Ashokdham Temple Accident: सावन के सोमवार को मंदिरों में उमड़ने वाली भीड़ हमारे समाज की अंध-आस्था की ऐसी तस्वीर है जो अक्सर प्रशासनिक तैयारियों पर भारी पड़ जाती है और आस्था का उत्सव मातम में बदलते देर नहीं लगती. बिहार के लखीसराय स्थित प्रसिद्ध अशोकधाम मंदिर में 17 अगस्त की सुबह हुआ हादसा यह सवाल खड़ा करता है कि लाखों लोगों को मंदिरों की तरफ धकेलने वाला सत्ता और धर्म के घालमेल से बना तंत्र यदि मंदिरों में भक्तों की सुरक्षा और उनकी जान बचाने की पर्याप्त व्यवस्था नहीं कर सकता तो मंदिरों के कपाट बंद क्यों नहीं कर देता?

सावन के तीसरे सोमवार को शिव का जलाभिषेक करने के लिए लखीसराय के अशोकधाम मंदिर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे थे. मंदिर के बाहर अशोकधाम हॉल्ट रेलवे स्टेशन के सामने से लंबी कतार लगी थी. इसी दौरान दो ट्रेनें भी स्टेशन पर पहुंचीं और भीड़ का दबाव बढ़ गया. तभी बिजली का खंभा गिरने की अफवाह फैली, जबकि प्रशासन के अनुसार केवल बिजली का तार टूटा था. देखते ही देखते महिलाओं की कतार में अफरा-तफरी मच गई और कई महिलाएं एक-दूसरे के ऊपर गिरती चली गईं. प्रशासन के अनुसार सात महिलाओं की मौके पर ही मौत हो गयी और अनेकों लोग इस भगदड़ में घायल हो गए.

यह सिर्फ एक हादसा नहीं है. यह उस व्यवस्था पर सवाल है जो हर साल सावन, कांवड़, नवरात्र, कुंभ और दूसरे बड़े धार्मिक आयोजनों के दौरान भारी भीड़ की आशंका जानती है, फिर भी हादसा होने के बाद अपनी गलती छुपा यह राग अलापने लगती है कि ‘होनी को कौन रोक सकता है.’

सबसे चिंताजनक बात यह है कि अशोकधाम मंदिर में भीड़ से जुड़ी समस्या नई नहीं थी. वर्ष 2019 में भी सावन के अंतिम सोमवार को इसी मंदिर में भगदड़ जैसी स्थिति में एक व्यक्ति की मौत और कई लोगों के घायल होने की खबर आई थी. उस समय भी मंदिर में भारी भीड़, बैरिकेड पार करने और पर्याप्त निकास व्यवस्था नहीं होने की बात सामने आयी थी.

इसके बाद भी वहां भीड़ लगातार बढ़ती रही. 2024 में सावन की अंतिम सोमवार पर करीब एक लाख श्रद्धालुओं के जलाभिषेक करने की खबर आई. 2025 में मंदिर में 1.60 लाख से ज्यादा श्रद्धालुओं के पहुंचने की बात सामने आई और उस समय कंट्रोल रूम के पास कोई मेडिकल कैंप तक नहीं था.

सवाल यह है कि इन आंकड़ों से प्रशासन ने क्या सबक लिया?

धार्मिक आयोजनों में भीड़ अचानक नहीं आती है. तारीख पहले से मालूम होती है, पर्व पहले से मालूम होता है, मंदिर की क्षमता का अनुमान सबको होता है और पिछले वर्षों का अनुभव भी सामने होता है. फिर भी लोगों को धर्म की घुट्टी पिला कर मौत की तरफ धकेलते जाते हैं. जब हजारों लोग एक संकरे रास्ते, रेलवे स्टेशन, बैरिकेड और मंदिर के प्रवेश द्वार के आसपास जमा होंगे तो छोटी-सी अफवाह भी उनके लिए जानलेवा साबित हो जाती है.

देश में ऐसी घटनाओं का लंबा इतिहास है. 2022 में वैष्णो देवी मंदिर में भगदड़ से 12 श्रद्धालुओं की मौत हुई थी. उसके बाद ऑनलाइन पंजीकरण, आरएफआईडी, प्रवेश-निकास के अलग रास्ते और भीड़ को नियंत्रित करने जैसी व्यवस्थाओं पर जोर दिया गया था. मगर यह व्यवस्था आज तक ठीक तरीके से नहीं बन पायी. 2024 में उत्तर प्रदेश के हाथरस में धार्मिक आयोजन के दौरान 121 लोगों की मौत ने भीड़ प्रबंधन की भयावह तस्वीर देश को दिखाई. इन घटनाओं का सबसे दुखद पहलू यह है कि इनमें ज्यादातर महिलाएं मारी जाती हैं. अशोकधाम में सात महिलाओं की मौत केवल सात परिवारों का दुख नहीं है.

यह उस व्यवस्था के लिए चेतावनी है जो हर साल वही गलती दोहराती है और हर बार मौत के बाद जागती है. हर हादसे के बाद जांच समिति बनती है, मुआवजे का ऐलान होता है और कुछ दिनों तक सुरक्षा व्यवस्था की चर्चा होती है, लेकिन असली सुधार तब होगा जब भीड़ को सिर्फ संख्या नहीं, बल्कि जोखिम के रूप में देखा जाए. Ashokdham Temple Accident

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