Self Reflection: अपनी खुद की आलोचना करना एक बहुत बड़ा गुण है. आमतौर पर हर जना, हर धर्म, हर समूह अपने को दूसरों से श्रेष्ठ करने में लगा रहता है और अपनी कमियों को छिपाता रहता है. जो अपनी कमियों को स्वीकार कर ले या दूसरों के मुंह से अपनी बुराई सुन कर उस के अनुसार सुधार कर ले वह जल्दी ही, चाहे अकेला हो, समूह हो, वर्ग हो, परिवार हो, अपने को सही करने के उपाय ढूंढ़ लेता है.

हिंदुओं में यह विशेषता रही है कि वे आत्मप्रशंसा करने में बहुत तेज हैं. हमारे पौराणिक ग्रंथ आत्मस्तुति से ही शुरू होते हैं कि यह कहानी या कहानियों का संकलन जो आप को सुनाया जा रहा है, बहुत महान है. यह किस तरह स्वयं ईश्वर या उस के किसी पुत्र के मुंह से निकला है, इसे पढ़ने या सुनने वालों को क्या लाभ होगा, उन का जीवन कैसे सफल हो जाएगा, यह ग्रंथ लेखक खुद ही बताता रहता है.

इन्हीं ग्रंथों की आत्मगुणगान की यह परंपरा हमारे पतन की मूल वजह रही है. हम खुद को जन्म से ही श्रेष्ठ समझते हैं, इसलिए हमें न कुछ सीखना है, न खोजना है, न पता करना है, न बनाना है. इन ग्रंथों में बस यही कहा गया है कि कैसे महान देवीदेवता का स्मरण करने, पूजा करने, तपस्या करने या उन्हें कुछ दान करने से सारे दुख दूर हो गए और सुख आ गए.

इस भ्रम में कि जो कहा गया है वह ही अंतिम सत्य है, हम सदियों से रौंदे जाते रहे हैं, ज्यादातर अपने ही लोगों द्वारा, लंबे समय तक तो बाहर से आए लोगों द्वारा और फिर बाद में हमारे ही बीच में से चुने गए लोगों द्वारा जो कुछ पीढिय़ों के बाद वैसी ही आत्मप्रशंसा करने के आदी हो गए. आधुनिक पत्रकारिता ने इस परंपरा को तोड़ा है. उस ने अपनी कमियों, कमजोरियों, गलतियों को पहचानने, ढूंढऩे, जानने और बताने का काम किया है. आधुनिक लोकतंत्र इस पत्रकारिता के इसी गुण पर टिका है कि अपनी ही गलतियों की बात करना अपनों के खिलाफ नहीं है बल्कि अपने/अपनों को सुधारना है.

लोकतंत्र की बुनियाद कई तरह की पार्टियों का होना नहीं है बल्कि कई तरह के विचारक, लेखक, पत्रकार, वक्ता, गुटों का होना है जो अपनों की ही कमियां को निकाल कर देश निर्माण और समाज को ढंग से सही रास्ते पर चलने का मार्ग दिखाता है.

अफसोस यह है कि भक्ति का भाव जो पौराणिक ग्रंथों में भरा पड़ा है वह आज फिर ऊंची लहरें उठा रहा है और आत्मनिरीक्षण को समाजविरोधी, धर्मविरोधी कह कर, जिस के हाथ में जो सत्ता है, जो प्रभाव है उसे ज्यों का त्यों मानने को विवश कर रहा है. आज का लेखक, पत्रकार, विचारक, अध्यापक, प्रशासक केवल अपने गुण बताना जानता है. अपने से मतलब है, अपने आराध्य, अपने को रोजीरोटी देने वाला.

नतीजा यह है कि पहले कांग्रेस सरकारें और अब भारतीय जनता पार्टी सरकार यह सोचती रहीं कि वे सर्वशक्तिशाली और परमानैंट हैं. ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में हारीं क्योंकि उन्हें अंधभरोसा यह था कि जनता पर उन की पूरी पकड़ है. उन्होंने उन लोगों की नहीं सुनी जो उन के यहां सेंध लगाने के लिए ईडी, चुनाव आयोग, मीडिया, धर्म के नाम पर हो रहे विशाल आयोजनों के जरिए जनता को बहका रहे हैं. उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ मोरचा बनाने के लिए कांग्रेस और मार्क्सवादी कम्युनिस्टों के साथ सहयोग व समन्वय नहीं किया. Self Reflection

 

और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...