Hindi Love Story: “विनय, मुझे माफ़ कर दो, मैं तुम से शादी नहीं कर सकती. मैं अपने पापा को धोखा नहीं दे सकती. मैं उन का गरूर हूं. उन के वर्षों के भरोसे को मैं तोड़ नहीं सकती. हो सके तो मुझे माफ़ कर देना.”
देररात श्रेया के कमरे की जलती हुई लाइट को देख अमन के कदम उस ओर बढ़ गए थे. श्रेया की हिचकियों की आवाज बाहर तक आ रही थी. अमन दरवाजे पर कान लगाए खड़ा था. फोन के उधर किसी ने क्या कहा, अमन यह तो नहीं सुन पाया पर श्रेया के शब्द सुन कर उस के पैर कमरे के बाहर ही जम गए. कितना गुस्सा आया था उसे. पिताजी के खिलाफ जा कर उस ने श्रेया का को-एड कालेज में दाखिला कराया था और वो…
“आग और भूसे को एकसाथ नहीं रखा जाता. वैसे भी, इसे दूसरे घर जाना है. कल कोई ऊंचनीच हो गई तो मुझ से मत कहना.”
अपने बाबा की बात सुन श्रेया संकोच और शर्म से गड़ गई थी. तब अमन ने कितने विश्वास के साथ कहा था, “पिताजी, मुझे श्रेया पर पूरा भरोसा है. वह मेरा सिर कभी झुकने नहीं देगी.”
अमन ने धीरे से दरवाजा खोला. श्रेया रोतेरोते सो गई. अमन उसे सोता हुआ देख रहा था. उस की छोटी सी गुड़िया कब इतनी बड़ी हो गई, तकिया आंसुओं से गीला हो गया था. बिस्तर के बगल में रखे लैंप की रोशनी में उस का मासूम चेहरा देख अमन का कलेजा मुंह को आ गया. कितना थका सा लग रहा था उस का चेहरा मानो वह मीलों का सफर तय कर के आई हो.
आंसू की चंद बूंदें उस के गालों पर भी ढुलक आई थीं. कितनी मासूम लग रही थी वह. उस की श्रेया किसी लड़के के चक्कर में, अभी उस ने दुनिया ही कहां देखी है. ये आजकल के लड़के बाप के पैसों से घुमाएंगेफिराएंगे और फिर छोड़ देंगे. श्रेया के मासूम चेहरे को देख अमन को किसी की याद आ गई, सच मानो तो इतने वर्षों बाद भी वह उस चेहरे को भूल नहीं पाया था.
उसे लगा आज किसी ने उसे 25 साल पीछे ले जा कर खड़ा कर दिया हो. तब न जाने कितनी ही रातें उस ने उस के खयालों में बिता दी थीं. उस के जाने से कुछ नहीं बदला था, रात भी आई थी, चांद भी आया था लेकिन, बस, नींद नहीं आई थी.
कितनी बार, हां न जाने कितनी ही बार, वह नींद से जाग कर उठ जाता. तब एक बात दिमाग में आती, जब ख़याल और मन में घुमड़ते अनगिनत सवाल और बवाल करने लगें तब तुम आ जाओ. तुम्हारा वह सवाल जनून बन जाएगा और बवाल जीवन का सुकून. आज सोचता हूं तो हंसी आती है. बावरा ही तो था वह. बावरे से मन की ये न जाने कितनी बावरी सी बातें थीं. कोई रात ऐसी नहीं थी जब वह साथ न होती. हां, यह बात अलग थी कि वह साथ हो कर भी साथ नहीं होती थी. अमन को कभीकभी लगता कि उस के बिना तो रात में भी रात न होती. शायद इसी को इश्क़ कहते हैं. इतने साल बीत जाने पर भी वह उस को माफ नहीं कर पाया था.
सच कहा है किसी ने, मन से ज्यादा उपजाऊ जगह कोई नहीं होती क्योंकि वहां जो कुछ भी बोया जाए, उगता जरूर है चाहे वह विचार हो, नफरत हो या हो प्यार. कुछ ख्वाहिशें बारिश की बूंदों की तरह होती हैं जिन्हें पाने की जीवनभर चाहत होती है. उस चाहत को पाने में हथेलियां तो भीग जाती हैं पर हाथ हमेशा खाली रहते हैं. उस का प्यार इतना कमजोर था कि वह हिम्मत नहीं कर पाई. बस, कुछ सालों की ही तो बात थी. बस, कुछ साल.
“कैसी लग रही हूं मैं?”
खुशी ने मुसकराते हुए अमन से पूछा था. अमन उस के चेहरे में खो सा गया था. लाल सुर्ख जोड़े और मेहदी लगे हाथों में वह और भी खूबसूरत लग रही थी. वह उसे एकटक देखता रहा और सोचता रहा, ‘मेरा चांद किसी और की छत पर चमकने को तैयार था.’
“तुम हमेशा की तरह खूबसूरत, बहुत खूबसूरत लग रही हो.”
“सच में?”
“क्या तुम्हें मेरी बात पर भरोसा नहीं, कोई गवाह चाहिए तुम्हें?”
अमन की आंखों में न जाने कितने सवाल तैर रहे थे. ऐसे सवाल जिन के जवाब उस के पास नहीं थे. खुशी ने अचकचा कर अपनी आंखें फेर लीं और भरसक हंसने का प्रयास करने लगी. अमन उस मासूम हंसी को कभी नहीं भूल सकता था. न जाने क्या सोच कर वह एकदम से चुप हो गया. उस समय वे दोनों कमरे में अकेले थे. बरात आने वाली थी. सब तैयारी में इधरउधर दौड़भाग रहे थे. कमरे में एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था. ऐसा सन्नाटा जिस को तोड़ने की हिम्मत न अमन में थी और न ही खुशी में. शायद बरात आ गई थी. भीड़ का शोर बढ़ता जा रहा और खुशी के चेहरे पर बेचैनी. वह तेजी से अपनी उंगलियों में दुपट्टे को लपेटती और फिर ढीला छोड़ देती. कुछ था जो उस के हाथों से छूटने जा रहा था पर… खुशी सोच रही थी माथे का सिंदूर रिश्ते की निशानी हो सकती है पर क्या प्यार की भी? तब खुशी ने ही बोलना शुरू किया,
“अमन, शायद तुम्हें मुझ से, अपने जीवन से शिकायत हो. शायद तुम्हें लगे कि जिंदगी ने हमारा साथ नहीं दिया पर एक बार खिड़की से बाहर उन चेहरों को देखो जो मेरी खुशी के लिए कितने दिनों से दौड़भाग रहे हैं. मेरे पापा से मिल कर देखो, खुशी उन की आंखों से बारबार छलक आ रही है और मेरी मां, वे मेरी बलाएं लेती नहीं थक रही.
“क्या अगर आज हम ने उन की मरजी के खिलाफ जा कर चुपचाप शादी कर ली होती, इतने लोगों को दुख पहुंचा कर के हम नए जीवन की शुरुआत कर पाते? तुम्हें शायद मेरी बातें आज न समझ में आएं पर एक न एक दिन तुम्हें लगेगा कि मैं गलत नहीं थी. हो सके तो मुझे भूल जाना.”
‘भूल जाना’ कितनी आसानी से कह दिया था खुशी ने पर क्या यह इतना आसान था. अमन मुसकरा कर रह गया. उस की मुसकराहट में खुशी को न पा पाने का गम, अपने बेरोजगार होने की मजबूरी बारबार साल रही थी. उस दिन खुशी जिन लोगों का दिल रखने की कोशिश कर रही थी, क्या किसी ने उस का दिल रखने की कोशिश की थी? खुशी की बहनें जयमाल के लिए खुशी को ले कर चली गईं. अमन काफी देर तक उस स्थान को देखता रहा जहां खुशी बैठी थी. उस के वजूद की खुशबू वह अभी तक महसूस कर रहा था. खुशी सिर्फ उस के जीवन से नहीं जा रही थी, अपने साथ उस की ख़ुशियों, उस के होने के मकसद को भी ले कर चली गई. वह तेजी से उठा और भीड़ में गुम हो गया.
“अरे अमन, वहां क्यों खड़े हो, यहां आओ न, फोटो तो खिंचवाओ.”
खुशी की मां ने हुलस कर कहा और वह झट से दोस्तों के साथ मंच पर चढ़ गया. न जाने क्यों खुशी का चेहरा उतर गया था. एक अजीब सा तनाव और गुस्सा अमन के चेहरे पर था, जैसे किसी बच्चे से उस का पसंदीदा खिलौनों छीन लिया गया हो. अमन खुशी के पति के पीछे जा कर खड़ा हो गया, जैसे वह खुद को बहला रहा था. जिस जगह पर आज खुशी का पति बैठा है वह जगह तो उस की थी.
आज उस का मन यादों के भंवर में घूम रहा था. याद है आज भी उसे खुशी से वह पहली मुलाकात. फरवरी की वह गुलाबी ठंड. शीतल हवा के झोंके चेहरे से टकरा कर एक अजीब सी मदहोशी में डुबो रहे थे. बादलों से झांकता सूरज बारबार आंखमिचौली कर रहा था. तभी सामने से आती एक सुंदर सी लड़की दिखी जिस ने पीले रंग के सलवारकमीज पर चांदी की चूड़ियां डाल रखी थीं. हाथ की कलाई में बंधी घड़ी को उस ने बेचैनी से देखा. शायद उसे क्लास के लिए आज देर हो गई थी. उस के गोरे चेहरे पर सुतवा नाक ठंड से और भी लाल हो गई थी जो उस की सुंदरता को और भी बढ़ा रही थी. उस के चेहरे पर बिखरी हुई लटें किसी का भी मन को मोह लेने में सक्षम थीं. हर पल उस के कदम अमन की ओर बढ़ते जा रहे थे. उस के हर बढ़ते हुए कदम के साथ अमन का दिल मारो कुलांचे मारने लगा. सांसें थम सी गई थीं. चेहरा घबराहट से लाल हो गया था. शायद यह उम्र का असर था या फिर कुछ और. उस की निगाहों की कशिश उसे अपनी ओर खींचने को मजबूर करती थी. उसे रोज देखने की आदत न जाने कब मुहब्बत में बदल गई.
वे घंटों एकदूसरे के साथ सीढ़ियों पर बैठे रहते थे. उन के मौन के बीच भी कोई था जो बोलता था. एकदूसरे का साथ उन्हें अच्छा लगता था. आज भी उस रास्ते से जब वो गुजरता तो लगता कि उन सीढ़ियों पर मैं बैठा उस का इंतजार कर रहा हूं और वह अपनी सहेलियों के बीच घिरी कनखियों से उस के चेहरे को पढ़ने की कोशिश कर रही है. यहीं, हां, यहीं तो उस ने अपनी शादी का कार्ड पकड़ाया था, न जाने क्यों उस की बोलती और चमकती आंखों में लाल डोरे उभर आए थे. कुछ खोईखोई सी लग रही थी वह. उस दिन भी तो उस ने उस का पसंदीदा रंग पहन रखा था. यह इत्तफाक था या फिर कुछ और, वह आज तक समझ नहीं पाया.
पीले रंग में उस का रंग न जाने क्यों और अधिक तम्बाई लगने लगता. हाथों में वही चांदी की चूड़ियां. लालसुर्ख कार्ड को उस ने अपनी झुकी पलकों और कंपकंपाते हाथों के साथ अमन को पकड़ाया. पता नहीं वह भ्रम था या फिर कुछ और. उस के पतले गुलाबी होंठ कुछ कहने के लिए फड़फड़ाए थे पर. हिरनी सी चंचल आंखों में एक अजीब सा सूनापन था. खालीपन तो उस की आंखों में भी था.
“आओगे न?”
इन 2 शब्दों ने उस के कानों तक आतेआते न जाने कितने मीलों का सफर तय किया था. सच ही तो है, हमसब एक सफर में ही तो हैं.
“तुम, तुम सचमुच चाहती हो मैं आऊं?”
आंसू की 2 बूंदें उस कार्ड पर टप से टपक गईं और वह मेरे बिना कोई जवाब दिए दूर, बहुत दूर, चली गई. कितना गुस्सा आया था उस दिन. एक बार, हां, एक बार, भी नहीं सोचा उस ने मेरे बारे में. क्या वह मेरा इंतजार नहीं कर सकती थी? कितनी शामें मैं ने उस की उस पसंदीदा जगह पर इंतजार किया था पर वह नहीं आई. आज एक शाम फिर ढल गई. आज एक दिन फिर बीत गया. लेकिन वह नहीं आई. शायद, उसे आना भी नहीं था.
खिड़की से झांकता पेड़ मुझ से बारबार पूछता, क्या वह आएगी? पर नहीं. पार्क में पड़ी लकड़ी की वह बैंच. आज भी उस बैंच पर गुलमोहर के फूल गिरते है जिन्हें वह अपने नाजुक हाथों में घुमाघुमा अठखेलियां करती थी. बारिश की बूंदें जब उस के चेहरे को छू कर मिट्टी में लोट जातीं तब वह उस की सोंधी खुश्बू से पागल सी हो जाती. बरगद का वह विशाल वृक्ष जहां वह अमन के साथ घंटों बैठ कर भविष्य के सपनें बुनती, आज भी उस का इंतज़ार कर रहा था. अपनी नाजुक कलाइयों से वह उस विशाल वृक्ष को बांधने का निर्रथक प्रयास करती. उस का वह बचपना आज भी अमन को गुदगुदा देता. अचानक से अनजाने में उस के हाथों में न जाने कहां से एक जीणशीण सी सींक आ जाती और वह कल्पना के आकाश में खड़े हो कर मन के घोड़े दौड़ाने लगती. उस की वे आड़ीतिरछी रेखाएं आज भी उस की कल्पना का हिस्सा बनने को तैयार. वे इंतज़ार करती हैं पर वह नहीं आई. शायद, उसे आना भी न था. अमन अकसर सोचता, ‘अच्छा, तुम उस दिन तो आओगी जिस दिन हर कोई आ कर एक फूल और चंद आंसू मेरे फोटोफ्रेम के आगे रख जाएगा.’
अमन सोच रहा था, शब्द और सोच इंसान दूरियां बढ़ा देते हैं. कभी हम समझ नहीं पाते और कभी समझा नहीं पाते. कल वह खुशी को समझ नहीं पाया था और आज वह श्रेया को नहीं समझ पा रहा. उस ने तो सिर्फ उतना ही देखा और समझा जितना वह देखना और समझना चाहता था. जिंदगीभर उसे खुशी से शिकायतें रहीं पर एक बार भी उस ने यह न सोचा कि खुशी को भी तो उस से शिकायतें हो सकती हैं. वह भी तो उस के पिता से मिल कर उन्हें समझा सकता था. खुशी का दिया जख्म उसे आज तक टीस देता था पर आज श्रेया के प्यार के बारे में जान कर भी वह कुछ नहीं करेगा? क्या उस नए जख्म को बरदाश्त कर पाएगा. खुशी और श्रेया न जाने क्यों उसे आज एक ही नाव पर सवार लग रही थीं, जो दूसरों का दिल रखने के चक्कर में अपना दिल रखना कब का भूल चुकी थीं.
सच कहा था उस दिन खुशी ने, एक दिन मुझे उस की बातें समझ में आएंगी. अमन की आंखें बोझिल हो रही थीं. वह थक गया था अपने विचारों से लड़तेलड़ते. उस की पत्नी नींद की आगोश में थी. अमन खिड़की के पास आ कर खड़ा हो गया. बाहर तेज़ बारिश हो रही थी. हवा के झोंके ने अमन के तन को भिगो दिया. पानी की तेजधार में पत्ते धुल गए थे और कहीं न कहीं अमन की गलतफहमियां भी. उस ने अपनी भीगी हुई हथेलियों की तरफ देखा. इन हाथों में बेशक खुशी के साथ जीने की लकीरें नहीं थीं पर मेरी श्रेया किसी की नफरत का शिकार नहीं बनेगी. वह कल ही उस से बात करेगा कि किम को चाय पर बुलाओ. Hindi Love Story





