Bollywood Nepotism: बॉलीवुड में नेपोटिज्म यानी भाई-भतीजावाद की चर्चा लंबे समय से होती रही है. किसी अभिनेता का बेटा अभिनेता बन जाता है, किसी निर्माता की बेटी को बिना स्ट्रगल के फिल्म मिल जाती है और किसी बड़े परिवार से आने वाले कलाकार को इंडस्ट्री में जगह दूसरों की तुलना में आसानी से मिल जाती है. यहां टैलेंट के साथसाथ परिवार और पहचान भी सबसे ज्यादा जरूरी होती है.
लेकिन अब मनोरंजन की दुनिया सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं है. पिछले कुछ सालों में यूट्यूब, इंस्टाग्राम और दूसरे सोशल मीडिया एंटरटेनमेंट का बड़ा प्लेटफार्म बन गए हैं. आज कोई व्यक्ति अपने कमरे से वीडियो बना कर लाखों लोगों तक पहुंच सकता है. न कोई फिल्म निर्माता जरूरी है, न किसी टीवी चैनल की नौकरी और न ही किसी बड़े अभिनेता का सहारा. सोशल मीडिया की दुनिया फिल्मों की दुनिया से काफी अलग है लेकिन एक चीज जो अब एक सी हो गयी है वो है नेपोटिज्म. यानी अब नेपोटिज्म केवल बॉलीवुड इंडस्ट्री नहीं बल्कि सोशल मीडिया पर भी देखने को मिलता है. अगर कोई व्यक्ति अपने कंटेंट के दम पर फेमस हो जाता है और उस के बाद उसके भाई, बहन, पत्नी, पति, बच्चे या दूसरे रिश्तेदार भी चैनल और सोशल मीडिया अकाउंट शुरू कर देते हैं और उन्हें शुरुआत से ही लाखों लोगों का अट्रैक्शन मिलने लगता है.
लेकिन सोशल मीडिया और बौलीवुड के नेपोटिज्म में एक बड़ा अंतर भी है. यूट्यूब और इंस्टाग्राम पर किसी को लंबे समय तक सफल बनाए रखने की ताकत इंटनेट यूजर्स के हाथ में होती है. कोई व्यक्ति किसी बड़े क्रिएटर का रिश्तेदार होने के कारण पहली बार लाखों लोगों तक पहुंच सकता है, लेकिन वह लोगों को बारबार देखने के लिए मजबूर नहीं कर सकता. इसके लिए कंटेंट चाहिए.
सोशल मीडिया ने सफलता का दरवाजा सबके लिए खोला
एक समय था जब देश के करोड़ों लोगों के लिए मनोरंजन का मतलब टीवी और फिल्में थीं. दर्शक वही देखते थे जो टीवी चैनल दिखाते थे या सिनेमाघरों में रिलीज होता था. कलाकार बनने के लिए किसी प्रोडक्शन हाउस, फिल्म निर्माता या टीवी चैनल तक पहुंच जरूरी समझी जाती थी.
यूट्यूब ने बदला एल्गोरिदम
आज कोई शिक्षक अपने घर से पढ़ाने के वीडियो बना सकता है. कोई किसान खेती की जानकारी दे सकता है. कोई डाक्टर स्वास्थ्य से जुड़ी सामान्य जानकारी साझा कर सकता है. कोई व्यक्ति खाना बनाना सिखा सकता है. कोई कॉमेडी कर सकता है, कोई यात्रा के वीडियो बना सकता है और कोई सिर्फ अपने रोजमर्रा के जीवन को लोगों के साथ साझा करके फेमस हो सकता है. यानी यहां आपके किसी भी कंटेंट के लिए दरवाजा खुला है.
यूट्यूब पर वीडियो डाल देना आसान है, लेकिन हजारों या लाखों लोगों को उस वीडियो तक पहुंचाना कठिन है. यही कारण है कि आज सोशल मीडिया पर प्रतियोगिता भी बहुत बढ़ गई है. हर दिन लाखों वीडियो और पोस्ट सामने आते हैं. ऐसे में व्यूअर्स के लिए रिलेटेबल कंटैंट बनाना जरूरी है.
क्या सोशल मीडिया पर भी नेपोटिज्म है?
शुरूआत कोई एक इंसान करता है और चैनल चल जाने के बाद फायदा घर से लेकर रिश्तेदारों और दोस्तों को मिलता है. मान लीजिए किसी व्यक्ति के यूट्यूब चैनल पर 50 लाख सब्सक्राइबर हैं. अब उसका भाई अपना चैनल शुरू करता है. वह अपने भाई के चैनल पर आसानी से प्रमोशन पा सकता है. लाखों पुराने दर्शक उसे पहली बार में ही देख सकते हैं. मीडिया भी उसके बारे में खबर कर सकता है. ब्रांड कोलैब्रेट कर सकती हैं. कंटैंट क्रिएटर फुकरा इंसान, नेहा बिष्ट, सौरव जोशी, लाफ्टर क्वीन भारती सिंह जैसे तमाम ऐसे क्रिएटर्स हैं जिन्होंने अपने बलबूते कंटैंट क्रिएशन की शुरूआत की और आज कहीं न कहीं इन के घर वाले भी इशी फील्ड में आ गए और पैसा कमा रहे हैं.
वहीं एक ऐसा क्रिएटर जिसने अभी अभी कंटेंट बनाना शुरू किया है. उसे पॉपुलैरिटी पाने में महीनों या सालों का समय लग सकता है.
लेकिन इसमें एक फर्क यह है कि बड़े भाई या बहन के दर्शक छोटे भाई को पहली बार जरूर देख सकते हैं, लेकिन वे उसके हर वीडियो को देखने के लिए बाध्य नहीं हैं. वे सब्सक्राइब कर सकते हैं, लेकिन बाद में अनसब्सक्राइब भी कर सकते हैं. वीडियो खोल सकते हैं, लेकिन कुछ सेकंड में बंद भी कर सकते हैं. यूट्यूब खुद बताता है कि वह केवल दर्शकों की पसंद और वीडियो के परफार्मेंस को जरूरी मानती है. लोग वीडियो पर क्लिक करते हैं या उसे नजरअंदाज करते हैं, कितनी देर देखते हैं और उन्हें कंटेंट पसंद आता है या नहीं ये सभी बातें ज्यादा मायने रखती है.
इसलिए किसी रिश्तेदार के पास शुरुआती सीढ़ी हो सकती है, लेकिन पूरी इमारत खड़ी करने के लिए उसे खुद काम करना पड़ता है.
यूट्यूब पर सब से ज्यादा किस तरह का कंटेंट देखा जाता है?
वैसे तो इसका कोई सटीक जवाब नहीं है कि यूट्यूब पर केवल एक किस्म के ही कंटेंट काम करता है. सोशल मीडिया कंटेंट का ऐसा दरिया है जहां हर वैरायटी की रील्स देखने को मिल जाएंगी. जिस व्यक्ति को क्रिकेट पसंद है, उसे क्रिकेट के वीडियो अधिक दिखाई दे सकते हैं. जिसे खाना बनाना पसंद है, उसके सामने रेसिपी और कुकिंग वीडियो ज्यादा आ सकते हैं. किसी दूसरे व्यक्ति को कॉमेडी, गेमिंग या शिक्षा से जुड़े वीडियो ज्यादा मिल सकते हैं.
यूट्यूब के अनुसार उसका सिस्टम किसी एक खास वीडियो फॉर्मेट को अपने आप पसंद नहीं करता. वह ज्यादातर से दर्शक की रुचि और वीडियो के परफार्मेंस को देखता है. फिर भी कुछ तरह के कंटेंट लगातार बड़े दर्शक वर्ग को आकर्षित करते हैं. कॉमेडी और मनोरंजन इन में सबसे प्रमुख हैं. लोगों को हंसाने, चौंकाने वाला कंटेंट तेजी से फैल सकता है.
शॉर्ट्स और छोटे वीडियो ने भी देखने की आदत को बदल दिया है. किसी व्यक्ति के पास दस मिनट का समय न हो, फिर भी वह कुछ मिनट या कुछ सेकंड के वीडियो देख सकता है. यही वजह है कि छोटी वीडियोस सबसे ज्यादा देखी जाती हैं.
व्लॉगिंग सबसे आसान और जल्दी फेमस होने का अच्छा तरीका है. यहां दर्शक सिर्फ जानकारी नहीं देखता, बल्कि क्रिएटर की जिंदगी से जुड़ता है. धीरे-धीरे क्रिएटर और दर्शक के बीच एक तरह का पर्सनल कनेक्शन बनता है. लोग ऐसी व्लोगिंग देख कर बोर नही होते और अपने जीवन से कम्पेयर भी करने लगते हैं ऐसे में व्लोग्स एक्साईटिंग भी लगते हैं. इस के अलावा गेमिंग, खाना, यात्रा, फिटनेस, संगीत, मेकअप, फैशन, टेक्नोलौजी, समाचार और सामाजिक मुद्दों से जुड़ा कंटेंट भी बड़ी संख्या में देखा जाता है.
इंस्टाग्राम की दुनिया थोड़ी अलग है
इंस्टाग्राम पर तस्वीरों की जगह अब वीडियो, खासकर Reels, ने खास जगह बना ली है. यहां दर्शक बहुत तेजी से एक कंटेंट से दूसरे कंटेंट पर जा सकता है. इसलिए पहले कुछ सेकंड में ध्यान खींचना बेहद जरूरी है.
इंस्टाग्राम पर ऐसे कंटेंट की संभावना अधिक होती है जो तुरंत समझ में आए और जिसे लोग दूसरों के साथ साझा करना चाहें. कौमेडी, रिलेशनशिप, रोजमर्रा की जिंदगी, फैशन, फूड, ट्रैवल, मोटिवेशन, इंफोर्मेशन, सामाजिक मुद्दे, ट्रेंडिंग विषय और छोटी कहानी वाले वीडियो तेजी से लोगों तक पहुंच सकते हैं.
चैनल आखिर बढ़ता कैसे है?
अगर आपका कंटेंट ऐसा है जिसमें लोगों की रुचि है, तो आपकी शुरुआत अच्छी हो सकती है. लेकिन इसके बाद आपको यह समझना पड़ता है कि उसी विषय को हजारों दूसरे लोगों से अलग कैसे पेश किया जाए.
दूसरी चीज है शीर्षक और थंबनेल.
इंटरनेट पर दर्शक पहले वीडियो नहीं देखता, वह पहले वीडियो का नाम और तस्वीर देखता है. यदि ये दोनों चीजें उसे आकर्षित नहीं करतीं, तो वह वीडियो तक पहुंचेगा ही नहीं. यूट्यूब भी बताता है कि टाइटल और थंबनेल दर्शक को वीडियो की पहली झलक देते हैं और यह तय करते हैं कि वह वीडियो देखे या नहीं.
तीसरी चीज है पहले कुछ सेकंड.
आज दर्शक के पास ऑप्शन बहुत ज्यादा हैं. अगर वीडियो शुरू होने के बाद लंबे समय तक भूमिका ही चलती रहे, तो दर्शक आगे बढ़ सकता है. ऐसे में अपनी विडियो में ऐसा हुक क्रिएट करें की व्यूअर रुकने पर मजबूर हो जाए.
क्या नया क्रिएटर बड़े क्रिएटर को हरा सकता है?
एक बड़े क्रिएटर के पास कई फायदे होते हैं पुराने व्यूअर, पैसा, टीम, कैमरा, एडिटिंग और ब्रांड. नए व्यक्ति के पास शायद इनमें से कुछ भी नहीं होता. लेकिन नए व्यक्ति के पास एक चीज होती है, नये एक्सपेरिमेंट करने की आजादी. वह किसी नए विषय पर वीडियो बना सकता है. वह नई भाषा इस्तेमाल कर सकता है. नया एडिटिंग स्टाइल अपना सकता है. किसी छोटी समस्या को ऐसे तरीके से समझा सकता है जिस पर बड़े क्रिएटर ने ध्यान नहीं दिया. और अगर दर्शकों को वह पसंद आ गया, तो वह धीरे-धीरे आगे बढ़ सकता है. इसलिए सोशल मीडिया पर शुरुआत में असफल होना अंत नहीं है.
लेकिन क्या यह सचमुच पूरी तरह बराबरी का मैदान है? नहीं. यह कहना भी गलत होगा कि सोशल मीडिया पर हर व्यक्ति के पास बिल्कुल समान अवसर हैं. यहां एक फर्क यह है कि दर्शक के पास कमेंट करने की आजादी होती है. वह किसी को सिर्फ इसलिए लंबे समय तक नहीं देखता कि वह किसी बड़े परिवार से आया है. वह देखता है क्योंकि उसे कंटेंट पसंद आता है. यही कारण है कि सोशल मीडिया का नेपोटिज्म बॉलीवुड के नेपोटिज्म से बिल्कुल समान नहीं है.
सोशल मीडिया क्रिएटर्स का भविष्य क्या है?
आने वाले समय में सोशल मीडिया पर वही लोग ज्यादा टिकेंगे जो सिर्फ ट्रेंड के पीछे भागने के बजाय अपना मजबूत कंटेंट और पहचान बनाएंगे. ट्रेंडिंग ऑडियो पर वीडियो बनाना आसान है. किसी वायरल मुद्दे पर बोलना भी आसान है. लेकिन पांच साल तक लोगों को यह कारण देना कि वे आपको क्यों देखें यह कठिन है. Bollywood Nepotism





