Gaza child story: युद्ध की आग में जब सबकुछ जल जाता है तब भी इंसानियत की एक छोटी सी चिनगारी पूरी दुनिया को रोशनी दिखा देती है. फिल्म ‘द वायस औफ हिंद रजब’ ऐसी ही एक सच्ची और दर्दनाक कहानी पर आधारित फिल्म है. यह 6 साल की मासूम बच्ची हिंद रजब की सच्ची कहानी पर आधारित है जो गाजा के युद्ध में फंस गई थी.
निर्देशक कौथर बेन हानिया की यह डौक्यूड्रामा फिल्म युद्ध की क्रूरता के बीच इंसानियत की शानदार तसवीर पेश करती है. जनवरी 2024 की बात है. हिंद अपने चाचाचाची और चचेरे भाईबहनों के साथ कार में बैठ कर गाजा शहर से सुरक्षित जगह की ओर भाग रही थी. अचानक कार पर गोलीबारी शुरू हो गई. परिवार के सारे सदस्य वहीं ढेर हो गए. सिर्फ छोटी सी हिंद जिंदा बची.
वह लाशों के बीच छिप कर बैठी रही. डर के मारे उस की सांसें तेज हो गई थीं लेकिन उस ने हिम्मत नहीं हारी. उस ने रेड क्रिसेंट संस्था को फोन किया और मदद मांगी.
फिल्म में हिंद की असली आवाज इस्तेमाल की गई है. वह बारबार कहती है, “मुझे डर लग रहा है, जल्दी आओ, मैं अकेली हूं.” औपरेटर उस से बात करते हुए उसे बहलाते हैं, हौसला देते हैं और एम्बुलैंस भेजने की कोशिश करते हैं. ये कौल्स घंटों तक चलती रहीं. यह दृश्य फिल्म का सब से मानवीय और दिल दहला देने वाला हिस्सा है.
फिल्म का यह सीन बेहद मार्मिक है. एक अंधेरी, खतरनाक जगह पर छोटी सी बच्ची अकेली बैठी है. चारों तरफ गोलीबारी की गूंज के बीच पसरा मौत का सन्नाटा. फोन पर एक अनजान औपरेटर रजब की आवाज सुन कर उसे चुप कराने की कोशिश कर रहा है. वह कहता है, “हिंद, डरो मत, बेटा. हम आ रहे हैं. तुम मजबूत हो.” बच्ची की आवाज़ में मासूमियत है, लेकिन डर भी है. वह पूछती है, “कब आओगे?”
यह दृश्य सिर्फ युद्ध की कहानी नहीं है बल्कि यह इस बात की जिंदा तसवीर है कि संकट के समय इंसान दूसरे इंसान के लिए कितना कुछ कर सकता है?
रेड क्रिसेंट के कर्मचारी जानते थे कि एम्बुलैंस भेजना कितना खतरनाक है, फिर भी उन्होंने कोशिश छोड़ी नहीं. वे हिंद को बचाने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे थे. यह दृश्य आंसू रोकना मुश्किल कर देता है. इस फिल्म में कोई बड़ा ऐक्शन नहीं, कोई हीरोइज्म नहीं, सिर्फ साधारण लोग अपनी ड्यूटी निभाते हुए एक बच्ची की जान बचाने की जद्दोजेहद करते हुए दिखाई देते हैं.
बच्चे युद्ध में सब से ज्यादा पीड़ित होते हैं. हिंद जैसी बच्ची को क्या पता कि राजनीति, सीमा या दुश्मनी क्या होती है? वह तो सिर्फ घर जाना चाहती थी, खेलना चाहती थी और रेड क्रिसेंट के लोग युद्ध के बीच भी इंसानियत का परचम लहरा रहे थे. वे जानते थे कि एम्बुलैंस पर हमला हो सकता है, फिर भी गए. यह सुबूत है कि संकट में भी अच्छाई मरती नहीं.
हिंद की मां अपनी बेटी की आवाज सुन कर क्या महसूस कर रही होगी, फिल्म में यह दर्द भी छुआ गया है. एक मां के लिए बेटेबेटी को खोने का गम दुनिया का सब से बड़ा गम है. फिल्म सिर्फ एक बच्ची की कहानी नहीं, पूरे युद्ध की कहानी है जहां निर्दोष लोग मारे जाते हैं, परिवार बिखर जाते हैं और कई मासूम आवाजें जिंदा दफना दी जाती हैं.
यह फिल्म एहसास कराती है कि युद्ध में कोई विजेता नहीं होता. सिर्फ हार होती है इंसानियत की, मासूमियत की. ‘द वायस औफ हिंद रजब’ सिर्फ एक फिल्म नहीं, यह एक डरावनी सच्चाई भी है. हिंद की आवाज आज भी गूंज रही है ‘मुझे बचाओ’ दुनिया को इस आवाज को सुनना चाहिए ताकि दुनिया समझ सके कि शांति कितनी जरूरी है. यह फिल्म सिखाती है कि छोटीछोटी इंसानी कोशिशें भी बड़ी उम्मीद जगा सकती हैं. हिंद जैसे मासूमों की कहानियां इंसानियत को जिंदा रखती हैं. Gaza child story





