Caste Discrimination: गैर भाजपाई दलित नेताओं का अपमान बहुत आम है लेकिन दलित भाजपाई नेता कोई आसमान से उतरे देवता नहीं होते जिनका सम्मान करने सनातनी मजबूर हों. उनके तो संस्कार ही बिना कोई भेदभाव किए दलितों के अपमान करने के हैं. ऐसे में खडगे तो गैर हैं इन सनातनियों ने तो रामनाथ कोविद , द्रोपदी मुर्मू और बंगारू लक्ष्मण जैसे दिग्गजों को भी नहीं बख्शा.
इसमें कोई शक नहीं कि उम्रदराज मल्लिकार्जुन खडगे धाकड़ तजुर्बेकार और जानकार नेता हैं जिनका कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष और राज्यसभा में विपक्ष का नेता होना उनके दलित होने के सामने कम से कम सनातनियों के लिए तो कोई माने नहीं रखता. अगर राजनीति में दिलचस्पी रखने बाले किसी आदमी से यह पूछा जाए कि बताओ देश का ऐसा कौन सा दलित नेता है जिसका धर्म और जाति की बिना पर कभी न कभी अपमान न हुआ तो वह बगलें झांकता नजर आएगा. बात रही मल्लिकार्जुन खडगे की तो वे कितने ही धाकड़ और आत्मविश्वासी हों उस जातिगत अपमान को कभी भूल नहीं सकते जो बीते दिनों उत्तराखंड में उनका हुआ.
जातिगत अपमान की पीड़ा समझने और महसूसने के लिए सीने में दलित का दिल होना जरुरी है. अपमान की आग दलित को न तो सुकून से सोने देती है और न ही चैन से खाने पीने देती है. मुद्दत तक वह धर्म की लगाई इस आग में जलता रहता है लेकिन कर किसी का कुछ नहीं पाता. अगर वह दलित सक्रिय राजनेता हो तो कम से कम सनातन धर्म बालों की पार्टी भाजपा को जरुर कोसता है कि यह मनुवादी पार्टी है जिसमे दलितों की कोई इज्जत नहीं.
लेकिन दलित अगर भाजपा का नेता हो तो क्या होता है. क्या उसका अपमान नहीं होता. इस सवाल का जबाब ढूंढने से पहले मल्लिकार्जुन खडगे के अपमान पर नजर डालना जरुरी है जिसका व्यापक विरोध देश भर में हुआ और काकरोच जनता पार्टी और जेन जी ने भी इस पर एतराज जताया. यह और बात है कि यह विरोध किसी मुहिम की शक्ल नहीं ले पाया.
घटना बीती 8 अगस्त की है जब मल्लिकार्जुन खडगे उत्तराखंड के हल्द्वानी में कांग्रेस की विजय शंखनाद रैली को संबोधित करने के लिए गए थे. यह रैली स्थानीय रामलीला मैदान में आयोजित थी. 10 अगस्त को एक धार्मिक संगठन श्रीराम सेना धर्मार्थ सेवा न्यास के सदस्यों ने मैदान के शुद्धिकरण के लिए हवन कर डाला. शुद्धिकरण के लिए मैदान में गंगाजल का भी छिडकाव किया गया.
श्रीराम सेना ने शुद्धिकरण के बाद जमकर हिन्दू धर्म की जयजयकार के नारे लगाए जिससे साबित हो जाए और मीडिया के जरिए देश भर में बात फ़ैल जाए कि जिस जगह दलित मल्लिकार्जुन खडगे ने भाषण दिया था उस जगह का शुद्धिकरण कर लिया गया है. इस बाबत बाकायदा श्रीराम सेना के सदस्यों ने बयान भी दिया कि रामलीला मैदान सनातन से जुड़े आयोजनों का स्थल है. इसकी पवित्रता को खंडित किया गया है इसलिए उसका शुद्धिकरण किया गया.
जैसा कि सनातनी चाह रहे थे उम्मीद के मुताबिक हल्ला मच गया. इधर कांग्रेसी भी मल्लिकार्जुन खडगे के अपमान का मसला लेकर मैदान में आ गए. मामला चूँकि खडगे के अपमान का था इसलिए इसकी निंदा भी देशव्यापी हुई. तमाम दलित नेताओं ने निंदा करते जांच और काररवाई की मांग की. सीजेपी के नेताओं ने भी प्रतिक्रिया दी कि यह दलित समुदाय का अपमान है जिसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.
13 अगस्त को संसद के मानसून सत्र का आखिरी दिन था. इस दिन खडगे ने अपनी पीड़ा राज्यसभा में यों व्यक्त की –
1 – मैंने उत्तराखंड के हलद्वानी के रामलीला मैदान के मंच से जनता को संबोधित किया था. मैंने वहां किसी जाति या धर्म का नाम नहीं लिया. सिर्फ लोगों की समस्याओ की बात की. लेकिन मेरे जाने के बाद वहां कथित शुद्धिकरण का हवन किया गया. जिससे मुझे आज भी अस्पृश्यता का दंश महसूस हुआ है.
2 – मैं एक अनुसूचित जाति से आता हूँ. मैंने संसद में अपने इतने लम्बे केरियर में कभी किसी के सामने अपनी जाति का हवाला देकर मदद या रक्षा की भीख नहीं मांगी.
3 – मुझमे अन्याय के खिलाफ लड़ने की ताकत है और मैं लड़ता हूँ. लेकिन अछूत मानकर इस तरह शुद्धिकरण करना मेरा और पूरे समाज का घोर अपमान है.
इस भावुक वक्तव्य के बाद उन्होंने मांग की कि इस घिनोनी हरकत को अंजाम देने बालों के खिलाफ एससी एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज कर उन्हें जेल भेजा जाना चाहिए. जबाब में सदन के नेता जेपी नड्डा ने घटना को दुखद और अस्वीकार्य बताते सफाई भी दे डाली कि भाजपा इस तरह की किसी भी मानसिकता या गतिविधि का समर्थन नहीं करती है. और सरकार इस पूरे मामले की जांच करवाकर दोषियों पर सख्त काररवाई करेगी
फिर वही हुआ जो ऐसे मामलों में होता है. श्रीराम सेना धर्मार्थ सेवा न्यास के कर्ताधर्ता साफ़ मुकर गए कि ऐसा मल्लिकार्जुन खडगे के दलित होने के चलते किया गया. बल्कि इसलिए किया गया कि वहां खडगे की रैली के दौरान अल्लाह हू अकबर के नारे लगे थे जिससे सनातन समाज की भावनाए आहत हुई थीं. बात आई गई हो गई जिसमे उत्तराखंड कांग्रेस के अध्यक्ष गणेश गोदियाल जैसे कई नेताओं की आवाज दबकर रह गई कि हवन और शुद्धि करने बाले भाजपा और आरएसएस से जुड़े लोग थे.
ये शुद्धिकर्ता भाजपा के हों या आरएसएस के हों या बजरंगदल के या कि फिर ऐसी किसी सेना के हों वे होते शुद्ध सनातनी और सवर्णवादी होते हैं. दलितों से नफरत करना इनके संस्कार ही नहीं बल्कि पेशा भी है. ये लोग दलितों को उसी नजर से देखते और व्यवहार करते हैं जैसा कि मनुस्मृति और दूसरे धर्म ग्रंथो में निर्देश दिया गया है.
दलितों के अपमान का कोई मौका न चूकने बाले ये सनातनी किसी तरह का भेदभाव अपने और पराए दलितों में नहीं करते. गैर भाजपा नेताओं का अपमान तो आम है लेकिन भाजपाई दलित नेताओं को भी अपमान के घूंट सवर्णों और सनातनियों की पार्टी में पीना पड़ते हैं जिसमे उन्हें मोहरे की तरह इस्तेमाल किया जाता है.
मूर्तियों को भेजा प्रयागराज
इसकी एक बेहतर मिसाल 12 जुलाई 2018 को उत्तरप्रदेश के हमीरपुर से देखने में आई थी जब भाजपा विधायक मनीषा अनुरागी एक मंदिर में चली गई थीं. मनीषा चूँकि दलित समुदाय से आती हैं इसलिए उनके जाने के बाद मंदिर को गंगाजल से धोया गया था और मूर्तियों को शुद्धिकरण के लिए प्रयागराज भेजा गया था.
बाद में मनीषा रोती गाती सी रह गईं थीं कि यह एक महिला का अपमान है और छोटे दिल बाले ऐसा करते हैं. तब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ थे जिन्होंने अपनी ही पार्टी की विधायक के जातिगत अपमान पर कुछ करना तो दूर की बात है कुछ बोलने की भी जरूरत नहीं समझी थी. लेकिन मनीषा समझ गईं थीं कि भाजपा में आने और विधायक बन जाने से उनका दलितपना दूर नहीं हो गया है.
राष्ट्रपति से धक्का मुक्की
18 मार्च 2018 को तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविद पत्नी सहित ओडिशा के पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर गए थे. जब वे मंदिर के गर्भगृह में रत्न सिंहासन के पास दर्शन कर रहे थे तब मंदिर के कुछ सेवादारों यानी पंडे पुजारियों ने वीवीआइपी प्रोटोकाल तोड़ते उनके साथ धक्का मुक्की की थी. जाहिर है इन सेवादारों को यह बर्दाश्त नहीं हो रहा था कि दलित भले ही वह राष्ट्रपति हो को इस पवित्र वैष्णव मंदिर में आकर उसकी पवित्रता भंग करने का हक नहीं होना चाहिए.
चूँकि कोविद सर्वोच्च संवैधानिक पद पर थे सो उन्हें आम दलितों की तरह धकियाया जाना मुमकिन नहीं था. इसलिए भडास, गुस्सा और कुंठा उन्हें धक्का देकर निकाले गए. उनका रास्ता रोकने की भी कोशिश की गई. इन सनातनियों का यह दुसाहस ही कहा जाएगा कि उन्होंने रामनाथ कोविद की पत्नी सविता कोविद को भी कोहनी मारी थी.
यह गंभीर मामला उजागर नहीं होता अगर मंदिर की ही एक आंतरिक बैठक के मिनिट्स लीक नहीं हुए होते. हुआ गया इस मामले में भी कुछ नहीं था सिवाय इसके कि अपमानित राष्ट्रपति की तरफ से 19 मार्च 2018 को पुरी के कलेक्टर को सेवादारों के अनुचित व्यवहार के संबंध में एक असंतोष भरा पत्र भेज दिया गया था
मामला दबाने की कोशिशें कामयाब रहीं थीं. वजह अगर राष्ट्रपति के दलित होने के चलते उनके साथ पंडों ने ऐसा व्यवहार किया यह बात तूल पकडती तो भाजपा की तबियत से छीछलेदार होती. तीन सेवादारों को जरुर नोटिस थमाए गए थे. जाहिर है यह भी लीपापोती बाला सनातनी टोटका था. लेकिन हल्ला मचता देख 30 जून 2018 को राष्ट्रपति भवन के प्रेस सचिव अशोक मलिक ने खुद मीडिया के सामने आकर सफाई दी थी कि महामहिम या उनकी पत्नी के साथ जाति के आधार पर कोई बदसलूकी या दुर्व्यवहार नहीं हुआ था.
गौरतलब है कि दलित राष्ट्रपति के इस अपमान पर भीम आर्मी ने इस कृत्य को मनुवादी मानसिकता से ग्रस्त बताते देशव्यापी विरोध का एलान किया था. अम्बेडकर – लोहिया विचार मंच ने भी मोर्चा खोलते इस तरह की सामंतवादी ताकतों पर एससी एसटी एक्ट के तहत काररवाई की मांग की थी.
आल इंडिया आम्बेडकर महासभा और दलित शोषित मुक्ति मंच ने भी इसे दलित समुदाय का अपमान करार देते सेवादारों की गिरफ्तारी की मांग की थी. बसपा और वामदलों का रुख भी जुदा नहीं था. लेकिन जैसे ही राष्ट्रपति भवन का स्पष्टीकरण आया तो सब फुस्स होकर रह गए थे. अब हकीकत क्या थी यह रामनाथ कोविद से बेहतर कोई नहीं बता सकता जिनकी महती जिम्मेदारी तब राष्ट्रपति पद की गरिमा बनाए रखने की थी. लेकिन एक दलित का स्वाभिमान तो उसके आगे हार ही गया था.
द्रोपदी भी हुईं थी अपमानित
हमने दलित को राष्ट्रपति बनाया , हमने ही एक आदिवासी महिला को देश के सर्वोच्च पद पर बैठाया जैसे राग अलापती रहने बाली भाजपा का सनातनपन नए संसद भवन के उद्घाटन के मौके पर भी उजागर हुआ था. 28 मई 2023 को नए संसद भवन के उदघाटन में राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू को आमंत्रित न किए जाने पर विवाद हालाँकि राजनीति तक ही सिमट कर रह गया था. वजह सभी प्रमुख 20 विपक्षी दलों ने इस समारोह का बहिष्कार किया था.
नए संसद भवन का उद्घाटन प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने किया था. लेकिन देश का आम आदमी भी यह उम्मीद लगाए बैठा कि यह उदघाटन राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू के हाथों होगा. विपक्षी दलों की इस दलील में दम था कि संविधान के अनुच्छेद 79 के मुताबिक भारत की संसद राष्ट्रपति और दोनों सदनों लोकसभा व राज्यसभा से मिलकर बनती है संसद का सर्वोच्च मुखिया राष्ट्रपति होता है. इसलिए उद्घाटन उन्हीं के हाथों होना चाहिए.
लेकिन नहीं हुआ तो इसकी कोई तीसरी वजह नहीं होनी चाहिए जिनमे पहली यह है कि नरेन्द्र मोदी नहीं चाहते थे कि यह अहम काम काम द्रोपदी मुर्मू करें और दूसरी वजह भी न चाहने की है कि संसद के नए भवन के उद्घाटन के पूजा पाठ के लिए देश भर से जो पंडे पुजारी बुलाए गए थे वे नहीं चाहते थे कि एक विधवा आदिवासी महिला यह सब करे जो कि सरासर सनातन के सिद्धांतो और निर्देशों के खिलाफ है. खासतौर से वैदिक अनुष्ठान , गणपति होमम और शुद्धिकरण जिसका शिकार हालिया खडगे हुए.
खडगे को तो खुश होना चाहिए
तब विरोध करने बालों में सबसे उपर नाम इन्हीं मल्लिकार्जुन खडगे का था जिन्होंने यह आरोप लगाया था कि आदिवासी समुदाय और महिला पृष्ठभूमि से आने के कारण जानबूझकर राष्ट्रपति को इससे दूर रखा गया जो उनके समाज का अपमान है.
लेकिन खडगे इस बात पर खुश होने का हक रखते हैं कि कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष होने का पूरा मानसम्मान उन्हें मिलता है, कोई भेदभाव नहीं होता. खुश होने का यह हक इसलिए भी है कि जब साल 2000 में बंगारू लक्ष्मण को भाजपा अध्यक्ष बनाया गया था तो भाजपाई उनसे नमस्ते करते थे जबकि भाजपा के संस्कार राष्ट्रीय अध्यक्ष के पाँव छूने के हैं जो उनके हटते ही फिर शुरू हो गए थे.
लेकिन उनके अध्यक्ष बनते ही देश भर के भाजपाई यह रिवाज भूल गए थे. यह सनातनी रोग कम से कम कांग्रेस में नहीं है यह खडगे के लिए हल्द्वानी का अपमान भूल जाने के लिए पर्याप्त होना चाहिए कि अपने तो सम्मान करते हैं और बराबरी से बैठालते हैं. Caste Discrimination





