Education System: काकरोच जनता पार्टी का मकसद और मनसूबे बेहद साफ़ हैं कि देश केवल संविधान के मुताबिक चलना चाहिए. नीट पेपर लीक के विरोध में उसके एतिहासिक प्रोटेस्ट के बाद दूसरी जीत उसे एक सितम्बर को सुप्रीम कोर्ट में हासिल हुई जहाँ सरकार के साथ साथ सीजेआई भी हारे. अब हर कोई उत्सुकता से सीजेपी की तरफ देख रहा है कि सरकारी स्कूल ठीक करने के बाद वह किस मुद्दे पर आंदोलन करेगी और अगर वह चुनावी राजनीति में न उतरी तो सियासी तौर पर उससे किस पार्टी को फायदा होगा.

नजारा और माहौल दोनों निकाह होने जैसे थे जिसमे काजी बारी बारी से वर वधु से पूछता है कि आपका निकाह फलां वल्द फलां के साथ मैहर की इतनी रकम के साथ तय हुआ है क्या आपको कुबूल है. जब दूल्हा दुल्हन दोनों हाँ, कुबूल है बोल देते हैं तो मौजूदा मेहमान मुबारक हो मुबारक हो कहते दावत उड़ाने चल देते हैं बीती एक सितम्बर को सुप्रीम कोर्ट में ऐसा ही कुछ हुआ. जिसकी स्क्रिप्ट पहले ही लिखी जा चुकी थी. बात कुछ कुछ मियां बीबी राजी तो क्या करेगा काजी सरीखी ही थी. 20 जुलाई को काकरोच जनता पार्टी के जंतर मंतर प्रोटेस्ट के बाद जिन प्रदर्शनकारी छात्रों पर एफआईआर दर्ज की गईं थीं उन्हें सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद रद्द कर दिया गया.

कोर्ट ने निर्देश दिए कि सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में छात्रों के खिलाफ दर्ज सभी मामले रद्द माने जाएंगे. और भविष्य में उसी विरोध प्रदर्शन के संबंध में कोई नया मामला दर्ज नहीं किया जाएगा.
सरकार की तरफ से पैरवी कर रहे सलिस्टर जनरल तुषार मेहता को इसमें कुछ खास नहीं करना था. जिन्होंने कोर्ट को बताया कि दोनों पक्षों ने इस मामले को रचनात्मक और सकारात्मक तरीके से सुलझाया है. बकौल तुषार मेहता हम दुश्मन नहीं हैं. हम यानी सरकार और छात्र. सुनवाई कर रही पीठ की अगुवाई कर रहे चीफ जस्टिस सूर्यकांत भी इस समझौते से खुश थे कि चलो सस्ते में पिंड छूटा. नहीं तो ये काकरोच पांच सितम्बर से फिर आंदोलन करते जो पहले से कहीं ज्यादा बड़ा होता.

मुमकिन है उनके मन में यह अपराधवोध रहा हो कि उनके बेरोजगार युवाओं को काकरोच कहने से सारा फसाद हुआ था. मुमकिन यह भी है कि अपने कहे पर उन्हें गर्व भी हो रहा हो कि देखो अगर मैं ताने नहीं कसता तो न सीजेपी बनती और न ही सरकार के कान पर जूं रेंगती.

खुश तुषार मेहता भी थे जो सरकार की तरफ से समझौता प्रस्ताव के दूत थे. उन्होंने सरकार की तरफ से कोर्ट को भरोसा दिलाया कि 20 से 25 जुलाई के दरम्यान हुए प्रदर्शनों को लेकर छात्रों पर दर्ज किसी भी मामले में आगे कोई जांच या कठोर काररवाई नहीं की जाएगी और न ही कोई एफआईआर दर्ज होगी. उन्होंने अदालत को यह भी बताया कि नीट पेपर लीक के बाद आत्महत्या करने बाले पीड़ित छात्रों के परिवारों को मुआवजा देने की नीति तीन महीने के अंदर तय कर ली जाएगी. तुषार मेहता जब यह कह रहे थे कि सरकार ने यह फैसला छात्रों के भविष्य के मद्देनजर लिया है तो उलट इसके लग ऐसा रहा है कि फैसला सरकार ने अपने भविष्य के मद्देनजर लिया है.

खुश सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दिपके और कन्वीनर सौरव दास भी थे जिन्होंने कोर्ट के फैसले के बाद पांच सितम्बर को प्रस्तावित मार्च को रद्द करने का एलान किया. गौरतलब है कि इस दिन सीजेपी दिल्ली में एक बड़ा मार्च करने बाली थी जो इंडिया गेट से शुरू होकर दिल्ली पुलिस मुख्यालय तक जाता. इस प्रस्तावित मार्च की इस बार वजह सरकार की वादा खिलाफी थी. दरअसल में यह प्रोटेस्ट जिसने महीने भर में ही देश भर के लोगों के सोचने समझने की दिशा बदल दी वह खत्म इसी शर्त पर हुआ था कि धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे के बाद सरकार प्रदर्शनकारियों पर दर्ज सारे मुकदमे वापस लेगी, कोई नई एफआईआर दर्ज नहीं होगी और पीड़ित परिवारों को मुआवजा दिया जाएगा

जस्टिस सूर्यकांत बाली तीन सदस्यीय पीठ ने इस मामले को महज 35 मिनिट में निबटा दिया इससे पहले 31 अगस्त की देर रात दिल्ली पुलिस ने अर्जेंट लीव पिटीशन दर्ज की थी जिसे एक सितम्बर के पहले सत्र में ही सुना गया .इसके लिए कोर्ट को संविधान के अनुच्छेद 142 का सहारा लेना पड़ा जो सुप्रीम कोर्ट को विशेष और असाधारण शक्ति देता है. सीजेपी ने इस बात पर कोई एतराज नहीं जताया कि गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि बाले 2873 लोगों के खिलाफ जांच जारी रहेगी.सरकार के साथ साथ इसे सीजेआई की हार के तौर पर भी देखा जा रहा है.
नहीं आए थे झांसे में

5 सितम्बर के प्रस्तावित मार्च की वजह यह थी कि सरकार लिखित में कोई आश्वासन काकरोच जनता पार्टी को देने के लिए तैयार नहीं थी. 25 जुलाई को सरकार और सीजेपी के बीच बातचीत जिसे समझौता कहना ज्यादा बेहतर होगा हुई थी में सरकार ने सारी मांगों से मौखिक सहमति जता दी थी. सरकार की तरफ से दो मंत्री जेपी नड्डा और जितेन्द्र सिंह ने सौरव दास और आशुतोष रांका से चर्चा की इस मुलाकात पर हर किसी की निगाह थी.

खास बात यह थी कि सीजेपी के नेताओं को जेपी नड्डा ने अपने आवास पर बुलाया था. यह चर्चा महज दस मिनिट चली थी जिसका नतीजा भी काकरोचों के हक में निकला था. सरकार ने उनकी सभी मांगे बिना कोई चूं चपड किए मान ली थीं. शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफ़ा तो तुरंत हो गया था जिस पर देश भर के युवाओं ने जश्न मनाया था. बाकी मांगों पर रजामंदी के बाद भी सरकार लिखित गारंटी नही दे रही थी.

इस पर सीजेपी का माथा ठनकना कुदरती बात थी. एक महीना बीत जाने के बाद भी सरकार की तरफ से कोई पहल नहीं हुई तो उसने 5 सितम्बर के मार्च का एलान कर दिया. जिसके बाबत देश भर के युवाओं ने दिल्ली कूच करने के लिए अपना बोरिया बिस्तर बांधना शुरू कर दिया था. प्रधान के इस्तीफे से काकरोच जोश में थे. जब सरकार तक यह बात पहुंची तो वह फिर घबराई क्योंकि 12 – 13 सितम्बर से दिल्ली में ब्रिक्स सम्मेलन होना था. अब अगर ऐसे में ये तिलचट्टे फिर से इकट्ठा हो जाते तो नारों, मीम्स और वीडियो बगैरह के साथ साथ क्या क्या न करते. लिहाजा उसने ख़ामोशी से दूसरी हार मान ली और सुप्रीम कोर्ट पर अपनी मंशा जाहिर कर दी.

लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सबसे ज्यादा खुश अगर कोई हुआ होगा तो वह प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ही होंगे, क्यों होंगे इसकी वजहें बड़ी दिलचस्प और अहम हैं. तमाम क्षेत्रीय दलों के मुखियाओ मसलन नीतिश कुमार, जीतनराम माझी, चिराग पासवान, अनुप्रिया पटेल और रामदास अठावले बगैरह को तो भगवा गैंग मीडिया की तरह अपनी गोद में बैठाल चुकी है. और जिन्होंने गोद में बैठने से इंकार कर दिया उन्हें हिंदुत्व के एजेंडे के रथ पर सवार होकर चुनावी कुरुक्षेत्र में ढेर कर चुकी है. टीएमसी की ममता बनर्जी और आप के अरविन्द केजरीवाल इसकी बेहतर मिसाल हैं जिन्हें रास्ते से हटाने के लिए एसआईआर नाम का ब्रह्मास्त्र भगवा गैंग ने चलाया था. लेकिन छूट नहीं रहा पिंड

महाभारत काल में दिग्गज कौरव योद्धाओं ने युवा अभिमन्यु को एक साजिश के तहत घेर कर मारा था. लेकिन इन लोकतांत्रिक युवाओं ने तो उलटी गंगा बहाते सरकार और भगवा गैंग को ही एक ऐसे चक्रव्यूह में घेर रखा है जिसकी तोड़ कलयुगी कौरवों के पास होना दिख नहीं रही. प्रोटेस्ट खत्म हो जाने के बाद भी काकरोच खामोश नहीं बैठे. उन्होंने दो मुहिम एक साथ चलाई जिनमे से पहली ज्यादा अहम और सरदर्दी बाली भगवा गैंग को साबित हो रही है. यह मुहिम है अबेडकर को रोल माडल मानते धर्म की हांडी में छेद करना. इस विषय पर आप इसी वेब साईट पर प्रकाशित लेख 15 अगस्त को शीर्षक `प्रोटेस्ट के बाद क्यों धार्मिक पाखंडो की खुल रही पोल` से पढ़ चुके हैं.

बात अकेले धार्मिक पाखंडों की पोल खुलने तक सीमित नहीं है बल्कि काकरोच और जेन जी वैचारिक हिंदुत्व के भी चीथड़े उड़ाने से चूक नहीं रहे. उनकी इस मुहिम का बड़ा मुद्दा हिंद्त्व को केवल ब्राह्मणों तक समेट देने के विरोध में है. इसका मतलब यह नहीं कि काकरोच यह मानने लगे हों कि हिन्दू धर्म दुनिया में सबसे महान धर्म है.
इन लोगों का साफ़ तौर पर कहना है कि बेरोजगारी और पेपर लीक किसी का धर्म देखकर नहीं आते. हद तो तब हो गई जब इन्होने गड़े मुर्दे उखाड़ते यह कहना शुरू कर दिया कि आजादी की लड़ाई में चड्डी कबड्डी बालों को कोई योगदान ही नहीं था तो किस बिना पर ये लोग यानी आरएसएस बाले राष्ट्रवाद का हल्ला मचाते रहते हैं .इन्होने तो हिन्दू कोड बिल और संविधान का भी विरोध किया था और तो और इन्होने मुद्दत तक अपने मुख्यालय पर तिरंगा नहीं बल्कि भगवा फहराया था.

असल में भगवा गैंग ने अपना पुराना दांव या चाल आजमाते इनके प्रोटेस्ट को विदेशी फंडिंग से संचालित होने बाला कहकर बदनाम करने की कोशिश की थी. काठ की यह हांडी तो चूल्हे पर चढ़ नहीं पाई लेकिन जबाब में गुस्साए काकरोचों ने धर्म की हांडी में जो छेद करना शुरू किए तो बात उन दलीलों तक आ पहुंची जिन्हें सरिता में 50- 60 के दशक से पाठक पढ़ते आ रहे हैं. अब यही सवाल युवा कर रहे हैं तो किसी पार्टी, नेता, बाबा या संगठन को जबाब नहीं सूझ रहे.

हनुमान ने तपता हुआ आग का गोला मुंह में कैसे भर लिया, त्रिकालदर्शी शंकर अपने बेटे गणेश को ही नहीं पहचान पाए और राम को लंका तक जाने के लिए पुल बनाने की जरूरत क्यों आन पड़ी वे उसी रास्ते से क्यों नहीं चले गए जिससे होकर शूर्पनखा लका से इनके पास जंगल में आई थी. जैसे सवाल जिन्हें भगवा गैंग साइंस साबित करने पर तुली हुई थी की हकीकत जब सामने आने लगी तो भाजपा और आरएसएस बाले घबरा उठे.

इसी घबराहट का नतीजा था नरेन्द्र मोदी का आधी रात को बनाया गया वीडियो जिसमे जेन जी की भाषा शैली को ध्यान में रखते हुए परम्परागत संवोधन भाइयो और बहनों को तिलांजलि देते फ्रेंड्स संवोधन का इस्तेमाल किया गया था. इसी घबराहट का नतीजा था कि मोहन भागवत युवाओं से `वार्ता` करने को बैचेन दिखे. लेकिन इस पर भी बात नहीं बनी और जेन जी ने इन्हें गंभीरता से नहीं लिया तो काकरोचों पर खुन्नस खाए बैठे नरेन्द्र मोदी ने 15 अगस्त के अपने भाषण में इन्हें दिमागी नक्सली करार दे दिया. इस पर इन लोगों ने सडक पर आकर हाय हाय नहीं कि बल्कि अस्थाई रूप से रातों रात `दिमागी नक्सल पार्टी` का गठन कर डाला. सोशल मीडिया पर इस पार्टी को भी रेस्पांस मिला और हफ्ते भर में ही पांच लाख से भी ज्यादा फालोअर्स इसके हो गये. यह अस्थाई पार्टी खुद को सीजेपी की सिबलिंग पार्टी कह रही थी.

मोदी के दिमागी नक्सली बाले ताने के जबाब में इन लोगों का कहना था कि कोई नई बात नहीं है सवाल पूछने बालों को ये लोग नक्सली कहते ही हैं. युवाओं ने अपना मेनिफेस्टो जारी करते हुए लिखा `आपके पास एक चालू दिमाग होना चाहिए और आप में जोर से `क्यों` पूछने की हिम्मत होनी चाहिए. सबसे तगड़ा बयान मोदी का मखौल उड़ाते अभिजीत दिपके ने यह कहते हुए दिया कि भागवत ने युवाओं का बचाव किया था. लेकिन तुरंत बाद पीएम मोदी `दिमागी नक्सल` का टर्म लेकर आ गए. साफ़ है कि सरकार अपने ही मार्गदर्शक की बात भी नहीं सुन रही. बकौल अभिजीत भागवत ने कहा था कि जेन जी के प्रदर्शनकारी युवाओं को देशद्रोही नहीं कहा जाना चाहिए.

एक ब्यूरोक्रेट ने उजागर की अमित शाह की मंशा

अब ये अंदरखाने की बातें हैं कि सीजेपी की वजह से आरएसएस और भाजपा में फूट पड़ गई है. और तो और मोदी शाह में भी तनातनी होने लगी है, वजह अमित शाह चाहते थे कि इनके प्रोटेस्ट का सख्ती से दमन करना बेहतर होगा जिससे आइंदा कोई भी सरकार के खिलाफ सर उठाने की जुर्रत न कर सके ..इसका खुलासा भी 2 सितम्बर को हो ही गया जब दिल्ली के नेहरु पार्क में अपने दोस्तों के साथ सुबह की सैर का लुत्फ़ उठा रहे एक पूर्व ब्यूरोक्रेट भारतीय डाक और दूरसंचार लेखा एवं वित्त सेवा के 1992 के बेच के अधिकारी आशीष जोशी को दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल उठाकर न्यू फ्रेंड्स कालोनी के थाने ले गई और उन्हें तकरीबन नौ घंटे पूछताछ के लिए नजरबंद सा रखा.

इस पूछताछ में आड़ आशीष जोशी द्वारा किए गए सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर मुख्य चुनाव आयुक्त पर किए गए एक ट्वीट की ली गई. लेकिन हकीकत यह थी कि असल मकसद यह था कि जोशी ने 12 अगस्त को किए गए एक ट्वीट में जंतर मंतर पर काकरोचों के प्रदर्शन को लेकर गृह मंत्री अमित शाह और गृह सचिव गोविंद मोहन के के बीच हुए टकराव का जिक्र किया था.
इस हटा दिए गए ट्वीट में आशीष जोशी ने दावा किया था कि अमित शाह और गोविंद मोहन के बीच गरमागरम बहस हुई थी. इस टकराव और बहस की वजह यह थी कि गोविंद मोहन जंतर मंतर पर प्रदर्शन कर रहे छात्रों के खिलाफ हिंसक और गंभीर काररवाई के पक्ष में नहीं थे यानी जाहिर है अमित शाह थे.

जोशी के मुताबिक गृह मंत्रालय के कुछ जूनियर अफसर भी अंदरूनी तौर पर सख्त काररवाई के खिलाफ थे. इस सच का खुलासा हुआ तो सियासी और प्रशासनिक गलियारों में चर्चाओ का बाजार गर्मा उठा. इसकी एक वजह यह भी थी कि केंद्र सरकार के हुक्म के चलते इस पोस्ट को एक्स पर से हटा दिया गया था क्योंकि इससे सरकार की असंवेदनशीलता भी उजागर हो रही थी .मजेदार बात यह भी थी कि दिनभर पूछताछ के बाद भी पुलिस आशीष जोशी से यह नहीं उगलवा पाई कि इस अहम और गोपनीय जानकारी का उनका सोर्स क्या था .गौरतलब है कि आशीष जोशी मोदी सरकार के घोषित धुर विरोधी हैं और आए दिन सरकार और उसकी बेजा नीतियों सहित फैसलों के खिलाफ ट्वीट करने से बाज नहीं आते.

दूसरी तरफ मोदी की चिंता अपनी कुर्सी थी. उन्हें नेपाल और लंका याद आ रहे थे जो कि गलत भी नहीं था. क्योंकि धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे के पहले मोदी के इस्तीफे की भी मांग काकरोच करने लगे थे जो जोर पकडती उसके पहले ही प्रधान की बलि चढ़वा दी गई. तब अभिजीत ने जंतर मंतर के मंच से गलत नहीं कहा था कि झुकती है दुनिया झुकाने बाला चाहिए. इन काकरोचों ने सरकार के साथ साथ सुप्रीम कोर्ट को भी झुकाकर इतिहास रच दिया है जिसका जिक्र सौरव दास ने एक सितम्बर को फैसले के बाद मीडिया के सामने किया भी था.

अगली सरदर्दी सुधार

धर्म के गुब्बारे की हवा निकालने के बाद सीजेपी ने सरकारी स्कूलों की बदहाली की न केवल बात करना शुरू कर दी बल्कि खुद भी सरकारी स्कूलों में जाकर बदइन्तजामियो को उजागर करने लगे. यह बात किसी सबूत की मोहताज नहीं है न ही किन्ही आंकड़ों की कि सरकारी स्कूलों में पढ़ने जाने बाले 90 फीसदी बच्चे दलित, आदिवासी, पिछड़े और मुसलमान होते हैं. ये लोग भी पढ़लिख कर जेन जी की तरह सवाल न करने लगें इसलिए धडल्ले से सरकारी स्कूल बंद किए जा रहे हैं.

सीजेपी कैसे स्कूलों के बाबत सरकार को हिला रही है उससे पहले नीति आयोग और शिक्षा मंत्रालय के इस आंकड़े को देखें जिसके मुताबिक पिछले दस सालों में कोई 94 हजार सरकारी स्कूल बंद किए जा चुके हैं यानी प्रतिदिन 25 सरकारी स्कूल बंद हो रहे हैं. और इस बाबत सरकार ने बेहद बचकानी वजहें बताई हैं कि संसाधन कम थे या छात्र ही दाखिला नहीं ले रहे बगैरह बगैरह. आंकड़ों के ही मुताबिक इस दौरान कोई 51 हजार से भी ज्यादा प्राइवेट स्कूल देश में खुले हैं.

सीजेपी ने देश के नौनिहालों की इस बुनियादी जरूरत पर ध्यान देते 15 अगस्त से `स्कूल ठीक करो` मुहिम की शुरुआत की और गाँवों के स्कूलों पर फोकस किया तो भगवा गैंग के प्यादे जमीन पर उतर कर उनसे हिंसा करने लगे. सीजेपी किसी भी मामले में अपनी हिस्सेदारी की बात नहीं कर रही वह केवल सिस्टम को सुधारने की बात कर रही है. मिसाल स्कूलों की लें तो अधिकतर सरकारी स्कूलों में शौचालय नहीं हैं, बैठने को बेंचें या कुर्सी टेबल नहीं हैं. बिल्डिंगे खस्ताहाल हैं, पेड़ के नीचे या मैदानों में स्कूल लग रहे हैं , टीचर पढ़ाने नहीं आते और स्कूलों में भी जातपात और छुआछूत का ग्रहण लगा हुआ है.

जैसे ही काकरोच मैदान में उतरे तो तमाम राज्य सरकारों के माथे पर बल पड़ गए हर राज्य में स्कूली शिक्षा विभाग की मीटिंगे हुई जिनमे शिक्षा मंत्री, कमिश्नर और कलेक्टर से लेकर डिस्ट्रिक्ट और ब्लाक एज्युकेशन आफीसर अलर्ट मोड़ में आ गए और देखते ही देखते स्कूलों का कायाकल्प शुरू हो गया.

लेकिन राजनीति नहीं

इसे सीजेपी का भभका ही कहा जायेगा कि उसकी घोषणा भर से ही स्कूली शिक्षा विभाग खबरदार हुआ है. मुमकिन है कल को सीजेपी स्वास्थ सेवाओं को लेकर भी मुहिम छेड़ दे या निकायों को घेरने लगे तो क्या होगा. होगा यह कि सरकार की पोलें खुलेंगी, भ्रष्टाचार बेनकाब होगा. यह लगभग अन्ना हजारे के 15 साल पहले हुए आंदोलन की कापी होगा, फर्क सिर्फ इतना है कि सीजेपी का कोई गाड फादर नहीं है और न ही वे किसी को अपने उपर हाथ रखने दे रहे जबकि कांग्रेस सहित तमाम पार्टियाँ चाहती हैं कि सीजेपी उनके साथ आ जाए. भाजपा भी इसका अपवाद नहीं है

लेकिन सीजेपी का एजेंडा और काकरोचों के मनुवाद विरोधी तेवरों को देखते भाजपा पहल करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही. जबकि वह तोड़ फोड़ और खरीद फरोख्त सहित साम दाम दंड भेद में कितनी माहिर है यह हर कोई जानता है कि यह वह पार्टी है जो रातों रात किसी भी विरोधी पार्टी के दो टुकड़े भारत पाकिस्तान विभाजन जैसे करवा देती है. यह वह पार्टी है जो राघव चड्डा और ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे दर्जनों लोकप्रिय और उर्जावान युवा नेताओं के गले में भगवा गमछा ओढ़ा कर उन्हें दीक्षा दे देती है और मंत्री पद से भी नवाज देती है.

ये बातें सीजेपी बाले भी जानते हैं लिहाजा भाजपा के ही विरोध में वे गैरराजनैतिक तौर पर खड़े हैं. इसीलिए सैद्धांतिक तौर पर वे कांग्रेस के सबसे ज्यादा नजदीक खड़े नजर आते हैं. कांग्रेस और राहुल गाँधी भी इनके समर्थन का कोई मौका नहीं छोड़ते. जाहिर है इससे कांग्रेस को चुनावी फायदा मिलेगा लेकिन कितना मिलेगा इसका अंदाजा लगाना अभी मुश्किल है. अभिजीत दिपके को हर कभी यह सफाई देने मजबूर होना पड़ता है कि वे कांग्रेस आप या किसी भी पार्टी की बी टीम नहीं हैं.

ऐसा लगता भी नहीं कि सीजेपी राजनीति में आएगी क्योंकि वह अरविंद केजरीवाल का हश्र देख और समझ रही है. एक वक्त में सीजेपी को आप और अभिजीत दिपके को दूसरा केजरीवाल कहा जाने लगा था लेकिन यह मिथक टूट चुका है.

पहली ऑन लाइन पार्टी

सीजेपी शायद दुनिया की पहली पार्टी है जो अभी तक आन लाइन ही चल रही है. इसका कोई घोषित कार्यालय नहीं है हाँ जब भी कोई अहम मीटिंग होना होती है तो वह अभिजीत दिपके के छत्रपति संभाजीनगर स्थित घर पर होती है. लेकिन ऐसा दो तीन बार ही हुआ है नहीं तो ये काकरोच ऑन लाइन मीटिंगों के जरिये ही चर्चा कर फैसले ले लेते हैं. अभी तक निर्वाचन आयोग में भी सीजेपी ने अपनी राजनातिक मान्यता के लिए कोई पहल नहीं की है.

राजनातिक दलों जैसा परम्परागत सीजेपी में अभी कुछ नहीं है इसलिए हालफिलहल इसे डिजिटल जन आंदोलन और प्रेशर ग्रुप ही कहा जा सकता है. जिसकी सारी गतिविधियाँ सोशल मीडिया प्लेटफार्म्स पर संचालित होती हैं. इनमे भी फेस बुक और इन्स्टाग्राम पर वह ज्यादा जोर देती है. इसकी मेम्बरशिप भी पेपरलेस है करोड़ों युवा इसकी वेबसाईट के जरिए ही इससे जुड़े हैं जिसमे उन्हें एक फार्म भरना होता है और अपनी फोटो आईडी अटेच करनी होती है

सीजेपी के दफ्तर के बारे में जब भी सवाल हुआ तो जबाब यही मिला कि जहाँ वाईफाई वहां हेडक्वार्टर. अलावा इसके सदस्यता की शर्तें भी बड़ी अजीब हैं कि सदस्य का `क्रोनोकली आन लाइन` होना अनिवार्य है उसका अतिशिक्षित लेकिन बेरोजगार होना भी जरुरी है और इनसे भी अहम बात उसका पेशेवर शिकायतकर्ता होना जरुरी है. ये तमाम शर्तें जाहिर हैं सीजेआई सूर्यकांत के उस बयान से नगद ली गईं थीं जिसकी विवादित और अपमानजनक टिप्पणी से सीजेआई का जन्म हुआ था. मुमकिन है जस्टिस सूर्यकांत रिटायर्मेंट के बाद खुद को सीजेपी का जन्मदाता कहने लगें.
शुरुआत में अमेरिका के बोस्टन से अभिजीत ने सीजेपी के नेटवर्क को नियंत्रित किया था. लेकिन काम और मेम्बर बढ़े तो कुछ और युवाओं को पद उन्होंने दिए. मसलन सौरव दास और आशुतोष रांका को को-कन्वीनर बनाया और आफरीन नवाज को राष्ट्रीय सचिव के पद से नवाजा. इसी तरह अंजिक्य शिंदे को संगठन सह प्रभारी की जिम्मेदारी दी गई है.

अपने नए अभियानों को अंजाम देने में जुट गई सीजेपी तय है चुनावी राजनीति में भी गुल खिलाएगी. यह ठीक वैसा भी हो सकता है जैसा अन्ना हजारे के आंदोलन के बाद हुआ था यानी सत्ता कांग्रेस के हाथ से फिसलकर भाजपा के पास चली गई थी. ऐसा ही जेपी आंदोलन के बाद भी हुआ था जब सत्ता कांग्रेस से छिटककर जनता पार्टी के पास चली गई थी. क्या काकरोच और जेन जी का आंदोलन इस बार कांग्रेस को सत्ता दिला पाएगा. इस सवाल का जवाव संभावना के सिद्धांत के मुताबिक हाँ में ज्यादा निकलता है क्योंकि सीजेपी के निशाने पर भाजपा और पूरी भगवा गैंग ही हैं. Education System

 

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