Emotional Story: आज ठंड कुछ ज्यादा थी. उन्होंने मोबाइल उठा कर देखा तो दिल्ली का टैंपरेचर 4 डिग्री दिखा रहा था, यह देखते ही दिल बैठ गया था. उन्होंने अपने बगल में राखी शौल को सिर में लपेट कर रजाई को दोनों तरफ दबा लिया. वे सोचने लगीं कि यह शरीर की ठंड नहीं है बल्कि यह तो उन के अंतर्मन की निराशा, अपनों से मिली निष्ठुरता और एकाकीपन का दर्द है जिस ने ठंड के रूप में उन्हें जकड़ लिया है.

सलोनी के सामने वह दृश्य बारबार आ जाता था. बहुतकुछ हो जाने के बाद आखिर उन के बेटे सजल और दिव्या के बीच तलाक हो ही गया था. तलाक के 3 शब्दों पर दस्तखत होने और उस के बाइज्जत बरी होने में पूरे 10 साल का लंबा समय लगा था.

फैसला सुनने के बाद सजल अपनी मां सलोनी का हाथ पकड़ कर कोर्ट से बाहर एक तरफ गया तो उस की अब तलाकशुदा बहू दिव्या अपने पापा के साथ दूसरी तरफ. उन्होंने सोचा था कि अब 10 साल बाद उन्हें जेल से मुक्ति मिल गई है. वे क्या जानती थीं कि आगे क्या होने वाला है.

कोर्ट के गेट से वे बाहर निकल रही थीं, तभी दिव्या अपने पापा के साथ बाहर की तरफ निकल रही थी. वह एक पल को ठिठकी थी और फिर उन के सामने आ कर खड़ी हो गई, ‘आई एम सौरी, मम्मा.’

‘सौरी सजल.’

इन 10 वर्षों में उन्होंने जिस नर्क को झेला है, वही जानती हैं. उन के जीवन की दिशा बदल गई थी. एक हंसतेखेलते परिवार की खुशियां छीन कर ‘आई एम सौरी’ कह कर कितनी आसानी से अपना पल्ला झाड़ रही है. वे उस के भोले चेहरे की पीछे छिपे चालबाज दिमाग को जलती निगाहों से घूर रही थीं. वे कुछ कटु शब्दों में अपने दिल की आग उगलना चाह रहीं थीं कि तभी सजल बोला, ‘आई एम सौरी, दिव्या.’

वे ठगी सी प्रस्तर मूर्ति की तरह ठिठक कर रह गई थीं. क्या नियति को अभी कुछ और भी दिखाना बाकी रह गया है. ये दोनों क्या कर रहे हैं? 10 साल के मुकदमों और तलाक के बाद यह क्या हो रहा है.

कुछ कदम चलने के बाद दिव्या जमीन पर गिर कर बेहोश हो गई थी. उस के पिता उसे संभालते, उस के पहले ही सजल ने उसे अपनी गोद में उठा कर पलक झपकते ही गाड़ी में ले कर हौस्पिटल के लिए चला गया था. उस समय वह यह भी भूल गया था कि उस की मम्मी भी उस के साथ यहां हैं, वह मां जिस ने उस लड़की से 10 साल से सजा भुगती थी.

उस दिन उन्हें फिर से जेल की सलाखें याद आ गई थीं, उन्हें महसूस हुआ था कि वे आज बाइज्जत बरी नहीं हुई हैं बल्कि उन्हें ‘आजीवन कारावास’ जैसी सजा सुनाई गई है और वे जेल की सलाखों के अंदर उम्रकैद की सी सजा काट रही हैं, बाहर सब उन पर हंस रहे हैं.
उसी पल उन्होंने निश्चय कर लिया था कि अब वे इस स्वार्थी दुनिया से दूर हो कर वृद्धाश्रम में रहेंगी, वहां वे अपने ‘आजीवन कारावास’ की सजा काटेंगी.

उस के बाद वे न घर लौट सकीं न कहीं और जा सकीं. इस वृद्धाश्रम में आ गईं, सजल से बिना कुछ कहे, बिना उस की फ़िक्र किए.

यह कशिका वृद्धाश्रम है जहां सलोनी जैसे अनेक वृद्ध अपने जीवन के अनेक सुखद पलों को गुजारने के बाद अब यहां एकाकी जीवन बिता रहे हैं. सलोनी भी उदासी के आवरण में खुद को समेटे हुए अपने कमरे में दुखीमन के साथ पड़ी रहती हैं जैसे कई दूसरे वृद्ध और वृद्धाएं रहती हैं. यह पेड वृद्धाश्रम था, इसलिए प्रबंधन थोड़ा सही था.

वे कल से ही वृद्ध और वृद्धाओं के समूह को एकत्र कर के उन की उदासी को दूर करने के उपाय पर सब की राय के अनुसार अपनी ओर से प्रयास शुरू करेंगी. सभी प्रतिभा संपन्न हैं. शरीर से अवश्य थोड़े शिथिल और अशक्त हुए हैं लेकिन जीवन जीने की जिजीविषा तो जीवित ही है. वे अपना समय, अपनी शक्ति और इच्छा के अनुसार कुछ सकारात्मक, जैसे गीत, अंताक्षरी जैसाकुछ कर के प्रसन्न हो कर साथ में व्यतीत कर सकते हैं. लेकिन वे जानती हैं कि यह आसान नहीं. सलोनी जी को 10 साल का लंबा समय बारबार याद आता. जब दुख में कोई गोते लगाने को मजबूर हो तो उसे हर लहर याद रहती है.

सलोनी का अतीत उन का पीछा आसानी से नहीं छोड़ने वाला. उस का एकएक पृष्ठ उन की  आंखों के सामने सजीव फिल्म की रील की तरह चलता था.

सलोनी की जिंदगी के सफ़र के उस दिन ने सलोनी को सूरज के उजाले में ही तारे दिखा दिए थे. सबकुछ उलटपलट हो गया था. सच तो यह है कि उस घड़ी में ही सबकुछ बरबाद हो गया था. उन का सामाजिक जीवन, उन की इज्जत, उन का कैरियर सबकुछ प्रतिशोध की आग और बदले के जनून के कारण एक झूठी एफआईआर से तहसनहस हो गया था और मजबूरीवश उन्हें यहां पर अंत में आजीवन कारावास भुगतने को मजबूर होना पड़ा था.

वर्ष 2013 के दिसंबर महीने की 20 तारीख को सलोनी के जीवन का दुखद अध्याय शुरू हुआ जब आईपीसी के धारा 498 ए का दुरुपयोग कर के बहू दिव्या ने उन की हंसतीखेलती जिंदगी को बरबाद कर दिया था. दोपहर में लगभग 12 बजे पुलिस की जीप आई और एएसपी अभ्युदय गेट खोल कर अंदर आए और दहेज लेने व बहू दिव्या को जहर देने के आरोप में उन्हें गिरफ्तार कर के ले गए थे. वे ऊंचे पद पर थीं, इसलिए एएसपी आए वरना तो ऐसे मामलों में एएसआई कौन्स्टेबलों को ले कर आते हैं.

दिव्या के पिता ने आरोप लगाया था कि डिग्री कालेज की प्रोफैसर डा. सलोनी सिन्हा ने उन की बेटी को कीटनाशक पिला कर उस की हत्या करने का प्रयास किया था.

दिव्या के मातापिता का आरोप था कि दहेज न लाने के कारण डा. सलोनी ने बहू दिव्या की हत्या का षड़यंत्र रचा. बहू दिव्या को हौस्पिटल में एडमिट करवाया गया था. उस की हालत गंभीर थी. कम से कम रिपोर्ट में तो यही लिखाया गया था. उस ने धारा 304 बी भी लगाई थी जिस में बेल होना मुश्किल होता है.

‘डिग्री कालेज की प्रोफैसर डा. सलोनी ने दहेज के लिए अपनी बहू को कीटनाशक पिला कर हत्या करने की साजिश रची’, यह खबर समाचारपत्र की सुर्खियां बन गई थीं. आज इतने साल बाद भी उन्हें ऐसा महसूस हो रहा था कि जैसे यह सब कल ही घटित हुआ हो.

उस सुहानी सी सुबह में 8 बजे थे. सलोनी जी ने रोज की तरह चाय का कप मुंह से लगाने ही जा रही थीं कि मोबाइल की घंटी बजी थी. उधर सजल उन का बेटा था. ‘मौम, एक खुशखबरी है, मैं ने तुम्हारे लिए बहू पसंद कर ली है.’

‘अरे वाह, यह तो बहुत खुशी की बात है. मुझ से कब मिलवाने वाले हो?’

‘मैं फोटो भेज रहा हूं. मौम, बस, उस से बच कर रहना, वह ला ग्रेजुएट है. किसी प्रतिष्ठित सरकारी ला फर्म में काम करती है.’

‘बहुत अच्छी बात है. होशियार तो तुम रहना. मुझे क्या, मुझे तो दूसरी बेटी मिलेगी. मैं तो अब तुझ से ज्यादा उसे लाड़प्यार दूंगीं,’ सलोनी ने लाड़ से कहा. वह काफी समय से चाह रही थी कि सजल किसी लकड़ी को ढूंढ़ ले.

‘मैं ने आप को पहले ही होशियार कर दिया,’ कह कर वह जोर से हंस पड़ा था.

वे खुशी से फूली नहीं समा रही थीं. वे अपनी खुशी अभी किस से साझा करतीं, आधीअधूरी खबर थी, फिर भी उन्होंने अपने पर्स से 500 रुपए का नोट निकाल कर अपनी मेड सरस्वती अम्मा को दे दिया था, ‘अम्मा, अपने बच्चों के लिए मिठाई ले कर घर जाना.’

वे मोबाइल में फोटो को बारबार देख कर खुश हो रही थीं. वे जैसी नाजुक और सुंदर सी बहू की कल्पना कर रही थीं, लगभग वैसी ही दिख रही थी. अब तो वे बेटे का बेसब्री से इंतजार कर रही थीं. चंचल मन कुलांचे भरते हुए बरसों पीछे पहुंच गया था. जब दोनों बच्चे छोटे थे तो एक ऐक्सिडैंट में पति संजीव उन्हें इस दुनिया में अकेला छोड़ कर संसार से विदा हो गए थे. लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी थी. उन्होंने मां और पिता दोनों का फर्ज निभाते हुए बच्चों को पढ़ालिखा कर इशी को इंजीनियर और सजल को साइंटिस्ट बना दिया. चूंकि संजीव की शादी दूसरी थी, इसलिए उस के मायके वालों ने शादी से इनकार कर दिया था. ऐसे में दोनों ने अपने दोस्तों की मौजूदगी में शादी की थी.

उस के बाद मायके वालों ने तो जीते जी उन का क्रियाकर्म कर दिया था लेकिन उन्होंने कभी भी हिम्मत नहीं हारी थी. ससुराल में एक देवर था जो हमेशा ‘नौ खाए तेरह की भूख’ रखता था. वह पहले ही बिजनैस के लिए संजीव को लंबी चोट दे चुका था. इसलिए, एक तरह से इस दुनिया में उन के लिए कहीं कोई अपना रिश्तेदार नहीं था.

इशी ने जब जय के साथ शादी करना चाहा था तो उन्होंने उस की कोर्ट मैरिज करवा व एक रिसैप्शन दे कर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर दी थी. इशी अपने परिवार के साथ बहुत खुश भी थी.

बच्चों के बड़े होने के साथ वे कालेज में पढ़ातेपढ़ाते इकोनौमिक्स में डाक्टरेट कर के अब कालेज में हैड औफ द डिपार्टमैंट बन चुकी थीं. उन की लिखी किताब तो ग्रेजुएशन के कोर्स में आज भी पढ़ाई जाती है.

सजल ने आ कर बताया था कि दिव्या के पापामम्मी रिश्ते की बात पक्की करने के लिए आएंगे. उन के मन में तो खुशी के मारे लड्ड् फूट रहे थे. उन्होंने सुबह से उठ कर तमाम चीजें बना डाली थीं.

‘मौम, आप ने इतना कुछ बना डाला लेकिन दिव्या तो हैल्थ कौन्शियस है.’

‘चल, ज्यादा बातें मत बना. मेरी बहू आ रही है.’

गेंहुए रंग की कटीले नैननक्श की पतली छरहरी दिव्या को देख उन का मन खुश हो गया था. वह ज्यादातर चुप रही थी. उस के पापा कुछ ज्यादा ही बोलने वाले थे. सच कहा जाए तो उन्हें कुछ चालू किस्म के महसूस हुए थे लेकिन उन्हें तो दिव्या से मतलब था.

दोनों मध्यवर्गीय संपन्न पढ़ेलिखे परिवार थे. सीधी सी बात थी, जब मिंयाबीवी राजी तो क्या करेगा काजी.

दोनों की शादी हो गई. दोनों ही जब हनीमून के बाद लौटे तो दोनों के चेहरों पर खुशी की जगह तनाव दिखाई दिया.

दिव्या और सजल के स्वभाव में बहुत अंतर था. दिव्या बहुत पंक्चुअल और डिसिप्लिन वाली तो सजल लापरवाह और मस्त टाइप. वह साइंटिस्ट था. उस का रिसर्च वर्क लैब में चलता रहता था. सब से बड़ी बात यह थी कि उस का आनेजाने का कोई टाइम फिक्स नहीं था.

दिव्या का व्यवहार उन्हें समझ नहीं आया था. कमरे के अंदर से दिव्या की जोरजोर आवाज अकसर आया करती. यदि वे सजल से इस बारे में जानने की कोशिश करतीं तो वह कह देता कि, ‘मौम, आप परेशान न हों.’ वह रोज शाम को अपनी मैम के घर से खाना खा कर आती. सुबह नाश्ता करती तो उस में भी मीनमेख निकालती रहती. सजल को उन के सामने ही डांट देती, इसलिए वे आगेपीछे अपना नाश्ता कर लेतीं.

दिव्या नौन वेजेटेरियन थी और सजल प्योर वेजेटेरियन.

‘सजल, यू स्टुपिड. तुम्हें जरा भी ड्रैसअप होने का सैंस नहीं है.’

‘क्या जानू, मैं तो ऐसा ही हूं.’

इस तरह की नोकझोंक पहले दिन से ही हो रही थी. वे अपने बचाव के लिए सामने से हट कर अपने कमरे में कुछ पढ़ने बैठ जातीं.

उन्हें कई बार सजल पर गुस्सा भी आता लेकिन वे चुप रहती थीं.

शादी के 6 महीने भी नहीं बीते थे कि सजल को हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से फैलोशिप मिली और रिसर्च के लिए अमेरिका जाने का मौका मिल गया. सजल का तो बचपन का सपना पूरा होने वाला था. वह खुश था. उस ने दिव्या का भी वीजा बनवा लिया था. लेकिन दिव्या ने जाने से मना कर दिया तो जब उन्होंने उसे समझाने का प्रयास किया तो वह उन पर ही नाराज हो कर बोली, ‘प्लीज मम्मी जी, आप हम लोगों के बीच में न ही बोलिए. आप के हक में यही अच्छा रहेगा.’

फिर वह बोली थी, ‘सजल अमेरिका चला जाएगा तो आप किस के सहारे रहिएगा?’

‘मेरा क्या, मैं तो सरकारी नौकरी में हूं. अभी तो पूरी तरह से ठीकठाक हूं. मैं तो अपना समय काट लूंगीं. जब रिटायर हो कर घर बैठूंगी तब देखा जाएगा.’

‘आप को अपनी नौकरी से इतना मोह है, तो मुझे भी तो अपनी ला फर्म की नौकरी प्यारी है.’

उस के पिता 2 दिन बाद गए. वे बहुतकुछ कह गए और काफी कड़वाहट छोड़ गए थे. ‘लोग अपनी पत्नी और परिवार के लिए जाने क्याक्या करते हैं, क्या सजल अपना रिसर्च वर्क छोड़ कर इंडिया में नहीं रह सकता. लोग तो अपना कैरियर भी छोड़ देते हैं.

‘आप का भी यहां अपना कौन बैठा है. यहां रहेगा, तो आप को सहारा हो जाएगा और बुढ़ापा भी आराम से कटेगा.’

‘आप क्यों नहीं समझने की कोशिश कर रहे हैं कि मेरा सहारा बनने के चक्कर में वह अपना कैरियर छोड़ कर इंडिया लौट कर आ जाए, यह तो मुझे कतई अच्छा नहीं लगेगा,’ मैं ने उन्हें टोका था.

आजकल बच्चों के लिए उन का कैरियर सब से ज्यादा महत्त्वपूर्ण होता है. कैरियर के आगे उन्हें कुछ भी नहीं दिखाई देता. सजल का तो बचपन का सपना पूरा होने वाला था. उस ने तो बचपन से ही ख्वाब पाल रखा था कि वह कभी अमेरिका पढ़ाई करने या जौब करने जरूर जाएगा. उस ने एक बार भी नहीं सोचा कि मां उस के बिना अकेले कैसे रहेगी. दिव्या को तो वह अपने साथ ही ले जाना चाहता था लेकिन उस ने ही जाने से इनकार किया था.
दिव्या को उन्होंने एक बार फिर से समझाने की कोशिश की तो वह बहुत रूखे अंदाज में बोली थी, ‘मम्मी जी, प्लीज आप तो हम दोनों के बीच में न ही पड़िए, आप के लिए यही ठीक होगा.’ वे क्या करतीं, चुप रह गई थीं.

सजल के अमेरिका जाने की बात से नाराज हो कर दिव्या अपनी मम्मीपापा के घर चली गई थी. जब बहुत दिन हो गए तो वे बहू को बेटी मानते हुए समझाने के लिए उन के घर पहुंच गई थीं. वहां दिव्या के पिता उन पर नाराजगी दिखाते हुए बोले थे, ‘यदि आप के बेटे को मेरी बेटी के साथ रहना नहीं था, तो उस ने शादी ही क्यों की थी?

‘मेरी बेटी क्यों नौकरी छोड़ कर उस के संग जाए. वह लड़की है इसलिए,’ वे आगे बोले थे.

‘आप का बेटा क्यों नहीं इस औफर को छोड़ देता. वह मेरी बेटी को धोखा दे रहा है. वह अमेरिका में गोरी लड़कियों के साथ रंगरेलियां मनाए और मेरी बेटी यहां अकेली पड़ी सिसकती रहे, यह मुझे मंजूर नहीं. यदि उसे मेरी बेटी को अकेला छोड़ कर ही जाना था तो शादी के पहले ही बता देना था. दिव्या अपनी सरकारी स्थाई नौकरी क्यों छोड़े, वह अपने कैरियर को क्यों दांव पर लगाए.

‘आप अच्छी तरह से समझ लीजिए कि मेरी बेटी को दुखी कर के आप कभी चैन से नहीं रह सकेंगी,’ दिव्या के पिता रैपिड फायर की तरह बोलते रहे.

सलोनी काफी मुश्किल से उन्हें रोक पाई, ‘देखिए, आप समझने की कोशिश क्यों नहीं कर रहे? वह तो दिव्या को अपने साथ ही ले जाना चाहता है. वह उसे धोखा नहीं दे रहा है. वह तो केवल 2 वर्षों के लिए विदेश गया है. अमेरिका जा कर पढ़ने का जनून तो उसे बचपन से था, अब उसे अपने सपने को पूरा करने का अवसर मिला है.’

दिव्या अंदर से निकल कर आई और चीख कर बोली, ‘इस सब के लिए आप ही गुनाहगार हो. आप ने ही सजल को उकसा रखा है कि तुम अमेरिका जा कर रहो.

‘आप मेरी जिंदगी खराब करना चाहती हैं, आप मुझ से जलती हैं.’

इतना सुनते ही वे सन्न रह गई थीं. किसी तरह से बाहर जाने के लिए वे उठी थीं. तभी दिव्या के पिता जोर से बोले थे, ‘आप अपनी करनी का परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहिए.’

वे किसी तरह से गिरतेपड़ते घर लौट कर आ गई थीं.

सजल तो पहले ही अमेरिका जा चुका था. अकेला घर भायंभायं सा करता रहता. उन्हें डिप्रैशन महसूस हो रहा था तो उन्होंने डाक्टर से सलाह ले कर दवा ले ली और उन की ही सलाह पर उन्होंने लायंस क्लब जौइन कर लिया था कि चलो, कुछ तो टाइम पास हो जाएगा.

जीवन पटरी पर आने लगा था. कालेज और लायंस क्लब, खाली समय पर अपनी स्टडीज जारी रखतीं. वे एक नई बुक पर काम शुरू करने का प्लान भी बना रही थीं कि सबकुछ बदल गया और एक दिन दिव्या अपना एक छोटा सा बैग ले कर आ गई थी.

“आप अकेली रहती हैं, इसलिए पापा ने कहा कि तुम्हें ससुराल में ही रहना चाहिए.” दिव्या को देख कर वे खुश हुई थीं. वह आ जरूर गई थी लेकिन अपने कमरे में ही रहती. वह सुबह औमले टनाश्ते में खाती और किचन में गंदगी वहीं छोड़ कर चली जाती. शाम को भी नौनवेज बनाती. उन के लिए सहन करना मुश्किल हो गया था. मेड भी काम छोड़ कर चली गई थी. वाशिंग मशीन में गंदे कपड़े छोड़ कर चली जाती. कमरे में फुल वौल्यूम में रातभर म्यूजिक बजता. शोर की वजह से वे सो नहीं पा रही थीं. वह उन के साथ बातबात पर उलझ पड़ती, ऐसा लगता कि वह उन्हें अपना मातहत समझती हो.

हफ्तेदस दिन में ही वे परेशान हो गई थीं.

उन्होंने दिव्या से नाराजगीभरे स्वर में शिकायत की तो उस ने रिकौर्ड कर के सुबूत तैयार कर लिए कि मेरी सास मुझे सताती है.

वे समझ ही नहीं पाई थीं कि यह प्लान कर के घर आई है और फिर एक दिन इस ने अपने शरीर पर कई जगह चोट मार ली और फिर कीटनाशक पी लिया. कमरे का दरवाजा खुला देख उन की निगाह गई तो दिव्या अस्तव्यस्त बेहोश पड़ी थी. पास में कीटनाशक की बोतल पड़ी हुई थी.

यह सब देख कर वे घबरा गईं और उन्होंने उस के पिता को फोन किया तो वे तुरंत ही एंबुलैंस ले कर आ गए, शायद, उन्हें सारा प्लान मालूम था.

उन्होंने उन पर दहेज उत्पीड़न और हत्या की कोशिश करने की धारा 80/85 के तहत एफआईआर दर्ज करा दी.

पुलिस ने जांच शुरू कर दी. दिव्या ने जाने कब सलोनी के फोन से धमकीभरे मैसेज खुद को भेज कर सलोनी के फोन से उन्हें डिलीट कर दिए थे. दिव्या के फोन पर मौजूद वे सारे  मैसेज उन के खिलाफ सुबूत बन गए.

मैडिकल जांच में दिव्या ने बयान दिया कि सलोनी ने जबर्दस्ती कर के कीटनाशक पिलाया था. सरकारी डाक्टर भी शायद पहले से मिला हुआ था. उस ने एमएलसी बना कर केस को मजबूत बना दिया. उस के शरीर की चोट उन के खिलाफ सुबूत बनीं.

हत्या की कोशिश की धारा 307 के अंतर्गत उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था.

अब वे जेल की सलाखों के पीछे पहुंच गई थीं.

उन से मिलने के लिए एक दिन कालेज से प्रिंसिपल मिसेज मेघना जी आईं. वे जानना चाह रही थीं कि आखिर बात क्या है. सलोनी क्या बतातीं, वे भावनाहीन प्रस्तरमूर्ति की तरह बैठी हुई थीं. वे क्या कहतीं कि वे बेटे और बहू के बीच के आपसी ईगो की शिकार हो गई हैं. जब कि यह पूर्ण सत्य है कि उन की कहीं से भी कोई गलती नहीं थी लेकिन वाह री कानून की पेचीदिगियां, जिन्हें केवल कानून के जानकार ही जानते हैं और आसानी से उन का दुरुपयोग कर लेते हैं.

मेघना जी ने पूछा था, ‘क्या आप के बेटे सजल को इस घटना की जानकारी है. आप उसे यहां बुला लीजिए.’

‘उस के नाम का भी वारंट है. यदि वह आएगा तो एयरपोर्ट से ही गिरफ्तार कर लिया जाएगा. वह वहीं से मेरी बेल के लिए पूरी कोशिश कर रहा है.’

‘यह सब हुआ कैसे?’

‘मेरी गलती थी कि दिव्या के पिता की धमकी को मैं ने हलके में लिया. मैं ने उस पर ध्यान ही नहीं दिया.’

‘यह सारी प्लानिंग दिव्या के पिता के शातिर दिमाग और दिव्या के कानूनी ज्ञान द्वारा की गई. उस के पापा ने जहर वाला ड्रामा करवाया और बेटी ने कानूनी दांवपेंच आजमाया. यदि मैं पहले ही अपने लिए एंटीसिपेट्री बेल (अग्रिम जमानत) की एप्लिकेशन दे दी होती तो मैं  जेल जाने से बच जाती.

‘चलिए, जीवन का यह भी अनुभव हो गया,’ परंतु यह कहतेकहते उन की आंखें छलछला उठी थीं. उन्होंने आगे कहा, ‘यदि दिव्या सजल के साथ नहीं जाना चाहती तो मैं क्या कर सकती हूं. इन दोनों के ईगो में मैं मारी गई क्योंकि सजल मेरा बेटा है और उन लोगों के लिए मैं आसानी से उपलब्ध थी, सजल नहीं.

‘आप ही बताइए, क्या ये दोनों मेरे कुछ भी नहीं लगते कि मैं इन से कुछ कह सकूं. जब भी मैं ने कुछ भी समझाने की कोशिश की तो कह देती है कि आप हम दोनों के बीच में मत बोलिए.

‘मुझे यह समझ नहीं आता कि आजकल के युवाओं में इतना ईगो क्यों है? क्या इसी इगो की लड़ाई के लिए ही शादी की थी. ये सब बातें तो इन लोगों को शादी के पहले ही क्लीयर  कर लेनी चाहिए थी. अब दोनों ही 2 सालों से अलगअलग रह रहे हैं. क्या उन्हें तकलीफ नहीं हो रही होगी?

‘पिछले 2 वर्षों से वह मायके में रह रही है तो वहां क्या उस के मांबाप समझा नहीं सकते? लेकिन नहीं, वो तो कहते हैं कि दिव्या को साथ में रखना नहीं था तो शादी क्यों की, उन्हें ज्यादा ज्ञान देने की कोशिश मत कीजिए. समझाना है तो अपने जिद्दी बेटे को समझाइए.

‘दिव्या खुद कानून की जानकार है और उस के पापा के शातिर दिमाग की प्लानिंग है. इस के साथ ही वे बड़ी पहुंच वाले आदमी हैं. उन्होंने सोचा कि यह अकेली बूढी औरत भला क्या कर पाएगी. उन्हीं की ऊंची पहुंच के कारण ही बेल नहीं हो पा रही है. शायद, हाईकोर्ट से हो  पाएगी.’

वे मन में सोच रही थीं कि दुनिया कितनी स्वार्थी और मतलबी हो गई है. किस तरह से लोग कानून का दुरुपयोग कर रहे हैं. चाहे वकील हो या डाक्टर, पैसा कमाने के लिए तरहतरह के हथकंडे अपना कर बेकुसूरों से पैसा ऐंठा करते हैं.

‘तुम्हारा हाल देख कर तो मैं ने निष्कर्ष यह निकाला है कि बेटे की शादी करो और उसे अलग घर में रहने को कह दो. कम से कम उन दोनों के आपसी झगड़े में मां को तो जेल की हवा न खानी पड़ेगी,’ मेघना जी बोली थीं. जमानत होने वाली है, ऐसी खबर जब से सुनी थी तो उन की रातों की नींद उड़ी थी कि जब जेल से बाहर जाऊंगी तो सब लोग उन्हें ऐसी नजरों से देखेंगे कि जैसे उन्होंने सच में किसी  का कत्ल किया हो.

आज समाज में सास की इमेज ऐसी हो गई है कि मां बेटे की शादी करते ही चुड़ैल बन जाती है और अपने बच्चों को ही जैसे कच्चा खा जाएगी. 25 दिनों बाद जमानत जरूर हो गई थी परंतु उन की यातनाएं अभी समाप्त नहीं हुई थीं. वे पुलिस, कोर्टकचहरी और वकीलों के चंगुल में फंस चुकी थीं जहां से निकलना बहुत मुश्किल होता है.

वे रातदिन अपने भविष्य की अनिश्चितता के विषय में सोचती रहतीं कि एक सभ्य, सुसंस्कृत और समृद्ध निरपराध महिला, जो समाज में एक प्रतिष्ठित पद पर कार्यरत थी, किस तरह से पलभर में कानून के शिकंजे में फंसा कर जेल की सीखचों के पीछे पहुंचा दी गई. और सब से दुखद व शोचनीय बात तो यह है कि वह अपनों द्वारा ही छली गई थी जिस अपराध के लिए वह लेशमात्र भी सहभागी नहीं थी.

वाह रे कानून, वाह री हमारी न्याय व्यवस्था जहां निरपराध वर्षों तक जेल की सलाखों के पीछे बंद रहते हैं और अपराधी अपने धन, बल व पहुंच के जरिए आजीवन जमानत ले कर आजाद घूमते हैं. उन्हें अपनी नौकरी से पहले वीआरएस लेने के लिए मजबूर कर दिया गया. उन के फंड और पैंशन को देने में भी फिलहाल रोक लगा दी गई थी.

अब वे किसी की भी घूरती नजरों का सामना नहीं करना चाहतीं थीं. उन की सारी दुनिया कोर्ट, पुलिस और वकील तक सीमित हो गई थी.

दिव्या चूंकि कानून की जानकार थी इसलिए मामले को हर तरह से उलझाए रहती थी. अब उन का काम केवल वकीलों के साथ कानूनी दानपेंच पर विचारविमर्श करते रहना ही रह गया था. उन का ब्लडप्रैशर हर समय असामान्य रूप से बढ़ा रहता था. नींद की गोलियां भी अपना असर खोती जा रही थीं. उन की हंसी और खिलखिलाहट की जगह चेहरे पर उदासी और चिंता की लकीरों ने उन्हें असमय बूढ़ा और कमजोर बना दिया था. अब न तो उन्हें सजनेसंवरने का शौक रह गया था, न ही खानेपीने का. वे पूरी तरह से वैरागिन सी रहने लगी थीं.

एक दिन फिर से मेघना मैडम आई थीं और उन्हें समझाती हुई बोली थीं, ‘तुम खुद को क्यों दोषी मानती हो?

‘जब तुम ने कोई अपराध ही नहीं किया तो खुद को अपराधी मान कर किस बात की सजा दे रही हो.’

उस दिन वे अपने को संभाल नहीं पाई थीं और पहली बार वे उन के कंधे पर सिर रख कर फूटफूट कर रो पड़ी थीं. ‘अब मुझ में हिम्मत नहीं रह गई है कि लोगों की घूरती नजरों के ताप को सह सकूं. मैं क्या करूं, कहां जाऊं. फैसला आ जाए तो मैं यह शहर छोड़ कर कहीं दूर चली जाऊं जहां मुझे जानने वाला कोई न हो.’

मैडम की आंखें भी बरस पड़ी थीं, ‘खुद को संभालो, सलोनी. यू आर अ जीनियस. आखिर, तुम्हें सजल को भी तो संभालना है.’

‘मैडम, अब मैं दुख झेलतेझेलते पूरी तरह से टूट चुकी हूं. सजल की सूनी उदास आंखों का सामना नहीं कर पाती हूं. उस के चेहरे को देखते ही महसूस होता है कि हम दोनों ही निरपराध हैं. तब भी समाज हम दोनों को ही अपराधी की नजरों से देखता है.’

तारीखें और फिर तारीखें, यह सिलसिला चलता रहा. सजल भी अपनी नौकरी छोड़ कर आ गया था. परिस्थितियों के चलते असमय उस के बालों में सफेदी चमकने लगी थी. वह हर तारीख पर उस को वकील के साथ केस को डिस्कस करते देखा करती और अगली तारीख करतेकरते फैसला आने में पूरे 10 साल लग गए थे. दोनों पक्षों की सहमति से तलाक लेने पर एक अच्छाख़ासा पैसा दिव्या को दे कर मामले को निबटाया गया था.

वृद्धाश्रम में रह रहीं सलोनी को पता चला था कि सजल और दिव्या अब साथ रह रहे हैं चाहे वे कानूनन पतिपत्नी न हों. तलाक के कागज यों ही पड़े रह गए किसी कूड़ेदान में और उसी के साथ सलोनी की जिंदगी भी कूड़ेदान बन गई थी.

4 माह बाद दोनों आए थे कि उन में सुलह हो गई है और वे दोनों चाहते हैं कि वे अब उन के साथ रहें. सलोनी ने बिलकुल साफ़ मना कर दिया था. वे किसी भुलावे में अब नहीं रहना चाहती थीं. वृद्धाश्रम के दुख उस डर से कम थे जो उन्हें सजल और दिव्या के साथ रहने में सताते. सजल ने दोचार बार आने के बाद आना बंद कर दिया था. ईशी अपनी मां के लिए वृद्धाश्रम का किराया भेजती रहती थी. सजल और दिव्या ने तो यह भी नहीं दिया था. Emotional Story

 

 

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