बाप्स विवाद ने महिलाओं के प्रति मनुवादियों की संकीर्ण सोच को बेनकाब किया है.
Eiffel Tower Controversy: फ्रांस का एफिल टावर 7 सितम्बर को कर्मचारियों की हड़ताल के कारण बंद रहा. वजह कोई तकनीकी खराबी, सुरक्षा संकट या आतंकवादी खतरा नहीं था. विवाद की जड़ में था करीब सौ लोगों का एक हिंदू धार्मिक समूह और उससे जुड़ी एक ऐसी मांग, जिसने यूरोप ही नहीं, पूरी दुनिया को चौंका दिया. क्या किसी धार्मिक व्यक्ति की निजी आस्था के नाम पर सार्वजनिक संस्थान में काम करने वाली महिलाओं को उनके काम से हटाया जा सकता है?
विवाद के केंद्र में है बोचासनवासी अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण संस्था यानी बाप्स. अभी दो साल पहले 14 फरवरी, 2024 को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अबू धाबी में बाप्स हिंदू मंदिर के उद्घाटन समारोह में शामिल हुए थे. उसी बाप्स संगठन के एक समूह के एफिल टावर पहुंचने के दौरान वहां कार्यरत महिला कर्मचारियों को हटाकर उनकी जगह पुरुष कर्मचारियों को लगाने की मांग की गई. उस समय तो इस मांग को मान लिया गया मगर बाद में कर्मचारियों में नाराजगी फैली और यूनियन ने इस मांग का कड़ा विरोध किया.
जब सब तरफ इस तरह की महिला-विरोधी मानसिकता की थू थू होने लगी तो बाप्स ने यूटर्न लिया और कहा कि यात्रा एफिल टावर की टीम के साथ समन्वय से आयोजित की गई थी और किसी को प्रवेश से नहीं रोका गया था. संगठन ने कहा कि उसका उद्देश्य महिलाओं का अपमान या उनके साथ भेदभाव करना नहीं था. उसके मुताबिक, संबंधित साधु ब्रह्मचर्य के धार्मिक अनुशासन का पालन करते हैं और महिलाओं से दूरी उसी का हिस्सा है.
लेकिन सवाल यह कि अगर किसी व्यक्ति ने महिलाओं से दूरी बनाए रखने का धार्मिक व्रत लिया है, तो क्या इसका मतलब यह है कि दुनिया की तमाम महिलाएं उसके रास्ते से हट जाएं? परदे के पीछे जाकर छिप जाएं?
कोई व्यक्ति अपने लिए कोई भी धार्मिक अनुशासन चुन सकता है. कोई तपस्या करे, ब्रह्मचर्य अपनाए, मौन व्रत रखे या किसी खास तरह का खान-पान अपनाए, यह उसका निजी अधिकार है. लेकिन सार्वजनिक व्यवस्था में अपने धार्मिक नियमों का पालन दूसरों से करवाना और दूसरों को उन नियमों के मुताबिक चलने के लिए मजबूर करना आपको धार्मिक नहीं बल्कि मंदबुद्धि साबित करता है. अगर औरतों को न देखना आपके निजी आस्था का मामला है तो आप अपनी आँखों पर पट्टी चढ़ा कर रखिये. आपने अपनी आँखें खुली क्यों छोड़ रखी हैं?
अगर कोई साधु महिलाओं से बात नहीं करना चाहता, तो वह उनसे बात न करे. अगर वह महिलाओं को स्पर्श नहीं करना चाहता, तो स्पर्श न करे. लेकिन एफिल टावर की महिला कर्मचारी अपनी नौकरी क्यों छोड़ें? उन्होंने तो कोई ब्रह्मचर्य का व्रत नहीं लिया था.
विडंबना देखिए कि एक ओर दुनिया भर में महिलाओं को शिक्षा, रोजगार और सार्वजनिक जीवन में बराबरी का अधिकार दिलाने की लड़ाई जारी है, वहीं दूसरी ओर एक सार्वजनिक स्थल पर यह सवाल खड़ा हो गया कि किसी धार्मिक व्यक्ति की निजी आस्था और धार्मिक मान्यता के लिए महिला कर्मचारियों को अपने काम से हटा दिया जाए. सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि ऐसा अनुरोध क्यों किया गया, बल्कि बड़ा सवाल यह है कि क्या अब किसी सनातनी की निजी धार्मिक मान्यता सार्वजनिक संस्थानों में काम करने वाली महिलाओं के अधिकार और गरिमा की सीमा तय करेगी?
कल कोई भी धार्मिक समूह अपनी निजी मान्यताओं के आधार पर सार्वजनिक संस्थानों के नियम तय करने लगेगा और फिर सवाल यह नहीं रहेगा कि महिलाएं कहां काम कर सकती हैं, बल्कि यह होगा कि किस-किस की धार्मिक सुविधा के लिए उन्हें कितनी बार रास्ते से हटना पड़ेगा? स में हुआ, जहां महिलाओं की बराबरी और स्वतंत्रता के लिए लंबी सामाजिक और राजनीतिक लड़ाइयां लड़ी गई हैं. फ्रांस की औरतों ने अपना मुकाम किसी की कृपा से नहीं, बल्कि अपनी मेहनत, संघर्ष र अधिकारों की लड़ाई से हासिल किया है.
आज पेरिस दुनिया की फैशन राजधानी के रूप में जाना जाता है, जहां महिलाओं की स्वतंत्रता, आत्मनिर्भरता और अपनी पसंद से जीवन जीने की छवि दुनिया भर में दिखाई देती है. ऐसे देश के सबसे प्रसिद्ध सार्वजनिक स्थलों में से एक पर अगर किसी धार्मिक समूह की सुविधा के लिए महिला कर्मचारियों को उनके काम से हटाने की मांग सामने आए, तो यह स्वाभाविक रूप से चौंकाने वाली बात है.
विडंबना यह है कि जिस पेरिस की सड़कों पर महिलाएं अपनी पसंद के कपड़े पहनकर, अपनी पसंद का काम करके और अपनी शर्तों पर जिंदगी जीती हैं, उसी पेरिस में किसी धार्मिक व्यक्ति की निजी मान्यता के कारण महिला कर्मचारियों को पीछे हटने के लिए कहा गया. क्या पेरिस की महिला किसी भारतीय पुरुष की धार्मिक सुविधा के लिए अपने अधिकार और अपना कार्यस्थल छोड़ने को मजबूर होगी? औरतों के प्रति अपनी संकीर्ण मानसिकता का प्रदर्शन करके बाप्स ने दुनिया के सामने भारत को शर्मसार किया है. उन्हें फ्रांस से ही नहीं बल्कि भारत और भारत की महिलाओं से भी माफ़ी मांगनी चाहिए.
किसी व्यक्ति की आस्था निजी हो सकती है, लेकिन किसी महिला की नौकरी और सम्मान निजी आस्था के अधीन नहीं होते. बाप्स अपनी सफाई में ब्रह्मचर्य की बात कर रहा है. तो क्या ब्रह्मचर्य का अर्थ महिलाओं को कमतर समझना है? आत्मसंयम का अर्थ यह नहीं हो सकता कि दूसरे मनुष्य की गरिमा और अधिकार कम हो जाएं. सवाल तो यह भी उठ रहा है कि जिस संगठन के लिए महिलाओं की मौजूदगी इतनी बड़ी समस्या थी, वह अपने 93 वर्षीय गुरु को लेकर एफिल टावर जैसी सार्वजनिक जगह पर गया ही क्यों?
दरअसल ये उसी संकीर्ण मनुवादी सोच के लोग हैं जो आज भी औरत को दोयम दर्जे का अछूत प्राणी समझते हैं. ये वही लोग हैं जो औरत को अपनी जरूरत के अनुसार भोगना चाहते हैं. ऐसे लोगों के कृत्यों की कठोर आलोचना दुनिया भर की आधी आबादी को करना चाहिए और ऐसी सोच रखने वाले संगठनों पर किसी भी देश की यात्रा बैन होनी चाहिए जो अपनी कुत्सित मानसिकता को लेकर औरतों के खिलाफ जहर बोते घूमते हैं.
एफिल टावर कोई आश्रम तो है नहीं. न वह किसी धर्म का तीर्थस्थल है और न किसी धार्मिक समूह का निजी परिसर. वहां टिकट लेकर दुनिया भर के लोग आते हैं. वहां पुरुष भी काम करते हैं और महिलाएं भी. यदि कोई धार्मिक समूह ऐसे सार्वजनिक स्थान पर जाता है, तो उसे उस समाज और उस जगह के सामान्य नियमों और संस्थागत व्यवस्था का सम्मान करना चाहिए. क्योंकि दुनिया आपके धार्मिक नियमों के मुताबिक नहीं चल सकती है.
हिंदू समाज में करोड़ों महिलाएं हैं जो पढ़ती हैं, नौकरी करती हैं, कारोबार चलाती हैं, विज्ञान और राजनीति में काम करती हैं और अपने परिवारों तथा समाज के निर्माण में बराबर की भूमिका निभाती हैं. एफिल टावर की घटना आज दुनिया के सामने पूरे हिंदू समाज का परिचय बन गई है.
अगर आध्यात्मिकता हासिल करने के लिए महिलाओं को अपने रास्ते से हटाना पड़े, तो समस्या महिलाओं में नहीं, उस आध्यात्मिकता की समझ में है. किसी साधु का ब्रह्मचर्य उसका निजी अनुशासन हो सकता है, लेकिन किसी महिला को सिर्फ इसलिए उसके काम से हटाना कि वह महिला है, यह ब्रह्मचर्य नहीं, भेदभाव है. ऐसे लोगों से पूछा जाना चाहिए कि महिलाओं से इतना परहेज़ है तो एफिल टावर गए ही क्यों थे?
बाप्स संप्रदाय के पुरूष क्या आसमान से अपने आप टपकते हैं. इनके धर्म ने औरतों को स्लेव बना रखा है, बच्चे पैदा करने वाली स्लेव जो जब ये चाहें उनके साथ सैक्स कर सकते हैं पर वे कहीं दिखे नहीं. इनका ब्रह्मचर्य शायद इतना कमजोर है कि ये पराई औरत को देखते ही उत्तेजित हो जाते होंगे और इसलिए उनके प्रवर्तक गुरु ने औरत को देखने से भी मनाई की होगी. ये अपनी पत्नियों, मांओं और बेटियों को कैसे रखते हैं इस बारे में हम आपको बाद में बताएंगे. Eiffel Tower Controversy





