Empty Bank Account: मैं 29 वर्ष का हूं, गुरुग्राम में एक निजी कंपनी में नौकरी करता हूं. मेरी मासिक आय ठीक है लेकिन महीने के अंत तक लगभग पूरा वेतन खर्च हो जाता है. औनलाइन शौपिंग, बाहर खाना और छोटेछोटे अनावश्यक खर्चों का पता ही नहीं चलता. मैं बचत करना चाहता हूं लेकिन हर महीने वही स्थिति रहती है.

ANS. आप की स्थिति उन लोगों जैसी है जिन की आय ठीक होती है लेकिन पैसा बड़े खर्चों से नहीं बल्कि औनलाइन और्डर, बाहर की कौफी, कैब, सब्सक्रिप्शन और छोटेछोटे भुगतान से धीरेधीरे निकल जाता है. इसलिए शुरुआत ‘कम खर्च करूंगा’ जैसे संकल्प से नहीं, बल्कि पैसे को पहले से दिशा देने से करें. वेतन आते ही एक निश्चित राशि- चाहे शुरुआत में सिर्फ 10 फीसदी ही क्यों न हो- अलग बचत खाते या निवेश के लिए तय कर दें और बाकी रकम से महीने का खर्च चलाएं. यानी, पहले बचत, फिर खर्च. महीने के अंत में जो बचेगा, उसे बचाने की कोशिश नहीं.

अगले 30 दिनों तक हर खर्च लिखिए, चाहे वह 100 रुपए का हो या 1,000 रुपए का. महीने के अंत में आप को साफ दिखाई देगा कि पैसा कहां जा रहा है. औनलाइन शौपिंग के लिए 24 घंटे का नियम रखें, बाहर खाने के लिए साप्ताहिक सीमा तय करें और उन ऐप्स की नोटिफिकेशन बंद कर दें जो आप को बारबार खरीदारी के लिए प्रेरित करते हैं. लक्ष्य यह नहीं होना चाहिए कि आप हर छोटी खुशी छोड़ दें बल्कि अनजाने खर्च को जानबूझ कर किए गए खर्च में बदलना है. हर महीने बचत की रकम थोड़ी बढ़ाते जाएं और 3 से 6 महीने के आवश्यक खर्च जितना आपातकालीन फंड बनाने को प्राथमिकता दें.

दोस्त की आर्थिक मदद करतेकरते खुद हो गया हूं परेशान

मैं 33 वर्ष का हूं, इंदौर में अपना छोटा व्यवसाय चलाता हूं. मेरा एक करीबी दोस्त पिछले 2 वर्षों से बारबार मुझ से पैसे उधार लेता है. शुरुआत में मैं ने मदद की लेकिन अब वह समय पर पैसा वापस नहीं करता. दोस्ती खराब होने के डर से मैं साफ मना नहीं कर पाता. मुझे क्या करना चाहिए?

ANS.  शुरुआत में मदद करना आप की संवेदनशीलता थी लेकिन जब उधार बारबार लिया जाए और लौटाने की स्पष्ट जिम्मेदारी न निभाई जाए, तो यह दोस्ती से ज्यादा आप की आर्थिक परेशानी बनने लगता है. सो, अगली बार पैसे मांगने पर लंबी सफाई देने के बजाय शांत और स्पष्ट शब्दों में कहें कि ‘मैं अब दोस्ती में पैसे उधार देने की स्थिति में नहीं हूं. पहले जो रकम दी है, उसे वापस करने की व्यवस्था कर लो, उस के बाद भी मैं नया उधार नहीं दे पाऊंगा.’ यह कहना कठोर होना नहीं है, बल्कि अपनी सीमा तय करना है.

पहले से दिए गए पैसों के मामले में भावनाओं के बजाय तथ्य पर बात करें. कुल रकम लिख कर दोस्त से पूछें कि वह किस तारीख तक कितना वापस कर सकता है और संभव हो तो किस्तों की स्पष्ट योजना बना लें. अगर वह हर बार नई तारीख देता है, तो नया पैसा दे कर पुराने उधार को बढ़ाने से बचें. यह भी याद रखें कि सच्ची दोस्ती आप की हर आर्थिक मांग पूरी करने पर निर्भर नहीं होनी चाहिए. यदि आप का दोस्त आप की परिस्थिति समझता है तो आप की सीमा का सम्मान करेगा और यदि केवल पैसे न मिलने पर रिश्ता खराब होता है तो समस्या आप के ‘न’ कहने में नहीं, रिश्ते की अपेक्षाओं में है.

 

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