बीजेपी को वाशिंग मशीन वाली पार्टी यूंही नहीं कहा जाता. दूसरी पार्टी का कोई नेता, अफसर या बिजनेस मैन कितना ही करप्ट क्यों न हो बीजेपी में शामिल होते ही वह करप्शन के तमाम गंदे दागों से छुटकारा पा कर बिलकुल दूध का धुला जैसा सफ़ेद हो जाता है. बीजेपी अपने तमाम विरोधी पार्टियों को भ्रष्टाचारी कहती है. करप्शन के नाम पर कांग्रेस को तो दिन रात कोसती है लेकिन खुद भ्रष्टाचारियों के लिए पार्टी के दरवाजे खोल कर रखती है और करप्ट नेताओं और अफसरों को बचाती हुई नजर आती है.
जनवरी 2023 से मार्च 2023 तक राजस्थान में कांग्रेस की सरकार थी, मुख्यमंत्री अशोक गहलोत थे. उसी कांग्रेस सरकार के समय में एसीबी ने दिव्या मित्तल को गिरफ्तार किया था और सुमित कुमार को फरार बताकर उसकी संपत्ति कुर्की तक की तैयारी कर ली थी. नशीली दवा के तीन मामलों की तफ्तीश कर रही एडिशनल एसपी दिव्या मित्तल ने एक दवा कारोबारी से 2 करोड़ की रिश्वत मांगी. कारोबारी को गिरफ्तारी का भय दिखा कर डराया और फिर दिव्या मित्तल के कहने पर कांस्टेबल सुमित कुमार ने दवा कारोबारी से संपर्क किया लेकिन अजमेर की ट्रैप कार्रवाई से पहले ही दिव्या मित्तल को भनक लग गई और उन्होंने अपना मोबाइल झील में फेंक दिया.
रिकॉर्ड हुई बातचीत के आधार पर एसीबी ने दिव्या मित्तल के खिलाफ मामला दर्ज किया था. आय से अधिक संपत्ति के दो अलग-अलग मामले की जांच अभी भी जारी है लेकिन सरकार बदलते ही खेल बदल गया. बीजेपी सरकार ने चार्जशीट होने के बाद एसपी दिव्या मित्तल के खिलाफ अभियोजन चलाने की मंजूरी देने से इनकार कर दिया और अब एसीबी ने भी यू-टर्न ले लिया. दलाल की भूमिका का आरोप लगा कर एसीबी ने जिस पूर्व कांस्टेबल सुमित को फरार बता कर कोर्ट से संपत्ति कुर्क कराने की तैयारी की थी, उसे अब क्लीन चिट दे दी गई. एसीबी ने कहा है कि सुमित कुमार के खिलाफ चलान करने लायक सुबूत नहीं मिले. इसके साथ ही कोर्ट में क्लोजर रिपोर्ट पेश कर दी.
ये है बीजेपी सरकार का असली जीरो करप्शन मॉडल. जब तक सरकार दूसरी थी तब तक यही अफसर करप्ट थी. इनके खिलाफ मजबूत सबूत थे लेकिन जैसे ही बीजेपी की सरकार आई, अफसर को राहत मिल गई और फरार को क्लीनचिट मिल गई.
यह कोई पहला मामला नहीं है, बीजेपी में तो भ्रष्टाचारियों और बलात्कारियों को क्लीन चिट देने का पूरा ट्रेंड बन गया है. बिलकिस बानो केस में 11 बलात्कारियों को गुजरात सरकार ने सजा में छूट दे कर रिहा कर दिया था और बीजेपी के नेता ने उनको संस्कारी ब्राह्मण तक बताया था. उन्नाव में कुलदीप सेंगर को बचाने के लिए पूरी सरकार लगी रही. हाथरस में दलित लड़की के साथ बलात्कार के बाद रात के दो बजे पुलिस ने उसके शव को जला दिया और पूरी सरकार आरोपियों को बचाने में लग गई थी.
बृजभूषण शरण सिंह पर देश की टॉप महिला पहलवानों ने यौन शोषण का आरोप लगाया लेकिन बीजेपी ने उसको क्लीन चिट दे कर संसद में बैठाए रखा. व्यापमं घोटाले में 50 से ज्यादा गवाहों की मौत हो गई लेकिन मुख्य आरोपियों को आज तक सजा नहीं हुई. अजित पवार पर 70 हजार करोड़ के सिंचाई घोटाले का आरोप खुद प्रधानमंत्री ने लगाया और एक महीने बाद उसी अजित पवार को उपमुख्यमंत्री बना कर क्लीनचिट दे दी. हिमंत बिस्वा सरमा पर पानी घोटाले का आरोप खुद बीजेपी ने लगाया था और आज वह बीजेपी के मुख्यमंत्री हैं. नारायण राणे, मुकुल रॉय, सुवेंदु अधिकारी, जितने भी नेता विपक्ष में थे और भ्रष्टाचारी थे, बीजेपी की वाशिंग मशीन में धुल कर साफ हो गए. इन भ्रष्टाचारी अफसरों और नेताओं की जाती भी एक फैक्टर है. बीजेपी हिन्दुओं की पार्टी तो बस वोट बैंक के लिए है पहले वह अपर कास्ट की पार्टी है क्योंकि जब मामला दलित अफसरों से जुड़ा होता है तो रवैया अलग होता है.
दलित RPS अफसरों को छोटी-छोटी शिकायत पर सस्पेंड कर दिया जाता है, उनका ट्रांसफर आदिवासी इलाकों में कर दिया जाता है, उन्हें इतना मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है कि कई अफसरों ने सुसाइड तक कर लिया. दिव्या मित्तल की तरह दलित अफसरों की कोई फाइल बंद नहीं होती. उत्तर प्रदेश में कई ईमानदार दलित IPS और PCS अफसरों को सिर्फ इसलिए साइडलाइन कर दिया गया क्योंकि उन्होंने किसी द्विज नेता या ठेकेदार के खिलाफ कार्रवाई कर दी थी. मध्य प्रदेश में आदिवासी अफसरों पर अगर भ्रष्टाचार का एक छोटा सा भी आरोप लगता है तो उसे तुरंत जेल भेज दिया जाता है लेकिन द्विज अफसरों के लिए सरकार खुद अभियोजन रोक देती है इसलिए दिव्या मित्तल केस सिर्फ एक भ्रष्टाचार का केस नहीं है. यह इस बात का सबूत है कि बीजेपी हिंदू के नाम पर वोट तो दलित, पिछड़े, आदिवासी से लेती है लेकिन सरकार बनते ही वह सिर्फ द्विजों की पार्टी बन जाती है. जहां ईमानदार दलित अफसरों को मरने के लिए छोड़ दिया जाता है और करप्ट द्विज अफसरों की फाइल को बंद करवा दिया जाता है. यही बीजेपी का असली जातिवादी चरित्र है.
भ्रष्टाचार भारत में कोई नई बीमारी नहीं है. ऐसा भी नहीं है कि कांग्रेस की सरकारें दूध की धुली थी. सिस्टम में करप्शन की जड़े तो 1947 तक जाती हैं. असल में व्यवस्था में भ्रष्टाचार की संस्कृति धार्मिक कल्चर का बाय-प्रोडक्ट है जिसे हम हजारों साल से विरासत के नाम पर ढो रहे हैं. मंदिर में भगवान को रिश्वत देने की जो प्रैक्टिस है वही सिस्टम में ट्रांसफर हो गई है. आदमी अपने पाप से बचने के लिए भगवान को लड्डू चढ़ाता है, सोना चढ़ाता है, चादर चढ़ाता है, दानपेटी में पैसा डालता है और सोचता है कि इससे उसका पाप धुल जाएगा, उसका काम हो जाएगा. यानी बचपन से ही दिमाग में यह बैठा दिया जाता है कि ऊपर बैठे पावरफुल आदमी को कुछ दे दो तो काम हो जाएगा. आम आदमी थानेदार, पटवारी, अफसर पर भी वही लॉजिक अप्लाई करता है. भगवान को दान देने से मनोकामना पूरी होती है तो अफसर को दान देने से फाइल पूरी जाएगी. जब तक इस दान-दक्षिणा वाली मानसिकता को धर्म के नाम पर पवित्र माना जाता रहेगा तब तक करप्शन को खत्म करना मुश्किल है. कोई भी धर्म करप्शन के खिलाफ नहीं है बल्कि सभी धर्म करप्शन को पैदा करते हैं.
सच बात तो यह है कि भारत में करप्शन सिस्टम की खराबी नहीं, सिस्टम का डिजाइन है. इस डिजाइन की जड़ धर्म में है. बचपन से हर बच्चे को यह सिखाया जाता है कि ऊपर एक अदृश्य पावर बैठा है जिसे खुश किए बिना तुम्हारा कोई काम नहीं होगा. यहीं से करप्शन की मानसिकता शुरू होती है और इसी मानसिकता के तहत कोई बच्चा एग्जाम से पहले मंदिर में नारियल चढ़ाता है, नौकरी लगी तो भगवान को मिठाई चढ़ाता है, बीमार हुआ तो किसी मजार पर चादर चढ़ाता है और ठीक हुआ तो भी. पाप करने के बाद भी दानपेटी भरता है और मुकदमें में राहत मिलने पर भी मंदिर की तिजोरी भरता है. मतलब साफ है, पाप करो लेकिन हिस्सा भगवान को भी दो. अगर ऊपर वाले को रिश्वत दे दी तो तुम्हारा पाप माफ और तुम्हारा काम पक्का. यही है भारतीय करप्शन की पहली पाठशाला. जो बच्चा 5 साल की उम्र में सीखता है कि भगवान को 10 रुपये का प्रसाद चढ़ाने से 100 नंबर आ जाएंगे, वही बच्चा बड़ा होकर अफसर बनता है और सोचता है कि जनता से 10 हजार लेकर उनका काम कर देना तो पुण्य ही है. भगवान को रिश्वत देना अगर आस्था है तो अफसर को रिश्वत देना भ्रष्टाचार कैसे हुआ?
भाग्यवाद भी इसी मॉडल की एक मजबूत इकाई है. धर्म ने सिखाया है कि गरीबी, बेरोजगारी, दुख और परेशानी पिछले जन्म के कर्मों का फल है इसलिए सिस्टम से सवाल मत पूछो, नेता से सवाल मत पूछो, बस अपनी किस्मत को कोसो और भगवान को और ज्यादा दान दो. इसी का फायदा नेता और अफसर उठाते हैं. सड़क टूटी है, स्कूल में टीचर नहीं है, अस्पताल में दवा नहीं है. इन सब खामियों से रोजमर्रा की जिंदगी बदहाली में हो तो सवाल सिस्टम से सवाल पूछने की जरूरत नहीं बल्कि यह मान कर कि परेशानी भाग्य में लिखी है झेलते रहना चाहिए. अगर सब किस्मत का खेल ही है तो करप्शन का रोना ही क्यों रोना?
करप्शन की इसी संस्कृति ने दलाली को पुण्य बना दिया है. मंदिर में पुजारी भगवान और भक्त के बीच का दलाल है. बिना दलाल के भगवान नहीं मिलता. यही धार्मिक मॉडल सिस्टम का हिस्सा बन गया है. बिना दलाल के कोई फाइल आगे नहीं बढ़ेगी. थाने में दलाल, तहसील में दलाल, ब्लॉक में दलाल, नौकरी में दलाल और मजे की बात यह है कि इस दलाली को ही धर्म समझा जाता है. पुजारी को दक्षिणा देना धर्म है तो नेताजी के पीए को पैसा देना अधर्म कैसे हुआ? जब तक आदमी यह मानता रहेगा कि ऊपर कोई बैठा है जिसे पैसा खिलाकर काम कराया जा सकता है, जिसकी दानपेटी भरने से वह खुश हो सकता है, जिसको चादर चढ़ाने से बिगड़े काम बन सकते हैं तब तक नीचे भी हर आदमी पैसा खाकर ही काम करेगा. भ्रष्टाचार कोई सरकारी बीमारी नहीं है, यह धार्मिक संस्कृति का सरकारी वर्जन है. भगवान की दानपेटी में पैसा डालना बंद हो जाये तो सिस्टम में पैसा खिलाना खुद बंद हो जाएगा




