Dial 1975 Film Review: कहानी में इमरजैंसी के बाद देश में पाबंदियां सख्त हैं और एक प्रभावशाली नेता जरमनी से एक वायरलैस फोन मंगवाता है. यह वायरलैस फोन विज्ञान का नयानया इन्वैन्शन है. नेता का मकसद साफ है कि सरकार उस की बातें न सुन सके.

इस वायरलैस फोन और इस से जुड़ी एक सीक्रेट रिकौर्डिंग हासिल करने के लिए सेना का एक बड़ा अफसर एक जेलर आयरिश (टौम औल्टर) को लगाता है. जेलर इस काम के लिए जेल में बंद कैदी प्रकाश (प्रवेश राणा) को पैरोल पर बाहर निकालता है. वहीं इस टेप के पीछे पूर्व सैनिक मगर अब बागी गोविंद (के के मेनन) भी पड़ा है.

सुनने में यह प्लौट बढ़िया जान पड़ता है जो देश में पहले वायरलैस फोन के इर्दगिर्द बुनी गई है लेकिन परदे पर उतरते ही यह फिल्म पूरी तरह बिखर जाती है. शुरुआत के 15-20 मिनट तो माहौल बनाने में कामयाब रहते हैं लेकिन उस के बाद निर्देशक नवनीत और विभु खुद अपनी बनाई कहानी के जाल में उलझ जाते हैं.

फिल्म की सब से बड़ी कमजोरी इस का कमजोर स्क्रीनप्ले है. कौन सा किरदार क्या चाहता है और क्यों किसी के पीछे पड़ा है, यह समझने में दिमाग की दही हो जाती है. थ्रिलर में सब से जरूरी चीज होती है किरदारों की मंशा, जो स्पष्ट नहीं की गई.

निर्देशन इतना नौसिखिया लगता है कि कई सीन बिना किसी तुक के शुरू और खत्म हो जाते हैं. 1970 के दशक का माहौल दिखाने के नाम पर सिर्फ हेयरस्टाइल और कपड़ों पर ध्यान दिया गया है. हां, खाली सड़कें और सरकारी बंगलों को जरूर ठीक से दिखाया गया है. मगर अंधेरे वाले सीन तो लगभग काले कर दिए हैं.

बैकग्राउंड में एक वायरलैस फोन खुद अपनी कहानी सुनाता है, जो वौयसओवर के रूप में आता है. यह एक्सपैरिमैंट नया तो है, पर बहुत खींच नहीं पाता.

किरदारों की बात करें तो पूर्व सैनिक बने के के मेनन बिना किसी ठोस वजह के अचानक खूंखार कातिल बन जाते हैं. वे रास्ते में आने वाले लोगों को ऐसे मारते हैं जैसे कोई रूटीन काम हो. उन के इस भयंकर मानसिक बदलाव के पीछे की कोई वाजिब वजह कहानी में नहीं बताई गई है.

ऐक्टिंग की बात करें तो के के मेनन हौलीवुड की कल्ट क्लासिक फिल्म ‘नो कंट्री फौर ओल्ड मेन’ के एंटोन जैसा किरदार निभाने की कोशिश करते हैं मगर वे असफल दिखते हैं. वे परदे पर आते हैं, अपनी तरफ से पूरी कोशिश करते हैं और गायब हो जाते हैं.

प्रवेश राणा ने कुछ सीन में बेहतर काम किया है. उन का किरदार थोड़ा समझ में आता है, लेकिन वे भी ढीली स्क्रिप्ट के आगे बेबस नजर आते हैं. कीर्ति कुल्हारी को फिल्म में सिर्फ जगह भरने के लिए रखा गया है. उन के पास करने के लिए कुछ खास नहीं है.

अभिनेता टौम औल्टर जो अब इस दुनिया में नहीं हैं, को परदे पर देखना सुखद रहा लेकिन उन का किरदार भी कहानी को कोई मजबूती
नहीं देता. यह फिल्म सालों से डब्बे में बंद पड़ी थी, जो अब जा कर रिलीज हुई है.

तकनीकी रूप से भी फिल्म निराश करती है. सिनेमेटोग्राफी कुछ जगहों पर ठीकठाक है, लेकिन एडिटिंग टेबल पर फिल्म की जो दुर्दशा हुई है, उसे साफ देखा जा सकता है.

ऐसा लगता है कि फिल्म के कई जरूरी हिस्से काट दिए गए हैं, जिस से कहानी का जुड़ाव ही खत्म हो गया है. ऐसा इसलिए हो सकता है कि यह फिल्म वेव्स ओटीटी प्लेटफौर्म पर रिलीज की गई है जो भारत के सरकारी प्रसारक प्रसार भारती का है. यहां संभव है कि कुछ चीजों को सैंसर किया गया हो.

कुछ सीन बेवजह खींच दिए गए हैं, जैसे होटल के कमरे का एक सीन. यह सीन तनाव पैदा करने की जगह बोर करने लगता है. संवाद इतने भारीभरकम और दार्शनिक बनाए गए हैं कि साधारण दर्शक का सिर घूमने लगे. बैकग्राउंड म्यूजिक भी साधारण सा है. गाने हैं नहीं.

फिल्म के पास एक अच्छी पीरियड थ्रिलर बनने का पूरा सैटअप था. जैसे, देश में अभिव्यक्ति की आजादी छीनी जा रही थी और उसी दौर में बात करने के एक माध्यम यानी फोन को ले कर जंग छिड़ी थी. यह मेटाफर बहुत बढ़िया था, लेकिन मेकर्स संभाल नहीं पाए.

खैर, अगर आप के के मेनन के फैन हैं, तब भी इस कमजोर और उबाऊ फिल्म को झेलना आप के लिए मुश्किल हो सकता है. Dial 1975 Film Review

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