Women Freedom in India: 15 अगस्त 1947 को जब लाल किले पर तिरंगा लहराया गया तो इसे भारत की आजादी मान लिया गया. इस आजादी का कोई जेंडर नहीं था. संविधान में लिखा गया कि अब हर नागरिक बराबर है. सम्मान, सुरक्षा, अवसर, वोट का हक, पढ़ने का हक और बोलने का हक सबको मिला लेकिन आजादी के 80 साल बाद भी अगर हम घर की चौखट के अंदर झांकें तो एक दूसरा भारत दिखता है. वो भारत जहां औरत का शरीर, उसकी मर्जी, उसका समय और उसकी रातें आज भी आजाद नहीं हैं. देश को अंग्रेजों से आजादी मिली लेकिन औरत को घर की गुलामी से आजादी नहीं मिली.

आजादी का मतलब सिर्फ कानून में बराबरी नहीं होता. आजादी का मतलब डर के बिना जीना भी होता है और इस मामले में भारत सबसे ज्यादा पीछे हैं. गुलामी की पहली जंजीर है बिना सेलरी के काम. आज भी भारत में यह एक आम सोच है कि खाना तो औरत ही बनाएगी. ऑफिस से 8 घंटे काम करके लौटने के बाद भी रसोई उसी की है और सबसे बड़ी बात कि इसे काम ही नहीं माना जाता. यह अदृश्य श्रम है. पुरुष की आजादी 6 बजे ऑफिस से खत्म हो जाती है. औरत की ड्यूटी 6 बजे से शुरू होती है. कोई छुट्टी नहीं, कोई प्रमोशन नहीं और कोई पेंशन नहीं. संविधान ने समानता दी लेकिन समाज ने गृहिणी का ठप्पा लगाकर इस समानता को मानने से इनकार कर दिया.

गुलामी की दूसरी जंजीर यह है कि आज भी रात को 9 बजे के बाद लड़कियां घर से बाहर नहीं निकल सकती, क्यों? सड़कें सुरक्षित नहीं हैं लेकिन किससे? पुरुष नाम के दरिंदो से. पुरुष के लिए रात आजाद है. दोस्तों के साथ घूमना है. पार्टी करनी है या कहीं भी जाना है तो कोई खौफ नहीं लेकिन औरत के लिए रात सबसे बड़ा खतरा है क्योंकि रातों को पुरुष नाम का खतरनाक जानवर सड़कों पर होता है वही पुरुष जो रातों को बेखौफ़ घूम सकता है. दिल्ली में निर्भया, कोलकाता में जूनियर डॉक्टर, उन्नाव, हाथरस और इस तरह के तमाम रेप कांड के बाद यही चिल्लाया जाता है कि लड़कियों को सावधान रहना चाहिए. मतलब सड़कें, बसें, ऑफिस सब मर्दों के लिए सेफ हैं, बस औरत को ही घर में रहना चाहिए. ये आजादी नहीं है बल्कि यह नजरबंदी है. एक ऐसा कर्फ्यू जो संस्कार के नाम पर सदियों से चल रहा है.

गुलामी की तीसरी जंजीर है औरत की मर्जी पर कंट्रोल. कानून कहता है 18 साल की उम्र के बाद हर नागरिक अपनी शादी खुद तय कर सकता है लेकिन समाज की हकीकत इसके एकदम उलट है. मर्जी से शादी का तो सवाल ही नहीं. शहरों की बात अलग है लेकिन ग्रामीण भारत में तो आज भी लड़की की अपनी कोई मर्जी नहीं होती. अगर लड़की जाति, धर्म से बाहर जाकर अपनी पसंद के लड़के से शादी करे तो घर की इज्जत ढह जाती है और समाज की चूलें हिल जाती हैं. ऑनर किलिंग, खाप पंचायत और सामाजिक बहिष्कार यह सब उसी आजादी को कुचलने के टूल हैं. अगर औरत शादी न करना चाहे, लिव-इन में रहना चाहे या अकेले रहना चाहे तो समाज में ऐसी औरतें बदचलन साबित कर दीं जाती हैं. पुरुष के लिए अकेला रहे तो यह उसकी आजादी है लेकिन औरत ऐसा सोचे तो वह कैरेक्टर लेस हो जाती है.

असली आजादी तब है जब औरत को मर्दों से इजाजत मांगनी न पड़े. जब वो बिना ये सोचे कि दुपट्टा ठीक है या नहीं रात 12 बजे भी ऑटो ले सके. जब वो अपनी मर्जी से शादी के लिए हां या ना कह सके, बिना इस डर के कि परिवार टूट जाएगा. जब खाना बनाना औरत की जिम्मेदारी न होकर उसकी चॉइस हो.

80 सालों में बहुत कुछ बदला है. औरतें पायलट, जज, वैज्ञानिक, मुख्यमंत्री बनीं हैं. दहेज, घरेलू हिंसा, तीन तलाक के खिलाफ कानून बने हैं लेकिन यह कानून घर के बाहर तक सिमित होकर रह गये जिससे औरतें घर के अंदर सिमट कर रह गई. घर के अंदर का संविधान आज भी परम्पराओं से चलता है.

एक राष्ट्र की आजादी असल में उसकी आधी आबादी से जुड़ा मामला है. कोई देश आजाद है या नहीं इससे बड़ा सवाल यह है कि उस देश की आधी आबादी आजाद है या नहीं? जब तक एक लड़की को ये तय करने की आजादी नहीं कि वो क्या पहनेगी, किससे प्यार करेगी, कितने बजे घर आएगी और किसके साथ जिंदगी बिताएगी तब तक राष्ट्र की आजादी अधूरी है. देश की आजादी का असली मतलब तब ही पूरा होगा जब हर बेटी ये कह सके, ये देश मेरा है और ये शरीर भी मेरा है.

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