Gen Z Movement: नीट व अन्य परीक्षाओं के पेपर लीक होने को ले कर जेनजी के हुए सफल आंदोलन के बाद अब अभिजीत दीपके ने सरकारी स्कूलों को ठीक करने का अभियान चलाया, जो आज बहुत जरूरी है, तो देशभर में सरकारी स्कूलों के जेन एल्फा कहे जाने वाले स्कूली छात्रछात्राओं ने सुविधाओं को ले कर स्कूलों, सड़कों, डीएमों के औफिसों में धरने देने की शुरूआत कर दी. उन्हें सहयोग देने के लिए नागरिक पत्रकार बन कर सैकड़ों युवा माइक और मोबाइल के जरिए वीडियो बनाबना कर स्कूलों की बदहाली दिखाने/बताने लगे.

देश के स्कूलों की भयावह तसवीरें सामने आने लगीं. पेट फुलाए अध्यापक पंखों के नीचे अपने दफ्तरों में बैठे नजर आए. वे स्कूल की धराशाई हालत की चिंता नहीं करते. 70 हजार से 1 लाख रुपए तक मासिक वेतन पाने वाले अध्यापकों को वेतन तो समय पर मिलता है पर स्कूल के टौयलेट, क्लासरूम, खेल के मैदान, खिड़कियों, दरवाजों को ठीक करने के लिए पैसा नहीं मिलता. यह कैसा दोगलापन है.

इस सब को जाहिर करता जेन एल्फा और जेन जी का आंदोलन अब इतनी आग पकड़ चुका है कि धार्मिक मंत्रों की लाउडस्पीकरों पर प्रचारित की जा रही बातें फीकी हो गई हैं. मोदी सरकार ने जवाबी हमले शुरू किए हैं पर यह मामला ऐसा है कि इस में उस से सटीक जवाब देते नहीं बनता. ज्यादा सवाल उन राज्यों से उठ रहे हैं जहां भारतीय जनता पार्टी की ‘धार्मिक’ सरकारें हैं जो मंदिरों के लिए तो मनचाहा पैसा एकत्र कर सकती हैं पर स्कूलों के लिए नहीं.

सरकारी स्कूल असल में पंडोपुजारियों के लिए आंख में किरकिरी जैसे हैं क्योंकि वहां बिना भेदभाव के ब्राह्मणों, क्षत्रियों, ओबीसी एससी, एसटी और यहां तक कि मुसलिम बच्चे भी एकसाथ पढ़ते हैं. वर्णव्यवस्था और जाति अलगाववाद पर टिका हिंदू धर्म समाज यह स्वीकार नहीं कर सकता कि स्कूल में सभी जातियों के बच्चे एकसाथ बैठें और फिर साथ खेलकूद और पढ़ कर बड़े हों. ऐसे बच्चों में फिर से खाई खोदना उन के लिए ज्यादा मुश्किलभरा व टेढ़ा काम होता है.

पंडोंपुरोहितों का समाज चाहता है कि ऊंचीजातियों के लिए सेवा करने वाले लगातार उपलब्ध रहें, वे भीख मांग कर मंदिरों के बाहरी स्थानों की सेवा कर के अपने को धन्य मानते रहें. जबकि, स्कूलों में साथ पढ़ने वाले 12 साल तक साथ रह कर यह अलगाव सहज नहीं लेंगे.

भाजपा के सामने यह बड़ी चुनौती है कि जेन एल्फा और जेनजी दिमागी न बन जाएं. सो, नरेंद्र मोदी ने उन्हें दिमागी नक्सल करार दे दिया है. नक्सल उन लोगों को कहा जाता है जिन्होंने पश्चिम बंगाल के नक्सलवादी इलाके में जमींदारों के खिलाफ 50 साल पहले खुला विद्रोह किया था. ये जमींदार पूजापाठी परिवारों के थे और न केवल नीची जातियों के किसानों और मजदूरों के खिलाफ आंतक करते थे बल्कि अपने घरों की औरतों के अंगूठे को नीचे दबा कर, उन्हें पैर की जूती समझते थे.

ये लोग विद्रोह पर उतर आए, आज पढ़ाई मांगने लगे तो कल शिक्षक की नौकरी मांगेंगे, फिर पुलिस की नौकरी और आखिर में रिश्वत व चंदे में हिस्सा मांगेंगे. भला, यह कैसे मंजूर होगा?

जेन एल्फा अब जेनजी के पदचिन्हों पर चल रही है. इस से निबटना भाजपा के बस में नहीं है. अब उसे नए तुलसीदास की जरूरत है जो नया रामचरितमानस लिख कर जातिभेद का निवारण बताए. Gen Z Movement

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