Monsoon Session: इस साल के मानसून सत्र की उपलब्धियों की बात करें तो सरकार के खाते में भले ही कई विधेयक दर्ज हों, लेकिन विपक्ष के खाते में एक उपलब्धि सबसे ऊपर लिखी जा सकती है – सत्ता से सवाल पूछने का साहस वापस आ गया.

इस बार संसद का मानसून सत्र 20 जुलाई से 13 अगस्त तक चला. 19 बैठकें होनी थीं, लेकिन विपक्ष के लगातार विरोध और हंगामे के बीच लोकसभा की उत्पादकता महज 19 प्रतिशत और राज्यसभा की 39 प्रतिशत रही. जिस संसद में मोदी सरकार बहुमत के दम पर विधेयक पास कराने की आदी हो चुकी थी, वहां इस बार विपक्ष ने एक नया संसदीय खेल शुरू कर दिया – “पहले मंत्री को सदन में बुलाओ, फिर बहस होगी.” और निशाने पर सबसे ज्यादा रहे गृह मंत्री अमित शाह.

विपक्ष लगातार पूछता रहा – गृह मंत्री सदन में क्यों नहीं हैं? छात्र आंदोलन पर पुलिस कार्रवाई का जवाब कौन देगा? दिल्ली में छात्रों पर कार्रवाई किसके आदेश पर हुई? राम मंदिर चंदे चोरी से जुड़े आरोपों पर सरकार का जवाब क्या है? सरकार की ओर से बार बार किरण रिजिजू अपने स्थान से उठ कर कहते रहे कि सरकार चर्चा के लिए वह तैयार है.

विपक्ष की एक ही रट – चर्चा बाद में, पहले जवाब देने वाला सदन में तो आए! इसी एक बिंदु पर पूरा मानसून सत्र अटका रहा.

देश के गृह मंत्री अमित शाह लंबे समय तक लोकसभा से अनुपस्थित रहे. वे संसद भवन तक आते और काफी देर तक अपनी कार में ही बैठे रहते या अपने कक्ष में चले जाते मगर सदन जहां उन्हें विपक्ष के सवालों के जवाब देने थे, वहां आने की उनकी हिम्मत नहीं पड़ी. और विपक्ष लगातार उनकी मौजूदगी की मांग करता हुआ हंगामा बरपाता रहा. अंततः 13 अगस्त को अमित शाह लोकसभा पहुंचे, यानी सत्र के अंतिम दिन और लगभग 18 दिनों की गैरहाजिरी के बाद. मगर उनके सदन में प्रवेश के बाद लोकसभा ही स्थगित हो गई.

इसे भारतीय लोकतंत्र का नया “एंट्री-एग्जिट मॉडल” कहा जा सकता है.

मंत्री इन – सदन ऑफ़.

मानसून सत्र में सदन से गृहमंत्री ही नहीं प्रधानमंत्री भी गायब रहे. विपक्ष ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी और जवाबदेही पर भी लगातार सवाल उठाए. सरकार के सामने छात्र आंदोलन, नीट विवाद और दूसरे राजनीतिक मुद्दों पर विपक्ष ने दबाव बनाए रखा. छात्र आंदोलन संसद के बाहर भी चर्चा का बड़ा मुद्दा बना और उसका असर सदन के भीतर दिखाई दिया. इस बार विपक्ष ने सही मायनों में और पूरी ताकत से जनता की आवाज को सदन में उठाया.

विपक्ष के तेवरों से डरे प्रधानमंत्री अंतिम दिन सदन में पहुंचे और अमित शाह भी आखिरकार लोकसभा में आये. लेकिन इस बार विपक्ष ने सत्ता के लिए संसद को आरामदायक जगह नहीं रहने दी. पहले जहां विपक्ष ज़रा ज़रा सी बात पर वाकआउट कर जाता था, इस बार विपक्ष अंदर था और देश के प्रधामंत्री और गृहमंत्री बाहर थे.

कहना गलत न होगा कि इस बार विपक्ष ने सरकार को उसके ही हथियार से घेरा. राजनीति में असुविधा भी कभी-कभी बड़ी उपलब्धि होती है. पिछले कुछ वर्षों में विपक्ष पर आरोप लगता रहा कि वह संसद नहीं चलने देता. इस बार विपक्ष ने दिखा दिया कि सदन में सरकार की मौजूदगी और जवाबदेही कितनी है? सदन चलाने में प्रधानमंत्री और गृहमंत्री की इच्छा कितनी है?

इस बार सदन में कुछ विधेयक तो पास हो गए, लेकिन कई प्रस्तावित विधायी कदम आगे नहीं बढ़ सके. विपक्ष ने दावा किया कि उसकी एकजुटता के दबाव में सरकार को पांच विधेयक टालने पड़े, जबकि FCRA से जुड़ा विधेयक संयुक्त संसदीय समिति को भेजा गया.

सरकार के पास संख्या थी, लेकिन विपक्ष ने संसदीय तापमान इतना बढ़ा दिया था कि सरकार को जूड़ी बुखार चढ़ आया था. दरअसल संसद में बहुमत का अर्थ यह नहीं कि सरकार हर सवाल से मुक्त हो गई. बहुमत कानून पास कर सकता है, लेकिन सवालों को खत्म नहीं कर सकता है.

और सबसे मजेदार बात तो यह रही कि सरकार कहती रही कि “हम हर मुद्दे पर चर्चा को तैयार हैं.”

विपक्ष कहता रहा -“तो फिर चर्चा कराइए.”

सरकार बोली – “पहले विपक्ष हंगामा बंद करे.”

विपक्ष बोला – “पहले गृह मंत्री सदन में आएं.”

और संसद बोली – “भाइयो, मुझे भी कभी-कभी चलने दिया करो!”

आखिर में संसद की उत्पादकता के आंकड़े आए तो लोकसभा 19 प्रतिशत पर और राज्यसभा 39 प्रतिशत पर खड़ी थी. 12 विधेयक पारित हुए, लेकिन व्यापक और सार्थक बहस के सवाल पर पूरा सत्र कटघरे में दिखाई दिया. ऐसा नहीं कि संसद नहीं चली. संसद चली मगर संसद में कभी-कभी जो नहीं होता, वह भी राजनीति में बहुत कुछ कर जाता है.

इस बार विपक्ष ने कम से कम यह तो दिखा ही दिया कि यदि वह बिखरने के बजाय किसी मुद्दे पर एकजुट रहे, सड़क के आंदोलन को संसद के सवाल से जोड़ दे और सत्ता से जवाब मांगता रहे, तो सरकार के लिए संसद को सिर्फ संख्या का खेल बनाकर चलाना आसान नहीं है.

और यही इस मानसून सत्र की सबसे रोचक तस्वीर थी कि –

सत्ता के पास बहुमत था,
सरकार के पास विधेयक थे,
मंत्रियों के पास जवाब थे,
लेकिन विपक्ष के पास एक सवाल था – “जवाब देने वाला है कहां?”

विपक्ष ने जो माहौल इस मानसून सत्र में बनाया उससे इतना तो तय हो गया कि अगली बार सरकार के लिए संसद में सबसे जरूरी चीज विधेयक नहीं होगी. Monsoon Session

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