाक था. महाभारत के राजधर्मानुशासित पत्र के 38वें अध्याय में चार्वाक युधिष्ठिर से कहता है, “कुंतीनंदन, तुम अपने भाईबंधुओं का वध करने वाले एक दुष्ट राजा हो. तुम पर धिक्कार है, ऐसे पुरुष के जीवन का क्या लाभ? तुम्हारा मर जाना ही अच्छा है, जीवित रहना नहीं.” (श्लोक 26, 21)
जैसे आज कटु सत्य बोलने वाले को एंटीनैशनल, पाकिस्तानी, कौमी, अर्बन नक्सल और अब दिमागी नक्सल कहा जा रहा है वैसे तब के दौर में युधिष्ठर के पैसों पर पलते हुए ब्राह्मणों ने चार्वाक को राक्षस घोषित कर दिया था. उन्होंने चार्वाक द्वारा जो कहा गया उस का तार्किक उत्तर देने की कोशिश भी नहीं की. इस संवाद से पहले 21वें अध्याय में राजधर्मानुशासन पर्व में ही देवस्थान मुनि ने युधिष्ठर से कह दिया था कि राजा का कर्तव्य यज्ञ से बचे हुए भोजन को खाना, दान देना, गायों और ब्राह्मणों की रक्षा करने के लिए युद्ध करना है. वहीं, अर्जुन ने भी कहा, “आप ने शत्रुओं को हरा कर राज्य प्राप्त किया है, अब अपने मन को वश में कर के यज्ञ और दान में संलग्न हो जाइए.” 34वें अध्याय में वैशम्पायन ऋषि युधिष्ठिर से कहते हैं, “भाइयों को दक्षिणा वाले यज्ञों में लगा कर तुम अनुपम कीर्ति प्राप्त करो.”
यानी, धर्म की व्याख्या यही है कि ज्ञान का अर्थ दान देना है, राजा का काम जनता के लिए काम करने के लिए नहीं है, यज्ञ करना है जिस में दक्षिणा दी जाए. यही तो स्कूलों, कालेजों, एनटीए की परीक्षाओं में, सड़कों और पुलों के निर्माण में हो रहा है. ये सब यज्ञ हैं जिन में जनता की गरदन दबा कर टैक्स के नाम पर वसूला पैसा पौराणिक ज्ञानियों को दक्षिणा में दिया जा रहा है और सवाल करने वालों को चार्वाक की तरह दुष्ट राक्षस कहा जा रहा है.
नक्सली चाहे अर्बन हों या दिमागी अगर पौराणिक ज्ञानियों से, मंदिरों के पुजारियों से, राजा से, अमीरों से, उद्योगों को चलाने वालों से सवाल पूछ रहे हैं तो वे क्या हुए, यह पुराण बारबार कह रहे हैं. महाभारत के ये अंश तो भूसे में तिनके के बराबर हैं. Blind Faith





