Protest Viral Face: प्रोटेस्ट की भीड़ में हर बार एक पैटर्न दोहराया जाता है. हजारों लोग होते हैं, नारे लगते हैं और इन सब के बीच कैमरा और सोशल मीडिया की नजर अचानक 2-3 चेहरों पर टिक जाती है. वाइरल इकोनॉमी इन्हें हाथों हाथ लेती है और कल तक गुमनाम चेहरे अचानक सुर्खियों में आ जाते हैं. भीड़ से निकल कर कोई न्यूज़ स्टूडियो तक पहुँचता है और कोई अचानक हीरो बन जाता है. रातों रात दुनिया बदल जाती है. जंतर मंतर प्रोटेस्ट ने अभी तीन चेहरे दिए हैं जो इस वक़्त शोशल मीडिया पर छाए हुए हैं. अभिनव, विसट और इरफान. ऐसे चेहरे सिर्फ प्रोटेस्ट में ही नहीं मिलते, कुम्भ की भीड़ में और कई बार सड़क पर भी मिल जाते हैं लेकिन नतीजा क्या होता है?
एक 10 सेकंड का क्लिप जिसमें कोई पुलिस के सामने खड़ा है या भीड़ में खड़ा इमोशनल भाषण दे रहा है या सामाजिक इशू पर पंच लाइन बोल रहा है. बस इतना काफी है. अगले 48 घंटे में वही चेहरा इंस्टाग्राम रील, यूट्यूब शॉर्ट्स, ट्विटर ट्रेंड और न्यूज चैनल का थंबनेल बन जाता है. देखते ही देखते उसे हीरो का तमगा मिल जाता है लेकिन ये सवाल कोई नहीं पूछता कि ये रातोरात हीरो बनने वाले चेहरे 2 महीने बाद ही गायब क्यों हो जाते हैं?
इसका रहस्य इमोशन, एल्गोरिदम और हमारी सामूहिक याददाश्त की कमी में छिपा है. प्रोटेस्ट का माहौल पहले से हाई वोल्टेज का होता है. ऐसे में दिमाग 8 सेकंड से कम के वीडियो को सबसे ज्यादा रिटेन करता है. एक आंसू, एक गुस्सा, एक नारा सीधा दिमाग के उस हिस्से पर वार करता है जो लॉजिक नहीं इमोशन से चलता है. ऊपर से मीडिया को भी पूरे आंदोलन को समझाने के लिए एक सिंबल चाहिए होता है. हजारों की भीड़ को एक चेहरे में पैक करना आसान है इसलिए नैरेटिव फिट हो जाता है. TRP मिलती है, व्यूज मिलते हैं और कोई चेहरा स्क्रीन पर अचानक चमक उठता है लेकिन इंगेजमेंट फीका पड़ते ही 72 घंटे बाद एल्गोरिदम अगला चेहरा ढूंढने निकल पड़ता है.
वायरल होते ही बायो बदल जाता है.
किसी प्रोटेस्ट में वाइरल होने के साथ ही नाम के आगे एक्टिविस्ट या स्पीकर लिखा जाने लगता है. फिर शुरू होता है रील का सिलसिला. मुद्दे की बात 2 वीडियो में खत्म, उसके बाद लाइफस्टाइल, ब्रांड कोलैब, पेड प्रमोशन. मुद्दा पीछे छूट जाता है, चेहरा आगे आ जाता है. बात सिर्फ प्रोटेस्ट में मिले चेहरों की नहीं है. रातों रात वाइरल हुए हर शोशल मीडिया स्टार के साथ यही इको सिस्टम काम करता है लेकिन इनमें ज्यादातर के लिए वायरल होने के बाद का रास्ता बेहद खोखला होता है.
इसका सबसे बड़ा सबूत कच्चा बादाम वाले भुबन बाधकर हैं. 2022 में एक गाने पर बना उनका वीडियो इतना वाइरल हुआ कि लगभग 4 करोड़ से ज्यादा बार देखा गया. भुवन के लिए अलग अलग ब्रांड्स लाइन में लग गए. नाम, शोहरत और मौके मिलने लगे लेकिन यह सब तभी तक चला जब तक उनका वाइरल वीडियो चलता रहा. एलगोरिदम मौके जरूर देता है लेकिन किसी को ज्यादा समय नहीं देता इसलिए अगले 6 महीने के अंदर फॉलोअर 2 करोड़ से घटकर 50 लाख हो गए और धीरे धीरे सब खत्म हो गया. आज भुवन अपने उसी गांव में छोटे-मोटे इवेंट कर रहे हैं.
दूसरा नाम रानू मंडल का है. रेलवे स्टेशन पर गाना गाते हुए वायरल हुईं थीं. हिमेश रेशमिया ने फिल्म में मौका दिया. 1 गाना चला फिर ट्रोलिंग और विवाद शुरू हुए. आज वो फिर संघर्ष कर रही हैं. कुंभ 2025 की मोनालिसा मोनाभद्र जैसी लड़कियाँ सिर्फ अपवाद होती हैँ. माला बेचने वाली मोनालिसा की आंखें वायरल हुईं और उन्हें कई बड़े फोटोशूट के साथ फ़िल्म भी मिल गई. मोनालिसा 1000 में से 1 हैं. बाकी तो नियम यही है कि इंटरनेट की मेमोरी 14 दिन की होती है. उसके बाद एल्गोरिदम स्क्रॉल करके आगे बढ़ जाता है.
पेव रिसर्च 2023 के डेटा के मुताबिक किसी एक घटना से वायरल हुए लोगों में से 87 फीसदी लोग 90 दिन के अंदर अपनी एंगेजमेंट का 80 प्रतिशत हिस्सा खो देते हैं यानी बूम ज्यादा से ज्यादा 6 महीने तक टिकता है और उसके बाद सिर्फ सन्नाटा ही मिलता है.
एक्टिविज़्म से नेता बने लोग
एक्टिविस्ट से नेता बनने की कोशिश में कई लोग वाइरल हो जाते हैँ. यह सबसे कठिन रास्ता है क्योंकि कई बार शोशल एक्टिविज़्म के चक्कर में FIR झेलना पड़ जाता है. 2019 के CAA-NRC प्रोटेस्ट में कई छात्र चेहरे रातोरात वायरल हुए. भाषण, डिबेट, इंटरव्यू सब मिला लेकिन 2 साल बाद उनमें से गिनती के लोग ही टिक पाए, बाकी सब कोर्ट के चक्कर में या नौकरी की जरूरत में उलझ गए. एक्टिविज़्म वाले रास्ते से वायरल होने वाले को कोई इंस्टिट्यूशनल सपोर्ट नहीं मिलता, न पार्टी फंडिंग और न ही लीगल सपोर्ट इसलिए 100 में से 3-4 लोग ही इस रास्ते से आगे बढ़ पाते हैँ बाकी थक कर किनारे हो जाते हैं.
हार्वर्ड के शोरेंस्टीन सेंटर की एक स्टडी कहती है कि वायरल एक्टिविज्म से जमीन पर रिजल्ट सिर्फ 2 फीसदी लोग ही ला पाते हैँ. बाकी 98 प्रतिशत सिर्फ ऑनलाइन शोर तक सिमित होकर रह जाते हैँ. ज्यादातर मामलों में तो वाइरल शख्श का नुकसान ही होता है. उसके पास न कोई लीगल काउंसिल होती है, न मेंटल हेल्थ सपोर्ट और न ही करियर का प्लान. कल तक जो लोग उसे क्रांतिकारी कह रहे थे वो केस हो जाने पर फोन नहीं उठाते. धमकियां अकेले झेलनी पड़ती हैं. मीडिया तब तक साथ होता है जब तक वीडियो ट्रेंड कर रहा होता है. सोशल मीडिया आपको मंच दे सकता है लेकिन भविष्य नहीं दे सकता. भविष्य तब बनता है जब कैमरा हटने के बाद भी आप किसी स्किल में रोज 4 घंटे मेहनत कर रहे हों. वायरल होना एक्सीडेंट है और टिके रहना मेहनत का परिणाम है.
21वीं सदी का नया ठेकेदारी सिस्टम
वायरल फेम असल में 21वीं सदी का नया ठेकेदारी सिस्टम है. पहले ठेकेदार मजदूर से काम करवाकर उसे दिन के 500 रुपये देता था. आज प्लेटफॉर्म आपका 10 सेकंड का गुस्सा, आंसू या इमोशन लेकर उससे करोड़ों का विज्ञापन कमाता है और आपको बदले में फेम दे देता है. यह फेम नोट नहीं है जिसे आप बैंक में जमा कर सकें. यह सिर्फ लाइक और कमेंट की स्याही है जो 2 हफ्ते में सूख जाती है. कंपनी को फर्क नहीं पड़ता कि अभिनव, विसट या इरफान 3 महीने बाद क्या खाएंगे? उसे तो हर बार नया चेहरा चाहिए इसलिए ये पूरी इकोनॉमी पूरी तरह खोखली है. इसमें उत्पादन कुछ नहीं है सिर्फ इमोशन को काटकर, पैक करके बेचा जाता है और जब माल पुराना हो जाता है तो उसे कचरे की तरह फेंक दिया जाता है.
एक असली आंदोलन सालों तक चलता है. उसमें कोर्ट केस लड़ा जाता है, पर्चे छपते हैं, गांव-गांव मीटिंग होती है. वहाँ कोई एक चेहरा नहीं, मुद्दा आगे रहता है लेकिन वायरल फेम वाले आंदोलन में उल्टा होता है. यहां मुद्दा 10 सेकंड में खत्म और चेहरा सिर्फ 10 दिन तक चलता है. JNU, CAA या किसान आंदोलन को देख लीजिए. जो लोग सबसे ज्यादा TV पर चमके थे उनमें से ज्यादातर गायब हैँ. उनमें से कुछ किसी पॉलिटिकल पार्टी के प्रवक्ता हैं या फिर ब्रांड प्रमोशन कर रहे हैं. जमीन पर जो 2-4 लोग बचे हैं वो आज भी केस में उलझें हैँ और वकीलों के चक्कर काट रहे हैं. मतलब साफ है. एल्गोरिदम आपको क्रांति नहीं देगा. वो आपको कंटेंट देगा और कंटेंट का सेल्फ लाइफ सिर्फ कुछ दिन ही होता है.
वायरल होना तुक्का है और टिके रहना टैलेंट है
आज हर 19-20 साल का लड़का सोचता है बस एक वीडियो वायरल हो जाए, जिंदगी सेट हो जाएगी लेकिन वो ये नहीं देखता कि वायरल होने के बाद क्या? आपके पास स्किल नहीं, डिग्री नहीं, बचत नहीं, लीगल टीम नहीं और एक दिन अचानक FIR हो जाये या ट्रोलिंग शुरू हो जाए तो संभालने वाला कोई नहीं. वायरल फेम आपको 15 मिनट की शोहरत जरूर देता है साथ ही 15 साल की भूख भी दे जाता है इसलिए याद रखिए कैमरा आपको स्टार बना सकता है पर पेट नहीं भर सकता. पेट भरता है स्किल, मेहनत और लगातार काम से. वायरल होना तुक्का है और टिके रहना टैलेंट है.
वायरल इकोनॉमी की सबसे खतरनाक बात ये है कि ये गरीबी को ग्लैमर में बदल देती है. एक लड़का फटे कपड़े में नारा लगाता है, एक लड़की स्टेशन पर गीत गाती है, एक बच्चा कचरा बीनते हुए किसी फ़िल्म का डायलॉग मारता है और 24 घंटे में ये तीनों वाइरल हो जाते हैँ. लोग बार बार वीडियो देखते हैं, ब्रांड उसे असली भारत का चेहरा बना देते हैं लेकिन इस फेम के पीछे उसकी असली समस्या जस की तस रहती है. मतलब सिस्टम उसकी गरीबी को बेचकर पैसा कमा लेता है और उसे वापस उसी गरीबी में छोड़ देता है. ये मदद नहीं है. यह असल में गरीबी का लाइव टेलीकास्ट है.
सोशल मीडिया का एल्गोरिदम ड्रग डीलर से कम नहीं
सोशल मीडिया का एल्गोरिदम एक ड्रग डीलर की तरह काम करता है. उसे फर्क नहीं पड़ता कि आप क्या बेच रहे हैं. सच, झूठ, आंदोलन या अश्लीलता. उसे चाहिए डोपामिन हिट. 8 सेकंड का गुस्सा सबसे तेज हिट देता है इसलिए वो उसे सबसे ऊपर धकेलता है. आज अभिनव ट्रेंड में है क्योंकि उसने पुलिस को आंख दिखाई. कल कोई और ट्रेंड में होगा क्योंकि उसने अभिनव को गाली दी. एल्गोरिदम को दोनों से मतलब है. वो दोनों से विज्ञापन कमाएगा इसीलिए वायरल होने वाले 90 फीसदी चेहरे या तो विवाद में फंस जाते हैं या खुद विवाद पैदा करने लगते हैं क्योंकि शांति और लॉजिक से रीच नहीं आती. रीच आती है शोर से और शोर की उम्र 48 घंटे ही होती है.
हमारी सबसे बड़ी गलती ये है कि हम हर समस्या का हल एक हीरो में ढूंढते हैं. हमें लगता है एक अभिनव आ जाएगा तो सिस्टम बदल जाएगा. एक मोनालिसा वाइरल हो जाएगी तो गरीबी मिट जाएगी लेकिन समाज में कोई भी बड़ा बदलाव सिर्फ एक चेहरे से नहीं होता. बदलाव होता है कानून से, कोर्ट से, यूनियन से, स्कूल से, अस्पताल से यानी इंस्टिट्यूशन से. वायरल फेम हमें इंस्टिट्यूशन बनाने से रोकता है क्योंकि वो हीरोइज्म पैदा करता है जबकि सच्चाई ये है कि हीरो कोई नहीं जब तक उसके पीछे संगठन, फंड, ट्रेनिंग और प्लान न हो इसलिए अगली बार जब कोई 10 सेकंड के क्लिप में कोई हीरो वायरल हो तो लाइक करने से पहले यह सवाल पूछिए कि इसके बाद के 10 साल का प्लान क्या है? अगर जवाब नहीं है तो समझ जाइए ये फेम नहीं, फुस्स पटाखा है. Protest Viral Face





