Harappa Civilization: सिंधुघाटी सभ्यता के हड़प्पा जैसे शहर आज भी दुनिया को हैरान करते हैं. 5 हजार साल पहले की स्मार्ट सिटी देखकर आज के मॉडर्न शहर बौने से लगते हैं. हड़प्पा ने बिना AI, बिना IoT, बिना जापान से कर्ज लिए 600 साल तक बिना अतिक्रमण के शहर चलाया. आज हम 10 साल में 100 शहर स्मार्ट नहीं बना पाए इसलिए हड़प्पा की इंजीनियरिंग आज भी हैरान करती है, क्योंकि वह लोगों के लिए बनी थी, प्रचार के लिए नहीं.

हड़प्पा, जो आज पाकिस्तान के पंजाब में है, 2600 ईसा पूर्व में करीब 150 हेक्टेयर में फैला था और इस शहर में तकरीबन 23,000 लोग रहते थे. शहर दो हिस्सों में था. ऊँचा इलाका जहाँ अन्न भंडार था और नीचे आम लोगों का शहर. दोनों ही पूरी तरह ग्रिड पर बसे थे. सड़कें उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम को सीधी काटती थीं, चौड़ाई 10 मीटर तक, जो आज की किसी भी कॉलोनी की सड़क से ज्यादा चौड़ी है. हर घर में पक्की ईंटें, सभी इंटें एक ही अनुपात की, जो लाहौर से लेकर गुजरात के धोलावीरा तक एक जैसी मिलती हैं. मतलब पूरे 10 लाख वर्ग किलोमीटर के साम्राज्य में फैली सिंधु घाटी सभ्यता में बिल्डिंग कोड लागू था. आज की तरह नहीं कि एक गली में 4 मंजिला और दूसरी में झुग्गी.

हड़प्पा की सबसे बड़ी हैरानी उसका ड्रेनेज और पानी निकासी सिस्टम है. खुदाई में मिले हर घर में नहाने का पक्का फर्श, घर की दूसरी मंजिल से टेराकोटा पाइप से गंदा पानी सीधा गली की ढकी हुई नाली में जाता था. नालियां ईंटों से बनी, ऊपर पत्थर की स्लैब से ढकीं ताकि बदबू न आए और सफाई के लिए स्लैब हटाई जा सके. जगह जगह छोटे गड्ढे बनाए गए थे जहाँ कचरा और रेत जमा हो जाए और पानी आगे निकल जाए, मतलब आज का सोक पिट और सिल्ट ट्रैप 5000 साल पहले ही सिंधु घाटी सभ्यता में मौजूद था. शहर में करीब 700 कुएं मिले हैं, हर तीसरे घर में निजी कुआं, जो 15 मीटर गहरा और ट्रैपेज़ॉइड ईंटों से बना था ताकि मिट्टी के दबाव से न टूटे. अन्न भंडार इतना बड़ा था कि पूरे साल का अनाज रखा जा सके, यानी फूड सिक्योरिटी प्लानिंग भी काम कर रही थी.

अब आज के भारत के शहरों को देखिये. पुराने तमाम शहर भीड़ भाड़, गंदगी और प्रदूषण से लदे पड़े हैं. बिना प्लानिंग शहर बन गये और शहरों के विस्तार के नाम पर कालोनियों की भीड़ लग गई. सीवरेज सिस्टम का हाल यह है की दस लाख आबादी के गंदे पानी की निकासी के लिए पांच इंच की नाली से काम से काम चलाया जा रहा है. छोटी नदियों को बड़े नाले में बदलने के बाद भी गटर उफान मारते हैं जिन्हें साफ करने वाले मजदूर हर साल इनमें दम घुटने से मरते हैं. प्रदूषण और गंदगी के अलावा ट्रेफिक जाम से आज के तमाम बड़े शहर रेंगते नजर आ रहे हैं.

अब स्मार्ट सिटी की बात कर लेते हैं. 2024-25 के सरकारी आंकड़े कहते हैं कि स्मार्ट सिटी मिशन के 100 शहरों में 8064 प्रोजेक्ट के लिए 1.64 लाख करोड़ का वादा था लेकिन मार्च 2025 की डेडलाइन तक भी 323 प्रोजेक्ट अधूरे थे. इस बीच बड़े प्रोजेक्ट की लागत 20 परसेंट तक बढ़ गई और 3 साल लेट हुए. मनीकण्ट्रोल की रिपोर्ट के मुताबिक जुलाई 2024 तक 22 शहरों में 25 परसेंट काम पेंडिंग था. कर्नाटक में स्मार्ट कचरा गाड़ियों के GPS बंद पड़े मिले और CAG ने लिखा कि कमांड कंट्रोल सेंटर की उपयोगिता जीरो है. देहरादून में 5.9 करोड़ के स्मार्ट क्लास के स्मार्ट बोर्ड इसलिए बंद हैं क्योंकि स्कूल बिजली का बिल नहीं भर पा रहा.

बीजेपी के स्मार्ट सिटी मॉडल की सच्चाई यह है कि इसने शहर को दो हिस्सों में बांट दिया. एरिया बेस्ड डेवलपमेंट के नाम पर पूरे शहर में से सिर्फ 1-2 परसेंट एरिया चमकाया गया. कहीं तो हाल यह है कि 500 एकड़ के टुकड़े में वाईफाई, बेंच, रंग बिरंगी लाइट लगा दी गई और उसे ही स्मार्ट सिटी बता दिया गया. बाकी 98 परसेंट शहर में वही खुली नाली, जाम सीवर और जलभराव रहा. हड़प्पा में इसके उलट था, वहाँ VIP का दुर्ग भी उसी ड्रेनेज से जुड़ा था जिससे मजदूर की झोपड़ी जुड़ी थी. आज दिल्ली में 30 मिनट बारिश में प्रगति मैदान टनल डूब जाती है, संसद भवन टपकने लगता है, बेंगलुरु और गुड़गांव जैसे बड़े शहरों में बारिश में IT कॉरिडोर में नाव चलती है क्योंकि पानी के लिए धोलावीरा जैसे 16 जलाशयों की जगह झीलों पर अपार्टमेंट बना दिए जिससे शहर का विकास तो हुआ लेकिन जिंदगी रुक गई.

वहीं 5000 साल पुराने शहरों की प्लानिंग हैरान करती है. मांडी, धोलावीरा, मोहनजोदड़ो तीनों को देखो तो एक ही पैटर्न है. सड़क 90 डिग्री पर कटती है, ग्रिड प्लान है, उत्तर से दक्षिण 9 मीटर चौड़ी सड़क, पूरब से पश्चिम छोटी गली. हर घर का गंदा पानी ढके हुए नाले में जाता है, नाला ईंटों से बना है, ऊपर पत्थर की स्लैब है ताकि सफाई हो सके. घर का शौचालय बाहर नाले से जुड़ा है लेकिन रसोई नाले से दूर है. धोलावीरा में बारिश के पानी के लिए 16 बड़े जलाशय हैं, जो बिना मोटर के ग्रेविटी से पूरे शहर को पानी देते थे.

यह सब 2600 ईसा पूर्व में, बिना सीमेंट, बिना जेसीबी, बिना जापान के बुलेट ट्रेन के लोन के चल रहा था और 600 साल तक चला. क्यों? क्योंकि नक्शा किसी राजा के लिए नहीं बना था. कोई बड़ा महल नहीं मिला हड़प्पा में, कोई बड़ी मूर्ति नहीं, कोई राजा की समाधि नहीं. जो मिला वह सामूहिक है, अन्न भंडार, सभा भवन, स्नानागार, नाली.

अब आज का स्मार्ट सिटी देखो. सड़क वही पुरानी, ऊपर से नया बोर्ड लगा दिया स्मार्ट सिटी का. नाला आज भी खुला है, बारिश में वही पानी घर में घुसता है. जापान से कर्ज लेकर मेट्रो बना दी, नीचे का सीवर अभी भी ब्रिटिश काल का है. फर्क सोच का है. हड़प्पा में इंजीनियर को पता था कि शहर लोगों से बनता है इसलिए पहले पानी और टट्टी का रास्ता तय किया. हड़प्पा में अतिक्रमण इसलिए नहीं था क्योंकि जमीन राजा की नहीं, प्लान की थी. आज अतिक्रमण इसलिए है क्योंकि प्लान बिल्डर का है, जमीन नेता की है. यही सबसे बड़ी सीख है. हड़प्पा के लोगों को किसी भगवान या मंदिर मस्जिद की जरूरत नहीं नहीं थी इसलिए उन्होंने भगवान के भरोसे कुछ नहीं छोड़ा. सड़कें, नाले, कुंए और मकान आदमी ने खुद बनाये और 600 साल चलाये. Harappa Civilization

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