Oh My Dog Movie: इंसान और कुत्ते के बीच आपसी बौंड पर पहले भी कई फिल्में बन चुकी हैं. अकसर मेकर्स जब भी यह बौंड दिखाते हैं तो इमोशनल ड्रामा क्रिएट करने की कोशिश करते हैं. ‘ओह माय डौग’ देख कर भी लगता है कि मेकर्स इसी इमोशनल फौर्मूले के भरोसे रहे. आप यकीन करेंगे कि ढाई घंटे की यह फिल्म सिर्फ चेजिंग करते हुए निकल जाती है.

फिल्म की कहानी 2 अलगअलग राज्यों में एकसाथ पैरेलल रूप से चलती है. पहली कहानी असम की है, जहां टैकसैवी और तेज दिमाग का एक बच्चा अपू (माही राय) अपने खोए हुए पालतू कुत्ते मोमो को ढूंढ़ रहा है. अपू के घर में सत्यजीत रे का पोस्टर लगा है और उस का दिमाग किसी डिटैक्टिव से कम नहीं चलता. दरअसल, मोमो को अनजान लोग किडनैप कर चुके हैं. माना जा रहा है किडनैपर कुत्तों को उठा कर उस का मीट बेचने का काम करते हैं. अब मोमो को ढूंढ़ने के लिए उस की हैल्प ट्यूशन टीचर कृष्णा (सुलक्षणा बरुआ) और एक पुलिस औफिसर (विजय मिश्रा) करने लगते हैं.

दूसरी कहानी बिहार की है. यहां मामला बिलकुल उलटा है. एक कंस्ट्रक्शन साइट पर काम करने वाला गरीब मजदूर प्रिंस (निखिल कुमार) अचानक गायब हो जाता है. उस के किडनैपर वे लोग हैं जो मानव अंगों की तस्करी करते हैं. वे गरीबों को निशाना बनाते हैं. उस का एक वफादार आवारा कुत्ता है जिस का नाम उस ने औस्कर रखा है. कुत्ता अपने मालिक को ढूंढ़ने के लिए निकल पड़ता है. इस खोजबीन में आसपास के इलाके के मजदूर, बच्चों को पढ़ाने वाला एक टीचर (पंकज त्रिपाठी) भी जुट जाता है.

ये दोनों कहानियां अलगअलग जरूर हैं जो असफल तरीके से दिखाने की कोशिश करती हैं कि एक गरीब इंसान और कुत्ते के जीवन में ज्यादा फर्क नहीं है. दोनों का ही शोषण किया जाता है, जिस पर सवाल उठाने वाला कोई नहीं है.

फिल्म का पहला घंटा ठीकठाक निकलता है, जहां स्टोरी बिल्ड की जाती है, लेकिन इंटरवल के बाद जैसे ही फिल्म में क्राइम, थ्रिलर और ऐक्शन घुसाने की कोशिश की जाती है, पूरी कहानी पटरी से उतर जाती है.

दूसरा हाफ लंबेलंबे चेजिंग सीन से भर दिया गया है, जो उबा देते हैं. वहीं, फिल्म देखते लगता है कि निर्देशक अमित राय को या तो अपने निर्देशन पर भरोसा नहीं या दर्शकों की समझदारी पर. वे दर्शक को हरेक बात स्पून फीड करते हैं. अपू की हर चालाकी और औस्कर की हर सूंघने की कला को बारबार दोहराया जाता है. क्लाइमैक्स की गाड़ियों का पीछा करने वाला सीन इतना लंबा है कि लगता है कभी खत्म ही नहीं होगा.

हंगरी की फेमस फिल्म ‘व्हाइट गोड’ की तर्ज पर जब औस्कर नाम का कुत्ता गली के सैकड़ों आवारा कुत्तों की पूरी फौज को बुलाता है, तो वह सीन बेतुका और ओवर लगता है. यहां तक कि बेहोशी की हालत में वह मंदिर की घंटियों और भजन से होश में आता है और किडनैपर को नए जनून के साथ फिर से ढूंढ़ने निकल पड़ता है. सोचिए, यह कुत्ता कितना धार्मिक प्रवृत्ति का रहा होगा? वहीं, गुंडों से निबटने के लिए कुत्तों का ‘मास हीरो’ अवतार डाइजैस्ट करना मुश्किल हो जाता है.

एडिटिंग के मामले में फिल्म बेहद कमजोर साबित होती है. जब बिहार में औस्कर का एक जबरदस्त एंट्री सीन चल रहा होता है, तभी कट मार कर कहानी को असम के अपू वाले ट्रैक पर ले जाया जाता है. इस तरह के खराब ट्रांजिशन से सीन का सारा रोमांच ही खत्म हो जाता है.

अदाकारी की बात करें तो कुत्ता (औस्कर) जो कर सकता था उस ने किया है. वहीं चाइल्ड ऐक्टर के तौर पर माही राय ने अपू के किरदार में कौंफिडैंटली रोल निभाया है, हां, कुछ जगह उस का किरदार ओवर कौंफिडैंट जरूर लगता है. अपू की मां का रोल गीता शर्मा ने निभाया है जिस का काम अधिकतर समय रोनेधोने और पूजापाठ करने का रहा.

इस के अलावा पंकज त्रिपाठी न भी होते तो कोई फर्क न पड़ता. वे अपने घिसेपिटे अंदाज में ही दिखे. राजेश कुमार ने एक भ्रष्ट पुलिस वाले के रूप में अच्छा काम किया है. हालांकि, पुलिस वाले की दूसरी भूमिका में पवन मल्होत्रा का किरदार सिर्फ चिल्लाते हुए नजर आता है, जो कानों को चुभता है. फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक मंगेश धाकड़े ने दिया है जो कि ठीकठाक है. गानें हैं नहीं.

सिनेमेटोग्राफी फिल्म के विषय के अनुकूल है. फिल्म की पटकथा पर और काम करने की जरूरत थी. हालांकि, फिल्म डौगलवर्स को पसंद आएगी. Oh My Dog Movie

 

 

 

 

 

 

 

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