Democracy in India: पिछले 12 वर्षों से भाजपा सरकार ने मनमानी करते हुए अपने विरोधियों को हाशिए पर धकेला और लोकतंत्र की रीढ़ तोड़ने की कोशिश की. उस ने हर विरोध को दबा दिया और हर आवाज को कुचल दिया लेकिन सीजेपी प्रोटैस्ट के दौरान युवाओं का जो आक्रोश दिल्ली के जंतरमंतर पर फूटा उस से देश के कोनेकोने से युवाओं की आवाज बुलंद हुई. इस आंदोलन ने साफ कर दिया कि यह मुल्क एक व्यक्ति, एक संगठन, एक पार्टी या एक विचारधारा की बपौती नहीं है बल्कि यह 140 करोड़ लोगों का देश है. यह देश एकतंत्र का नहीं, बल्कि लोकतंत्र का शानदार उदाहरण है.
पिछले 12 सालों में जब भी मजदूर, किसान, टीचर, पर्यावरण की चिंता करने वाले और अपने अधिकारों की बात करने वाले लोग मौजूदा तानाशाही सरकार की जनविरोधी नीतियों से तंग आ कर सड़कों पर उतरे, उन से सीधे मुंह बात नहीं की गई. उन पर लाठियां भांजी गईं, पेलेट गन चलाई गईं, रास्ते पर बैरिकेड लगाए गए. यही नहीं, उन्हें देशद्रोही तक कह दिया गया. सवाल यह है कि जिस सरकार ने पिछले 12 सालों से अपने तमाम विरोधियों को हाशिए पर धकेले रखा था और अपने खिलाफ उठी तमाम आवाजों को कुचला था, वह सीजेपी के प्रोटैस्ट के दौरान इतनी लाचार कैसे हो गई कि युवाओं ने उसे झुका दिया? क्या इसे लोकतंत्र का नया सवेरा कहा जा सकता है? यह भाजपा सरकार के लिए सब से बड़ा झटका है.
- 2020 में सीएए-एनआरसी के खिलाफ शाहीनबाग में महिलाएं 100 दिनों तक बैठी रहीं. वहां भी सरकार ने बात करने के बजाय लाठी भांजी, गोली चलाई और गोली मारो का नारा दिया. कोरोना का बहाना बना कर आंदोलन को कुचल दिया.
- 2021 के किसान आंदोलन के दौरान 3 काले कानूनों के खिलाफ लाखों किसान सालभर तक दिल्ली की सीमा पर बैठे रहे. इस दौरान 700 से ज्यादा किसान शहीद हुए. किसानों के लिए बैरिकेड लगाए गए, कीलें बिछाई गईं, सड़कें खोद दी गईं और उन्हें आतंकवादी व खालिस्तानी तक कहा गया. आखिर में कानून तो वापस हुए लेकिन एमएसपी की गारंटी आज तक नहीं मिली.
पिछले 12 सालों में बीजेपी लगातार इतनी मजबूत होती गई है कि लोकतंत्र के सभी अंग इस की मुट्ठी में पहुंच चुके थे. चुनाव आयोग जैसी संस्था बीजेपी का दफ्तर बन गई. मेनस्ट्रीम मीडिया सरकार की प्रवक्ता बन गई. ईडी, सीबीआई और पुलिस बीजेपी के इशारों पर नाचते दिखाई देने लगे. विपक्ष को दुश्मन मान लिया गया और हर विरोधी आवाज को कुचलने का सिलसिला जारी रहा.
मैडिकल कालेजों में प्रवेश के लिए होने वाली केंद्रीय परीक्षा नीट 2026 के पेपर लीक के खिलाफ सीजेपी प्रोटैस्ट 28 जून, 2026 से दिल्ली में शुरू हुआ. 20 दिन तक कइयों की भूख हड़ताल चली. छात्रों की मांग थी एनटीए भंग हो, शिक्षा मंत्री का इस्तीफा हो, पेपर लीक पर सख्त कानून बने और नीट की वजह से जान गंवाने वाले छात्रों के परिवार को एक करोड़ रुपए का मुआवजा मिले.
सरकार ने इस आंदोलन को कुचलने के लिए भी वही पुराना पैतरा आजमाया. भाजपा की ट्रोल आर्मी और अर्नब गोस्वामी जैसे न्यूजरीडरों ने इस प्रोटैस्ट के लीडरों को चीन का एजेंट बताया. स्टूडैंट्स को आतंकवादियों की बी टीम बोला गया. उन्हें सूली पर चढ़ाने की धमकी दी गई. इस के बाद भी आंदोलन चलता रहा. 20 जुलाई को पुलिस ने बर्बर तरीके से लोगों पर लाठीडंडे बरसाए और लड़कियों के साथ हिंसा की घटनाएं हुईं. इस पुलिसिया दमन के बाद 23 जुलाई, 2026 तक यह प्रोटैस्ट अपने पीक पर पहुंच चुका था.
मामला काबू से बाहर जाते देख सरकार बैकफुट पर आ गई और 24 जुलाई, 2026 को सरकार ने आननफानन एनटीए के
47 कर्मचारियों को बर्खास्त कर दिया. इसी रात प्रधानमंत्री मोदी ने इंस्टाग्राम पर लाइव आ कर सख्त कानून बनाने का भरोसा दिया लेकिन प्रधानमंत्री की इस अपील का कोई फायदा नहीं हुआ. तब आखिरकार 25 जुलाई की दोपहर को शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया और सरकार ने सीजेपी की बाकी मांगों को भी मान लिया. इस तरह देश की राजनीति ने अचानक करवट ले ली है.
एकतंत्र के खिलाफ
युवा आक्रोश
लोकतंत्र जनता के लिए होता है और जनता भाषा, मजहब, विचार, संस्कृति, खानपान, पहनावे और जीवनशैली के हिसाब से डाइवर्स होती है. आज एक चुनाव, एक राष्ट्र, एक भाषा और एक सुप्रीम लीडर के नाम पर इस लोकतंत्र और इस की डाइवर्सिटी को खत्म कर लोकतंत्र की जगह एकतंत्र लाने का षड्यंत्र रचा जा रहा है. आरएसएस की मानसिकता तो यही है जिस में विरोधी विचारों के लिए कोई जगह नहीं है. सरकार से असहमत लोगों को सुप्रीम अदालत में कौकरोच कहा गया. शिक्षा मंत्री के खिलाफ प्रोटैस्ट कर रहे लोगों को आतंकवादी बताया गया और हर उस आवाज को कुचलने की कोशिश की गई जो सरकार से सवाल पूछने की हिम्मत करती है. क्या वन नैशन, वन इलैक्शन और वन सुप्रीम लीडर वाली यह मानसिकता लोकतंत्र के नाम पर एकतंत्र लाने की साजिश नहीं है?
भारत की मिट्टी में ही डाइवर्सिटी समाई हुई है. यहां 20 कोस में संस्कृति बदल जाती है. भारत में सैकड़ों बोलियां बोली जाती हैं. 780 से ज्यादा भाषाएं हैं. भाषा, कल्चर और परंपराओं की इसी विविधता के कारण दुनिया में भारत की एक अलग पहचान है लेकिन पिछले 12 सालों में एक चुनाव, एक राष्ट्र, एक भाषा और एक सुप्रीम लीडर के नाम पर इस विविधता को कुचल कर एकतंत्र लाने की कोशिशें हो रही हैं. सीजेपी का प्रोटैस्ट असल में इसी मानसिकता के खिलाफ एक जनआक्रोश था.
आरएसएस के हिंदू राष्ट्र में अल्पसंख्यकों और विरोधियों के लिए जगह नहीं है. भारत में हिंदू 80 प्रतिशत हैं लेकिन सच्चाई यह है कि हिंदुओं की इस आबादी में हिंदू कोई नहीं है. हिंदुओं की यह बहुसंख्यक आबादी असल में आज भी वर्णव्यवस्था के हिसाब से बंटी हुई है. 10 फीसदी के आसपास ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य हैं.
इन वर्णों के अलावा लगभग
54 फीसदी आबादी शूद्रों की है जिन्हें संवैधानिक भाषा में ओबीसी कहा गया गया है. ओबीसी के बाद अछूतों यानी एससी की आबादी लगभग 16 प्रतिशत है और एसटी यानी आदिवासियों की आबादी
8 फीसदी के आसपास है. मुसलिम 14 और ईसाई 2 प्रतिशत हैं. बाकी के 4 प्रतिशत में बौद्ध, सिख, जैन, पारसी व लिंगायत हैं.
सच बात तो यह है कि भारत की इस विविधता में ढेरों समस्याएं हैं. जातियों के बीच की विभाजनरेखा बेहद मजबूत है. इसी विभाजन को खत्म करने के लिए संविधान में विविधता में एकता की बात की गई है. लेकिन बीजेपी को यह पसंद नहीं. आरएसएस के लिए यह हिंदुओं का देश है. ओबीसी, एससी, एसटी, बौद्ध, सिख, जैन, पारसी और लिंगायत को आरएसएस हिंदू समाज का हिस्सा समझता है.
इस अवधारणा की सब से बड़ी समस्या यह है कि आरएसएस 10 फीसदी द्विजों के अलावा बाकी की तमाम जातियों को हिंदू पहचान से जोड़ कर उन्हें सिर्फ वोटबैंक बनाए रखना चाहता है. यह आरएसएस की सब से खतरनाक चाल है. वैसे देखा जाए तो इन 10 फीसदी द्विजों की औरतों की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक स्थिति पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों से ज्यादा बेहतर नहीं है.
वर्ष 2014 में सत्ता में आते ही बीजेपी ने सब से बड़ा हमला भारत की विविधता में एकता पर ही किया. सांप्रदायिकता की राजनीति शुरू हुई. आम जनता से जुड़े तमाम जरूरी मुद्दे हाशिए पर धकेल दिए गए.
बहुसंख्यक वोटों के ध्रुवीकरण के लिए अल्पसंख्यकों को निशाने पर लिया गया. इन के खिलाफ नैरेटिव गढ़ने के लिए तमाम तरह के हथकंडे अपनाए गए. मीडिया को कंट्रोल किया गया और तमाम लोकतांत्रिक संस्थाओं में अपने लोगों को फिट कर उन्हें विरोधियों के खिलाफ हथियार की तरह इस्तेमाल किया गया. पूजापंथी मेनस्ट्रीम मीडिया, सोशल मीडिया और नेताओं के बयानों के जरिए दिनरात झूठे नैरेटिव फैलाए गए. जिस ने आवाज उठाई उस का मुंह बंद कर दिया गया. मेनस्ट्रीम मीडिया के मालिक द्विज पूजावादी ही हैं जो आरएसएस की मानसिकता का पूरा समर्थन करते हैं.
डैमोक्रेसी की असली
ताकत जनता
लोकतंत्र के संविधानवाद की सब से बड़ी शक्ति उस की संस्थाएं ही होती हैं. चुनाव आयोग, न्यायपालिका, संसद, सीएजी, सूचना आयोग, यूनिवर्सिटीज, मीडिया और स्वतंत्र जांच एजेंसियां निष्पक्ष रहें और बिना किसी दबाव और भेदभाव के काम करें तो लोकतंत्र जिंदा रहता है. डैमोक्रेसी के लिए सब से जरूरी बात यह होती है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता का भरोसा बना रहे.
इसी कारण जब भी सत्ता किसी डैमोक्रेटिक बौडी को काबू में लेती है तो इसे स्वतंत्र बनाए रखने की जिम्मेदारी विपक्ष, मीडिया और नागरिक समाज की होती है.
किसी भी लोकतंत्र की सब से बड़ी ताकत स्वतंत्र संस्थाएं होती हैं. सरकारें चुनाव जीत कर आती हैं और 5 साल बाद बदल भी जाती हैं लेकिन संविधान के अनुसार चलने वाली संस्थाएं अपना काम करती रहती हैं. अगर ये संस्थाएं मजबूत रहें तो कोई भी सरकार निरंकुश नहीं हो सकती.
डा. भीमराव अंबेडकर, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल और संविधान सभा के सदस्यों ने यह समझ लिया था कि कोई भी डैमोक्रेसी केवल चुनाव से नहीं चल सकती, इसलिए उन्होंने न्यायपालिका, चुनाव आयोग, सीएजी, यूपीएससी, संसद और स्वतंत्र प्रैस जैसी स्वतंत्र संस्थाएं बनाईं. इन संस्थाओं के किसी सरकार का गुलाम बनने का डर संविधान सभा के लोगों को भी था, इसलिए उन्होंने संविधान में यह बंदोबस्त किया कि भविष्य में अगर कोई सरकार बहुत ताकतवर हो जाए तब भी ये संस्थाएं संविधान की रक्षा कर सकें. यही कारण है कि संविधान में सैपरेशन औफ पावर्स की व्यवस्था की गई लेकिन पूजावादी तबके ने संविधान की हर व्यवस्था को कमजोर करने का तोड़ ढूंढ लिया.
वैसे, भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में संस्थाओं को हाईजैक करने का खेल कोई नई बात भी नहीं है. 1975 में इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लागू किया था. उस समय प्रैस पर सैंसरशिप लगी, विपक्षी नेताओं को जेल भेजा गया और नागरिक अधिकारों पर प्रतिबंध लगाए गए. इंदिरा गांधी ने भी खुद को अवतार समझ लिया था और वे भूल गई थीं कि लोकतंत्र में तंत्र से पहले लोक आता है. लोकतंत्र को पंगु बना कर एकतंत्र की सत्ता ज्यादा दिनों तक मुमकिन ही नहीं है. यही वजह है की जनता ने 1977 के चुनाव में इंदिरा गांधी को बुरी तरह हरा दिया.
एकतंत्र के लिए
लोकतंत्र की बली
बीजेपी और पूजावादी आरएसएस का प्लान एक राष्ट्र, एक चुनाव, एक भाषा, एक नेता का एकतंत्र बनाना है ताकि लोकतंत्र की जगह एकतंत्र हो जिस में अलग राय की कोई जगह न हो. जो दुर्वासा से सवाल पूछेगा वह देशद्रोही, धर्मद्रोही साबित कर दिया जाएगा.
10 साल में रेल, बीएसएनएल, एयरपोर्ट, बंदरगाह, एलआईसी सब बेच दिए गए. आगे भी 6 लाख करोड़ रुपए की सरकारी संपत्ति बेचने का टारगेट है. दूसरी तरफ 80 करोड़ मूर्ख लोगों को
5 किलोग्राम राशन दे कर मंदिर की ओर भेजा जा रहा है. विश्व भुखमरी सूचकांक में 105वें नंबर पर पहुंच चुके देश की पूजावादी ऊंची जाति की मीडिया देश की जनता को दिनरात यह कह कर बरगला रही है कि दुनियाभर में देश का डंका बज रहा है.
लोकतंत्र जनता की आवाज सुनता है लेकिन पूजावादी विरोधी विचारों को नेस्तनाबूद करने की मानसिकता रखते हैं. ईडी और सीबीआई जैसी संस्थाओं का इस्तेमाल विरोधियों को कुचलने के लिए ही किया जा रहा है. यही कारण है कि
95 प्रतिशत केस सिर्फ विपक्षी नेताओं पर हैं. राज्य के अधिकार छीने जा रहे हैं.
जो बोलेगा उसे टुकड़ेटुकड़े गैंग कहा जाएगा. 10 साल में हर मुद्दे को हिंदूमुसलिम बना दिया गया. महंगाई, बेरोजगारी, पेपर लीक के सवाल का जवाब लव जिहाद, मसजिद के नीचे मंदिर और धर्मांतरण से दिया जाने लगा. शिक्षा का भगवाकरण, इतिहास बदलने की सनक, विज्ञान की जगह पौराणिकता लाने की जिद, ये सब पूजावादी आरएसएस के 100 साल पुराने एजेंडे का हिस्सा हैं.
जनता सत्ता को बस श्रद्धा की नजर से देखे और जहां वशिष्ठ, विश्वामित्र, दुर्वासा, मनु और चाणक्य की चले.
लोकतंत्र के हत्यारे ही
एकतंत्र चाहते हैं
भारत के लोकतंत्र की खूबसूरती यह रही है कि मंत्री अपनेअपने मंत्रालय के लिए जवाबदेह रहें. रेल मंत्री रेल के लिए, शिक्षा मंत्री शिक्षा के लिए, स्वास्थ्य मंत्री स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए और गृह मंत्री कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी संभाले. 2014 के बाद इस व्यवस्था में बदलाव शुरू हुआ. अलगअलग मंत्रालयों की जवाबदेही कमजोर पड़ने लगी और हर मंत्री सिर्फ प्रधानमंत्री कार्यालय में हाजिरी लगाने तक सीमित हो कर रह गया. जिम्मेदारी खत्म हो गई, सिर्फ मंत्रालय बाकी बचे. इन अलगअलग मंत्रालयों की कमान ऐसे लोगों के हाथों में दी गई जिन्हें संबंधित मंत्रालय का न तो कोई तजरबा था और न ही वे इस के लायक थे.
चुनाव आयोग ने खड़ी कर दी एकतंत्र की बुनियाद
चुनाव आयोग को संविधान का सब से मजबूत स्तंभ माना जाता है लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने सत्ताधारी बीजेपी के एजेंट की तरह काम किया है.
एसआईआर की आड़ में बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम गलत तरीके से काटे गए और नागरिकों से उन के वोटिंग राइट छीन लिए गए. एसआईआर का असल मकसद सत्ताधारी पार्टी को फायदा पहुंचाना था. जब चुनाव आयोग खुद कठघरे में खड़ा हो जाए तो चुनाव की विश्वसनीयता खत्म हो जाती है. ज्ञानेश कुमार ने गैरसंवैधानिक आचरण किए. आयोग ने बीजेपी के पक्ष में फैसले लिए और विपक्ष की शिकायतों पर आंख बंद कर ली. जब 193 सांसद भी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पास नहीं करा पाए तो आम जनता को क्या न्याय मिलेगा? चुनाव आयोग अब स्वतंत्र संस्था नहीं बल्कि सरकार के इशारे पर चलने वाला विभाग बन गया है.
शिक्षा व्यवस्था को दीमक की तरह चट कर गए धर्मेंद्र
अब तो धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया है लेकिन सच यह है कि उन्हें शिक्षा मंत्री का पद सिर्फ पार्टी की चापलूसी के लिए मिला था. शिक्षा मंत्रालय को बजट तो मिला लेकिन उसे बरबाद करने में धर्मेंद्र प्रधान ने कोई कसर नहीं छोड़ी. 2026-27 में शिक्षा मंत्रालय को 1.39 लाख करोड़ रुपए का बजट दिया गया जो पिछले सालों से बढ़ा है.
स्कूल शिक्षा के लिए 83,562 करोड़ और उच्च शिक्षा के लिए 55,727 करोड़ रुपए आवंटित किए गए. इस भारीभरकम बजट के बावजूद नीट और सीबीएसई जैसे बड़े एग्जाम में पेपर लीक का सिलसिला जारी रहा. 90 से ज्यादा पेपर लीक हुए, लाखों छात्रों का भविष्य बरबाद हुआ. बजट बढ़ने के बावजूद परीक्षा प्रणाली फेल हो गई क्योंकि मंत्रालय में न तो जवाबदेही है और न ही कोई सुधार.
सड़कों पर उतरे छात्रों की आवाज को धर्मेंद्र प्रधान ने आतंकवादियों से जोड़ दिया. उन्होंने छात्रों के प्रदर्शन को आतंकवाद फैलाने वाला बताया और सीजेपी को टैररिस्ट की बी टीम करार दिया. नीट पेपर लीक के बाद 20 से ज्यादा छात्रों ने आत्महत्या कर ली लेकिन शिक्षा मंत्री छात्रों को ही गलत बताने लगे.
मोदी सरकार के 12 सालों में शिक्षा का हश्र यही रहा है. इस लापरवाही ने पूरे देश की शिक्षा व्यवस्था को लील लिया. देश की प्रगति का असली पैमाना मंदिर या इवैंटबाजी नहीं हैं. असली पैमाना एजुकेशन सिस्टम होता है जिसे पूरी तरह चौपट कर दिया गया है.
एनटीए की जरूरत ही क्यों
एनटीए आज खुद घोटालों का अड्डा बन गई है. नीट पेपर लीक, जेईई में गड़बड़ी, यूजीसी-नेट रद्द होना ये सब घटनाएं हर साल का रूटीन बन गई हैं. सीबीएसई भी आंसर शीट स्कैनिंग घोटाले में फंसा है. लाखों छात्रों का भविष्य बरबाद हो रहा है. जेईई मेन, नीट यूजी, सीयूईटी, यूजीसी नेट जैसी करीब 15 बड़ी परीक्षाएं एनटीए करवाती है. हर साल एक करोड़ से ज्यादा छात्र इन में बैठते हैं. नीट यूजी में ही तकरीबन 22 लाख स्टूडैंट्स शामिल होते हैं. इतने बड़े पैमाने पर एक एजेंसी को जिम्मेदारी सौंपने की तुक क्या है?
2024-26 में नीट पेपर लीक का मामला सीबीआई तक पहुंचा, फिर भी मंत्रालय चुप रहा. ये सारे भ्रष्टाचार और लीकेज शिक्षा मंत्रालय की लापरवाही के कारण हुए और शिक्षा मंत्रालय की कमान धर्मेंद्र प्रधान के हाथों में थी, इसलिए सारे लीकेज का ठीकरा धर्मेंद्र प्रधान के सिर ही फूटा.
एनटीए यानी नैशनल टैस्टिंग एजेंसी 2018 में बनी. सरकार ने कहा था एक एजेंसी सारी बड़ी परीक्षाएं लेगी तो पेपर लीक नहीं होंगे, नकल रुकेगी. मकसद था एक राष्ट्र, एक परीक्षा. लेकिन 8 साल में एनटीए खुद सब से बड़ा सवाल बन गई. एनटीए हर साल 12 से ज्यादा बड़ी परीक्षाएं कराती है, एमबीबीएस-बीडीएस के लिए नीट-यूजी, इंजीनियरिंग के लिए जेईई मेंस-जेईई एडवांस, यूनिवर्सिटी एडमिशन के लिए सीयूईटी-यूजी-पीजी, प्रोफैसरशिप के लिए यूजीसी-नेट. इस के अलावा सीएमएटी, जीएमएटी, आईसीएआर जैसे एग्जाम भी यह कंडक्ट करवाती है. मतलब स्कूल से कालेज, कालेज से नौकरी तक का हर स्टैप एनटीए के हाथ में सौंप दिया गया है.
सिर्फ नीट एग्जाम में ही 20 लाख से ज्यादा युवा बैठते हैं. जेईई मेन का एग्जाम हर साल 14 लाख युवा देते हैं. सीयूईटी-यूजी-पीजी में 13 लाख और नीट-यूजी में 9 लाख युवा हर साल बैठते हैं. कुल मिला कर हर साल एक करोड़ से ज्यादा स्टूडैंट्स एनटीए के भरोसे अपनी जिंदगी दांव पर लगाते हैं. पहले सीबीएसई 12वीं के नंबर से एमबीबीएस, जेईई के लिए खुद अपने पेपर कराता था. यूजीसी-नेंट और यूजीसी भी खुद कराता था. तब सरकार का तर्क यह था कि अलगअलग एग्जाम के लिए अलगअलग एजेंसी होंगी तो पेपर लीक का खतरा बना रहेगा, इसलिए सरकार ने सब को एक जगह कर दिया. लेकिन इस से समस्या खत्म होने के बजाय और ज्यादा बढ़ गई.
अब पेपर लीक का ग्राफ बड़ा हो गया. नीट का एक पेपर लीक होने से एकसाथ 20 लाख बच्चों का भविष्य दांव पर लग गया. यही हाल दूसरे एग्जामों का भी हुआ.
एक बच्चा 12 साल सीबीएसई या स्टेट बोर्ड से पढ़ता है. उस के प्रिंसिपल, टीचर रोज टैस्ट लेते हैं. 12वीं के बाद अचानक एनटीए आ कर कहती है वो सब बेकार है. अब एडमिशन सीयूईटी से होगा. यानी, 12 साल की मेहनत को एक 3 घंटे के पेपर पर तोल दिया. मानो, सारे स्कूल प्रिंसिपल बेईमान और निकम्मे हों. शिक्षा मंत्रालय ने खुद स्कूल सिस्टम को नकारा साबित कर दिया.
सरकार कहती है, एक चुनाव से देश का खर्च बचेगा, इस का जिम्मा ज्ञानेश कुमार को दे दिया. इसी तर्ज पर एक एग्जाम की नौटंकी शुरू की गई, जिम्मेदारी धर्मेंद्र प्रधान को दी गई जिन्होंने एनटीए को एग्जाम करवाने का ठेकेदार बना दिया और दोनों ने मिल कर लोकतंत्र और शिक्षा को चौपट कर दिया.
एनटीए की लापरवाही के कारण लाखों युवाओं का भविष्य बरबाद हुआ, युवा तनाव में गए और हर साल सैकड़ों युवा आत्महत्या करने को मजबूर हुए. एनटीए का सब से बड़ा फायदा कोचिंग माफिया को मिला. जहां तक एक एग्जाम की बात है, वह भी धोखा ही साबित हुआ क्योंकि सीयूईटी के बाद भी हर यूनिवर्सिटी की कटऔफ अलग जाती है. नीट के बाद भी स्टेट कोटा अलग होता है तो एक एग्जाम का फायदा क्या हुआ? यह सिर्फ सैंट्रलाइजेशन है, सुधार नहीं.
2024 में नीट का पेपर लीक हुआ. 67 कैंडिडेटों को 720 में 720 मिले. ग्रेस मार्क का खेल हुआ. तब भी छात्र सड़क पर उतरे थे. सीबीआई जांच भी हुई लेकिन हैरानी की बात यह कि किसी को सजा नहीं हुई. उसी साल यूजीसी नेट का पेपर लीक होने से परीक्षा रद्द करनी पड़ी. 9 लाख युवाओं का साल बरबाद हुआ.
शिक्षा मंत्रालय एनटीए का मालिक है. मंत्रालय ने बजट बढ़ाने की जगह एजेंसी को ठेका दे दिया. सीबीएसई ने 12वीं का सिस्टम कमजोर किया और सारा बोझ एनटीए पर डाल दिया जो हर काम का ठेका हर परीक्षा से पहले देता है और ठेकेदार कोई व्यवसायी होता है, शिक्षा से जुड़ी संस्था नहीं.
एक एग्जाम का फौर्म 1,700 से 2,000 रुपए का पड़ता है. गरीब बच्चा 3 से 4 एग्जाम नहीं दे पाता. इतने खर्च के बावजूद कई बार तकनीकी गड़बड़ी के कारण एग्जाम की डेट बढ़ जाती है या सैंटर बहुत दूर रखा जाता है. एक पेपर लीक होने पर पूरा साल बरबाद हो जाता है. इसी वजह से कोचिंग माफिया 2 लाख रुपए फीस ले रहे हैं. एनटीए ने बराबरी की जगह कंपीटिशन को बढ़ावा दे कर एग्जाम को लौटरी का खतरनाक खेल बना दिया है.
एनटीए ने साबित कर दिया कि सैंट्रलाइजेशन होने से जवाबदेही खत्म हो जाती है. एक करोड़ छात्रों का भविष्य एक संस्थान, एक वैबसाइट और एक सर्वर के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता. पुराने सिस्टम में दिक्कत थी तो उसे सुधारा जाना चाहिए था. सीबीएसई, राज्य बोर्ड, यूनिवर्सिटी अपने स्तर पर परीक्षा क्यों नहीं ले सकते? जब तक एनटीए रहेगी, छात्रों का भविष्य लीक होता रहेगा.
पुराने सिस्टम में सीबीएसई और यूनिवर्सिटीज अपनी परीक्षाएं खुद करवाती थीं. उस में भी कुछ कमियां थीं लेकिन एक ही जगह पर सारा सिस्टम केंद्रित नहीं था. अब एनटीए के आने से एक गड़बड़ी पूरे देश के बच्चों का भविष्य खराब कर देती है.
एक राष्ट्र एक चुनाव की तरह एक राष्ट्र एक एग्जाम की बात भी खोखली साबित हुई. जब एक ही एजेंसी पर सबकुछ लाद दिया जाता है तो छोटीछोटी गलती भी बड़ी आफत बन जाती है. एनटीए को भंग करने की मांग इसलिए जायज है क्योंकि इस में बारबार पेपर लीक, आंसर की गड़बड़ी और रिजल्ट में धांधली चल रही हैं. नीट 2024 के पेपर बिहार और झारखंड में 30-50 लाख रुपए में बिके. सीबीआई ने गिरफ्तारियां कीं लेकिन तब शिक्षा मंत्रालय ने एग्जाम को रद्द नहीं किया. लाखों ईमानदार छात्रों का नुकसान हुआ.
धर्मेंद्र प्रधान ने एनटीए को आउटसोर्सिंग और प्राइवेट कंपनियों के भरोसे छोड़ रखा था. लाखों छात्र सालभर मेहनत करते हैं. नीट लीक के बाद कई छात्रों ने तनाव में आत्महत्या कर ली. फिर भी शिक्षा मंत्री जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं. सीबीएसई और एनटीए दोनों ही धर्मेंद्र प्रधान के अधीन थे, इसलिए धर्मेंद्र प्रधान ही सारे भ्रष्टाचार के जिम्मेदार थे.
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे
से आगे की बात
आरएसएस का सपना रामराज्य का है. रामराज्य में जनता नागरिक नहीं, सिर्फ भीड़ होती है. ऐसी भीड़ जो राजा के आगे हाथ जोड़ कर खड़ी हो, सवाल न पूछे. सत्ता के केंद्र में एक राजा और उस के चारों तरफ विश्वामित्र-वशिष्ठ-दुर्वासा जैसे सलाहकार हों. 2014 के बाद बीजेपी सरकार ने इसी परिकल्पना को लागू करना शुरू किया. नाम लोकतंत्र का, काम एकतंत्र का. नारा सब का साथ लेकिन सिस्टम एक का राज. सभी मंत्री मंदिरों के चक्कर ज्यादा काटते, अपने मंत्रालयों से जुड़ी संस्थाओं के कम.
2014 के बाद डाइवर्सिटी को खत्म कर के एक ऐसा देश बनाया जा रहा है जिस में दलित, आदिवासी, पिछड़े और अल्पसंख्यक के अधिकारों को कुचल कर उन्हें बेचारा बना दिया जाए. यही ‘राम राज्य’ वाला मौडल है. राजा गलती नहीं करता. राजा से सवाल न हो. अगर कोई सवाल करे तो उसे शंबूक समझ कर मार दो. सीजेपी का प्रोटैस्ट असल में इसी एकतंत्र की मानसिकता के खिलाफ था.
अब सवाल सिर्फ पेपर लीक का नहीं रह गया है. असल मुद्दा जवाबदेही का है. तमाम लोकतांत्रिक संस्थाएं अपनी क्रैडिबिलिटी खो चुकी हैं. जमीर, इंसानियत और भरोसा रुपए से भी तेजी से गिर रहा है.
जब परीक्षा व्यवस्था से युवाओं का भविष्य संकट में पड़ जाए या किसी विभाग की गंभीर लापरवाही सामने आए तब लोकतांत्रिक परंपरा तो यही कहती है कि जिम्मेदारी तय हो लेकिन आज स्थिति ऐसी बन गई है कि इस्तीफा देना तो दूर, गलती स्वीकार करना भी सत्ता की कमजोरी समझा जाने लगा है. चाहे मामला पेपर लीक का हो या पहलगाम में 22 अप्रैल, 2025 को दिन में आतंकवादियों द्वारा 26 लोगों की हत्या का.
लोकतंत्र का नया सवेरा
सीजेपी प्रोटैस्ट पेपर लीक से शुरू हुआ और यह हर उस शख्स की आवाज बन गया जिसे पिछले 12 वर्षों के दौरान ठगा गया. इस प्रोटैस्ट में पेपर लीक से हताश स्टूडैंट्स ही नहीं बल्कि नोटबंदी की लाइन में मारे गए लोगों के बच्चे, जीएसटी में बरबाद हुए व्यापारियों के परिजन, कोरोना में औक्सीजन की कमी से जूझे लोग, पुलिस के डंडे से पीटे गए पहलवान, मणिपुर की आग में जलाए गए घरों की औरतें, बुलडोजर से कुचली गई अवाम और जातिवादी व्यवस्था में सताए गए दलित सब शामिल थे.
किसान, छात्र, दलित, पिछड़ा, महिला और मजदूर सब का दर्द एक था. जब दरवाजे बंद कर दिए जाएं तो खिड़की तोड़नी पड़ती है और जब खिड़की भी बंद हो तो सड़क ही बचती है. सीजेपी का आंदोलन सिर्फ एक मुद्दे तक सीमित नहीं रह गया था. यह लोकतंत्र बनाम एकतंत्र की लड़ाई बन गया था.
यह ऐतिहासिक आंदोलन लोकतंत्र का नया सवेरा ही माना जाएगा. बेशक इस आंदोलन के बाद सबकुछ बदल नहीं जाएगा लेकिन इस प्रोटैस्ट से तानाशाही की ओर तेजी से बढ़ती सरकार को बड़ा झटका जरूर लगा है. अब जवाबदेही शुरू होगी और सत्ता में बैठे लोकतंत्र के दुश्मनों के अंदर डर जरूर पैदा होगा. इसी डर की जरूरत थी. जनता ने यह कर दिखाया. सारे नैरेटिव धरे के धरे रह गए. धर्म की राजनीति की हांडी फूट गई. इस प्रोटैस्ट ने यह भी साबित किया है कि जेनजी को बरगलाना आसान नहीं है. यह वह पीढ़ी है जो टीआरपी के खेल से बाहर है, इसलिए इस पर मेनस्ट्रीम मीडिया का प्रोपगेंडा असर ही नहीं करता.
जून और जुलाई 2026 में दिल्ली की सड़कों से ले कर देश के कई शहरों तक जो दृश्य देखने को मिले उस से यह साबित जरूर हुआ कि लोकतंत्र में अंतिम ताकत जनता के पास ही रहती है. लोकतंत्र में विरोध का अधिकार मौलिक है. सरकार की जिम्मेदारी है कि वह सुने, जांच करे और सुधार करे. हर असहमति को देशद्रोह बताने या हर प्रदर्शन को कुचलने वाली सरकार कभी लोकतांत्रिक नहीं हो सकती. बीजेपी सरकार की विचारधारा उस की नीतियों और व्यवहार में साफ दिखाई देती है. यह पूजावादी आरएसएस माइंडसैट है जिस में संविधानवादी डैमोक्रेसी के लिए कोई जगह ही नहीं है. Democracy in India





