Prime Minister Narendra Modi: अभी हाल ही में आईआईटी दिल्ली के 57वें दीक्षांत समारोह में प्रधानमंत्री ने स्टूडेंट्स से कहा कि सिर्फ सवाल मत पूछिए, बल्कि सवालों के जवाब खोजने का साहस भी रखिए. सवाल पूछो क्योंकि जिज्ञासा ही विज्ञान और लोकतंत्र की रीढ़ है. प्रधानमंत्री की यह बात सुनकर लगा कि शायद सत्ता को अब एहसास हुआ है कि बिना सवाल के समाज आगे नहीं बढ़ सकता लेकिन गहराई से देखें तो यह भी जुमला ही साबित होता है क्योंकि बीजेपी के पिछले 12 साल का रिकॉर्ड सवाल पूछने वाले की जबान पर ताला लगाने का ही रहा है इसलिए प्रधानमंत्री की कथनी और करनी में बड़ा फर्क नजर आता है. सवाल यह है कि प्रधानमंत्री ने अब तक खुद कितने सवालों का सामना किया है? क्या धर्म की राजनीती करने वाले प्रधानमंत्री धर्म से जुड़े सवालों का जवाब दे सकते हैँ?
दुनिया का इतिहास यही रहा है कि जहां भी सवाल बंद हुआ, वहां इंसान का विकास भी रुक गया. धर्म और विज्ञान में, राजतंत्र और लोकतंत्र में सबसे बड़ा अंतर सिर्फ इतना ही है धर्म और राजतंत्र में सवालों के लिए जगह नहीं होती जबकि विज्ञान और डेमोक्रेसी की बुनियाद ही सवालों पर टिकी होती है. धर्म पर सवाल उठते ही नास्तिक और विधर्मी होने का ठप्पा लग जाता है वहीं राजा से सवाल पूछने पर देशद्रोही साबित कर दिया जाता है.
धर्म ने कहा मनुष्य को भगवान ने बनाया. इस पर सवाल करना पाप हो जाता है. राजा ने कह दिया मैं बायोलॉजिकल तरीके से पैदा नहीं हुआ. इस पर सवाल करना देशद्रोह हो जाता है. धर्म से सवाल करना हो तो यह पूछा जा सकता है कि ईश्वर ने मनुष्य को कैसे बनाया? इस सवाल के जवाब में धर्म के पास पचासों कहानियाँ तैयार हैँ लेकिन धर्म से यह प्रश्न नहीं पूछा जा सकता कि ईश्वर ने मनुष्य को बनाया इसका सबूत क्या है? इसी तरह अगर राजा से सवाल पूछना हो तो यह पूछा जा सकता है कि राजा आम चूसकर खाता है या काटकर खाता है लेकिन यह नहीं पूछा जा सकता कि उसके राज में बच्चों कि शिक्षा बर्बाद क्यों है?
आईआईटी दिल्ली के दीक्षांत समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने छात्रों से सवाल पूछते रहने का जुमला दिया जो सिर्फ सुनने में अच्छा लगता है लेकिन प्रधानमंत्री के पिछले 12 साल का रिकॉर्ड इस नसीहत के ठीक उलट है. एक तरफ कैंपस में युवाओं से कहा जा रहा है कि बेबाक बनो, दूसरी तरफ सवाल पूछने वाले हर मंच को या तो बंद कर दिया गया है या उसे इतना कमजोर कर दिया गया है कि वहां से आवाज ही बाहर नहीं आ सकती. यही वजह है कि मोदी के इस बयान के बाद सोशल मीडिया से लेकर संसद तक यह सवाल पूछा जा रहा है कि अगर निष्पक्ष पत्रकारों, बेरोजगारों, कमजोरों और छात्रों को सवाल पूछने हैं तो प्रधानमंत्री जवाब कब देंगे?
स्टूडेंट्स को सवाल पूछने की नसीहत देने वाले प्रधानमंत्री की 2014 के बाद से आज तक एक भी खुली प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं हुई है. प्रधानमंत्री भारत के अंदर या बाहर ऐसे किसी फोरम पर नहीं खड़े हुए जहां बिना स्क्रिप्ट, बिना चुने हुए सवालों के जवाब देने होते हैं. मनमोहन सिंह और वाजपेयी ने कई बार ऐसे खुले मंच से मीडिया के बिना स्क्रिप्ट वाले सवालों के जवाब दिए थे लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने मन की बात, चंद चुनिंदा इंटरव्यूज और रैलियों को ही संवाद का विकल्प बना दिया यानी सवाल आप तय नहीं करेंगे बल्कि जवाब हम पहले से लिखकर लाएंगे.
जवाबदेही के सारे मंचों पर ताला किसने जड़ा?
संसद की हालत भी इससे अलग नहीं है. 17वीं लोकसभा के 5 साल में प्रधानमंत्री प्रश्नकाल में सिर्फ 4 बार आए. संसद में जवाबदेही से बीजेपी के तमाम मंत्री ही नहीं खुद प्रधानमंत्री भी बचते नजर आते हैँ. विपक्ष के सवालों के जवाब में हिन्दू मुस्लिम, मंदिर मस्जिद का शोर ही सुनाई देता है. RTI के जवाब में PMO पल्ला झाड़ लेता है. संसद में प्रधानमंत्री जवाब नहीं देते, मेनस्ट्रीम मीडिया के पास प्रधानमंत्री से पूछने लायक सवाल ही नहीं होते और विपक्ष के सवालों को रौंदने के लिए ईडी और सीबीआई मुस्तैद खड़े हो जाते हैँ. ऐसे में जब जवाबदेही के सारे मंच ही गायब कर दिया जाए तो फिर छात्रों को सवाल पूछने की नसीहत देने का क्या मतलब रह जाता है?
मार्च 2020 में कोरोना के नाम पर पीएम केयर्स फंड बनाया गया. नाम में पीएम लगा है, वेबसाइट पब्लिक डोमेन पर है, अपील भी प्रधानमंत्री के नाम पर हुई लेकिन जब हिसाब मांगा गया तो बीजेपी सरकार ने कहा ये सरकारी फंड नहीं, निजी ट्रस्ट है. मामला सुप्रीम कोर्ट में गया तो पीआईएल दाखिल करने वाले व्यक्ति से चीफ जस्टिस ने कहा की जाकर दो चार कोट पैंट और सिल लो.
आंकड़े बताते हैं कि अब तक पीएम केयर फंड में 13,000 करोड़ रुपये से ज्यादा जमा हो चुके हैं सिर्फ 2020-21 में ही 10,990 करोड़ आए थे. इस पैसे को वेंटिलेटर, ऑक्सीजन प्लांट और वैक्सीन में लगाने का दावा किया गया लेकिन आज तक इसका ऑडिट CAG से नहीं हुआ. इस फंड का ऑडिट एक प्राइवेट फर्म करती है और रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं होती. दिल्ली हाईकोर्ट ने 2021 में कहा कि पीएम केयर्स भारत सरकार का फंड नहीं है और सुप्रीम कोर्ट ने भी इसे आरटीआई के दायरे से बाहर रख दिया. मतलब जनता से पैसा पीएम के नाम पर लिया गया लेकिन सवाल पूछने का अधिकार किसी को नहीं दिया गया.
ठीक यही मॉडल इलेक्टोरल बॉन्ड का था. 2018 में इस बॉन्ड को काले धन पर रोक कहकर लाया गया. 6 साल में 16,518 करोड़ रुपये के बॉन्ड बिके लेकिन फरवरी 2024 में सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की बेंच ने इसे असंवैधानिक घोषित कर दिया. कोर्ट ने साफ कहा कि गुमनाम चंदे से मतदाता के जानने के अधिकार का हनन होता है. कोर्ट के आदेश के बाद एसबीआई ने डेटा जारी किया तो पता चला कि कुल चंदे का 50 फीसदी से ज्यादा हिस्सा सिर्फ बीजेपी को गया. यानी पारदर्शिता के नाम पर जो सिस्टम बना वो भी करप्ट निकला. अब सवाल ये है कि जब कोर्ट को हस्तक्षेप करके डेटा सार्वजनिक करवाना पड़ा तो फिर सरकार 6 साल तक इसे क्यों छुपाती रही?
धर्म पर सवाल हरगिज नहीं
प्रधानमंत्री कहते हैँ कि सवाल जरुरी हैँ लेकिन वह खुद सवालों से हमेशा भागते हुए नजर आये हैँ. प्रधानमंत्री जिस राम के नाम पर सत्ता में आये हैँ क्या उस राम से जुड़े सवालों के जवाब देने की क्षमता उनमें है? अगर कोई यह सवाल करे कि राम का जन्म अयोध्या में हुआ इसके ठोस पुरात्विक प्रमाण क्या हैं? और अगर राम का जन्म अयोध्या में ही हुआ था तो जरूर दशरथ के महल में ही हुआ होगा फिर खुदाई में महल के अवशेष क्यों नहीं मिले? 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने ASI की रिपोर्ट और आस्था दोनों को आधार बनाकर फैसला दिया था लेकिन रिपोर्ट में किसी महल का कोई जिक्र नहीं था.
11वीं सदी में महमूद गजनवी के सोमनाथ हमले पर सवाल पूछो तो जवाब तथ्यों में नहीं मिलता. अगर ग्यारहवीं सदी में यह लड़ाई हिन्दू बनाम मुस्लिम की थी तो हिन्दू राजा क्या कर रहे थे? अगर ईश्वर सर्वशक्तिमान था तो बचाया क्यों नहीं? ब्राह्मणों और ऋषियों ने मंत्र से आक्रमणकारियों को खड़ेदा क्यों नहीं? श्राप से भस्म करने वाली तकनीक कहाँ चली गई थी? अगर यह सवाल पूछो कि ब्रह्मास्त्र, अग्निबाण और श्राप वाले इस देश पर मुट्ठीभर लोग कैसे आक्रमण करने में सफल हुए? एक विदेशी कंपनी कैसे भारत की हुक्मरान बन गई? तो सही जवाब देने की बजाय एनसीईआरटी के इतिहास को ही बदल दिया जाता है. सच ये है कि उस समय भारत सैकड़ों छोटे-बड़े राज्यों में बंटा था और सभी अपने-अपने राज्य बचाने में लगे थे. संगठित राष्ट्रीय सेना का कांसेप्ट ही नहीं था लेकिन इस इतिहास को बताने की बजाय उसे हम बनाम वे या वीर बनाम गद्दार की फर्जी बाइनरी में डालकर पेश किया जाता है ताकि युवा सवाल न पूछें, बस भक्त बने रहें.
धर्म की बुनियाद बस इस एक लाइन पर टिकी है कि यही सत्य है क्योंकि भगवान ने ऐसा कहा है. इसके बाद कोई तर्क, कोई सबूत, कोई बहस नहीं. बाइबिल कहती है दुनिया 6 दिन में बनी. कुरान कहता है इंसान को मिट्टी से बनाया गया. मनुस्मृति कहती है ब्रह्मा के मुख से ब्राह्मण, भुजा से क्षत्रिय और पैरों से शूद्र पैदा हुए. अब जरा इन धर्मों से पूछिए कि 6 दिन में ब्रह्मांड कैसे बना? अगर सबको भगवान ने बनाया तो दलित और शूद्र नीच कैसे हो गये? अगर अल्लाह रहमान है तो मासूम बच्चों को बम से क्यों मरने देता है? यहां सवाल पूछने वाला नास्तिक या काफिर साबित कर दिया जाएगा.
2015 में महाराष्ट्र में अंधश्रद्धा विरोधी कार्यकर्ता नरेंद्र दाभोलकर को इसलिए गोली मारी गई क्योंकि वे चमत्कार के नाम पर ठगी के खिलाफ क़ानून बनवाने की मांग पर अड़े थे. 2017 में कर्नाटक में एमएम कलबुर्गी की हत्या हुई क्योंकि उन्होंने मूर्ति पूजा पर सवाल उठाए. 2013 में गोविंद पानसरे और 2015 में एमएम कलबुर्गी को मार डाला गया. गौरी लंकेश की हत्या भी सवाल पूछने के जुर्म में हुई. सभी जगह पैटर्न एक जैसा है. धर्म सवाल बर्दाश्त नहीं करता. वो कहता है, ईश्वर ने मनुष्य को बनाया. आप पूछ सकते हैं कैसे बनाया? मिट्टी से या पानी से? लेकिन आप ये नहीं पूछ सकते कि बनाया इसका सबूत क्या है? सबूत मांगना ही ब्लासफेमी है. पाकिस्तान और बंगलादेश में इसी ब्लासफेमी क़ानून की आड़ में हर साल कई निर्दोष लोगों की हत्याएं कर दी जाती हैँ.
धर्म का पूरा खेल डर और इनाम पर टिका है. स्वर्ग का लालच दो, नर्क का डर दिखाओ और इसी बीच सवाल को पाप घोषित कर दो. 2000 साल तक चर्च ने कहा कि सूरज धरती के चक्कर लगाता है जब गैलीलियो ने दूरबीन से देखकर कहा- नहीं, धरती सूरज के चक्कर लगाती है तो उसे जेल में डाल दिया गया. उसे माफी मांगनी पड़ी. विज्ञान हार गया, धर्म जीत गया लेकिन 400 साल बाद आज हर बच्चा जानता है कि गैलीलियो सही था. आखिरकार सवाल जीत गया धर्म हार गया.
सवाल बंद करोगे तो किला टूटेगा
राजतंत्र असल में धर्म का जुड़वां भाई ही है. दोनों को सवाल से नफरत है. राजा कहता था, मैं ईश्वर का दूत हूं. मैं दैवीय अधिकार से राज कर रहा हूं. मैं बायोलॉजिकल तरीके से पैदा नहीं हुआ. मुगल बादशाह खुद को जिल्ले-इलाही कहते थे. यूरोप में राजाओं को गोड्स अनोइंटेड किंग कहा जाता था. भारत में भी राजा को अवतार बताया गया. राजशाही की इस व्यवस्था में आप सिर्फ चुनिंदा सवाल ही कर सकते हैं. सिर्फ वो सवाल जिससे राजा के अवतार वाली छवि को ठेस न पहुंच पाए. महाराज आज भोजन में क्या खाएंगे? आम छीलकर खाएंगे या काटकर? लेकिन आप ये नहीं पूछ सकते कि राजकोष का पैसा कहां गया? प्रजा भूखी क्यों है? गद्दी आपका बेटा ही क्यों संभालेगा? जैसे ही आपने ये सवाल पूछे आपको राजद्रोह के आरोप में सूली पर लटका दिया जाएगा.
फ्रांस की क्रांति इस बात का सबसे बड़ा ऐतिहासिक सबूत है कि जब धर्म और राजतंत्र मिलकर समाज से सवाल का हक छीन लेते हैं तो उसका अंत क्रांति से ही होता है. 1789 से पहले फ्रांस में पुरानी व्यवस्था चल रही थी. इस व्यवस्था के तीन स्तंभ थे. राजा, चर्च और सामंत. राजा लुई 16वां खुद को ईश्वर का प्रतिनिधि मानता था. उसका मशहूर वाक्य था राज्य मैं ही हूं. वर्साय के महल में किंग लुई और उसकी रानी मेरी आंतोएनेत की ऐशो-आराम की जिंदगी चल रही थी और खजाना खाली हो रहा था लेकिन सवाल पूछने की इजाजत किसी को नहीं थी.
चर्च कहता था कि राजा गद्दी पर भगवान की मर्जी से बैठा है इसलिए उसका विरोध करना मतलब सीधे भगवान का विरोध करना है. चर्च के पास देश की सबसे ज्यादा जमीन थी उसे टैक्स में छूट थी और वो लोगों को पाप-मुक्ति के नाम पर पैसे वसूलता था. तीसरा स्तंभ थे सामंत जो किसानों से 40 तरह के टैक्स वसूलते थे और इन तीनों के नीचे दब रही थी आम जनता. किसान, मजदूर, दुकानदार जिन्हें थर्ड एस्टेट कहा जाता था. ये लोग देश की 98 फीसदी आबादी थे और इनकी जिंदगी के फैसले 2 फीसदी लोग करते थे. रोटी दो साल में दोगुनी महंगी हो गई थी, जनता भुखमरी के कगार पर पहुँच चुकी थी और वर्साय के महल में अय्याशी चरम पर थी.
इस पूरी व्यवस्था में सवाल पूछने की कोई जगह नहीं थी. अगर किसी ने पूछा कि राजा इतना टैक्स क्यों ले रहा है और हिसाब क्यों नहीं देता तो जवाब आता था ये ईश्वर की मर्जी है. अगर पूछा कि चर्च इतनी दौलत लेकर भी टैक्स क्यों नहीं देता तो यह ब्लासफेमी का जुर्म था जिसकी सजा मौत थी. अगर किसी ने पूछा कि रानी के हीरे-जवाहरात का पैसा कहां से आया तो तुरंत देशद्रोह का ठप्पा लग जाता था. फॉर्मूला साफ था, धर्म से सवाल मतलब पाप और राजा से सवाल मतलब राजद्रोह. बिल्कुल वही फॉर्मूला जो हर तानाशाही सत्ता में इस्तेमाल होता है. धर्म डराता था नर्क से, राजा डराता था जेल और सूली से. नतीजा ये हुआ कि 100 साल तक जनता पिसती रही किसी ने आवाज नहीं उठाई लेकिन यह भी सच है कि सवालों को दबाया जा सकता है मारा नहीं जा सकता.
18वीं सदी में वॉल्टेयर, रूसो, दिदरो जैसे विचारकों ने कलम उठाई. वॉल्टेयर ने सवाल पूछा कि अगर ईश्वर दयालु है तो दुनिया में इतनी गरीबी और अन्याय क्यों है? रूसो ने अपने सोशल कॉन्ट्रैक्ट में लिखा कि सत्ता ईश्वर से नहीं, जनता से आती है. दिदरो ने 28 खंडों का विश्वकोश छापकर हर अंधविश्वास पर सवाल दाग दिए. ये सवाल किताबों से निकलकर पेरिस की गलियों, शराबखानों और बाजारों तक पहुंचे. भूख और अपमान के साथ जब ये सवाल मिले तो बारूद बन गए. 14 जुलाई 1789 को भूखी जनता ने बास्तील के किले पर हमला कर दिया. बास्तील सिर्फ एक जेल नहीं थी वो उस पूरी व्यवस्था का प्रतीक थी जहां सवालों को बंद कर दिया जाता था. किला टूटा, कैदी आजाद हुए और उसके 4 साल के अंदर ही लुई 16वें और मेरी आंतोएनेत दोनों का सिर गिलोटिन पर टांग दिया गया. इस क्रांति का नारा था. आजादी, समानता और भाईचारा और इन तीनों शब्दों की नींव सिर्फ एक चीज थी, सवाल.
सवाल पूछना जरुरी है लेकिन जवाब देगा कौन?
हर सत्ता धीरे-धीरे सवाल पूछने के सारे मंच बंद कर देता है. फ़्रांस इसका उदाहरण है. इतिहास की राजशाही सत्ता के सारे एलिमेंट्स आज की तानाशाही सत्ता में साफ दिखाई देते हैँ. प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं होती, RTI से जवाब नहीं मिलता, CAG ऑडिट नहीं होता और जो सवाल पूछता है उसे देशद्रोही या आस्था विरोधी कहकर चुप करा दिया जाता है. ये राजतंत्र का नया लेकिन खतरनाक मॉडल है. बस फर्क इतना है कि पहले राजा के सर पर ताज होता था और पुजारी बगल में खड़ा होता था, आज चुनाव का सिंबल है और चुनाव आयोग बगल में खड़ा है.
भारत ने 1947 में राजतंत्र का खात्मा कर लोकतंत्र को अपनाया था. राजा की जगह जनता सर्वोपरि हो गई, धर्म की जगह संविधान स्थापित हो गया और दरबार की जगह संसद ने ले ली. संविधान की पहली लाइन हम भारत के लोग इसी बात की गारंटी है कि सवाल पूछने का अधिकार हम भारत के लोगों के पास है. विज्ञान और लोकतंत्र दोनों की असली ताकत यही है. विज्ञान कहता है सबूत के बिना कोई बात मान्य नहीं और लोकतंत्र कहता है हिसाब के बिना कोई वोट मान्य नहीं इसलिए प्रधानमंत्री की सवाल पूछो वाली नसीहत तभी पूरी होगी जब वह जवाब देने की जिम्मेदारी निभाएंगे. वरना इतिहास गवाह है जिस समाज में सवाल बंद कर दिए जाते हैं वहां बास्तील का किला एक न एक दिन जरूर टूटता है.
विज्ञान और लोकतंत्र की बुनियाद ही शक और सवाल पर टिकी है
विज्ञान का पहला नियम है, हर बात पर शक करो. न्यूटन ने शक किया तो गुरुत्वाकर्षण मिला. डार्विन ने शक किया तो विकास का सिद्धांत मिला. मैडम क्यूरी ने शक किया तो रेडियम मिला. विज्ञान कभी नहीं कहता ये अंतिम सत्य है. वो कहता है आज तक का सबसे बेहतर सबूत यही है. कल नया सबूत आएगा तो ये थ्योरी भी बदल जाएगी इसीलिए विज्ञान ने 300 साल में इंसान को बैलगाड़ी से मंगल पर पहुंचा दिया.
लोकतंत्र भी यही करता है. लोकतंत्र कहता है जनता मालिक होती है इसलिए जनता को सवाल करने का और हिसाब मांगने का हक है. प्रधानमंत्री से सवाल पूछा जा सकता है कि पीएम केयर्स के 13,000 करोड़ का ऑडिट CAG से क्यों नहीं हुआ? इलेक्टोरल बॉन्ड के 16,518 करोड़ में 50 फीसदी चंदा एक पार्टी को ही क्यों गया? बेरोजगारी का डेटा 2017 के बाद से क्यों नहीं आया? देश पर कर्जा 2 लाख लाख करोड़ से ऊपर कैसे हो गया? शिक्षा मुफ्त क्यों नहीं है? मंत्रियों के बच्चे विदेशों में क्यों पढ़ने जाते हैँ?
दिक्कत तब आती है जब चुनकर आई सरकार खुद को राजा समझने लगती है. मंच से कहा जाता है सवाल पूछो लेकिन जैसे ही कोई जंतर मंतर से PM CARES, इलेक्टोरल बॉन्ड, बेरोजगारी, महंगाई पर सवाल पूछता है तो उसे विरोधी, देशद्रोही, टुकड़े-टुकड़े गैंग कहा जाता है. इंसान और जानवर में फर्क सिर्फ इतना है कि इंसान सवाल पूछता है. आग कैसे जलती है? बीमारी क्यों होती है? हम कहां से आए? इन सवालों ने ही हमें गुफा से निकालकर चांद पर पहुंचाया. धर्म ने 5000 साल में हमें सिर्फ स्वर्ग-नर्क की कहानी दी. राजतंत्र ने 2000 साल में हमें सिर्फ गुलामी दी लेकिन विज्ञान ने मात्र 300 साल में हमें बिजली, दवा, रेल, जहाज और इंटरनेट दिया और लोकतंत्र ने मात्र 2 सौ सालों में बराबरी और न्याय दिया इसलिए प्रधानमंत्री का सवाल पूछो वाला बयान सही है, पर आधा है. पूरा बयान ये होना चाहिए था कि सवाल पूछो और मैं जवाब भी दूंगा क्योंकि जब तक सवाल का जवाब देने का मंच नहीं होगा तब तक सवाल पूछो कहना भी उसी राजा जैसा है जो जनता से कहे दरबार में आकर कुछ भी पूछो और फिर पूछने वाले की जीभ कटवा दे.
बीजेपी की सत्ता में सवाल पूछना जुर्म है
सवाल पूछना लोकतंत्र का पहला नियम है लेकिन आज बीजेपी की सत्ता में सवालों को अपराध बना दिया गया है. जब डेटा की बात आती है तो तस्वीर और डरावनी हो जाती है. CMIE के 2024 के आंकड़े कहते हैं कि भारत में युवा बेरोजगारी दर 45 फीसदी पर है. IIT, IIM से निकले टॉपर भी 2-3 साल तक प्लेसमेंट के लिए भटक रहे हैं. 2014 में रसोई गैस का सिलेंडर 410 रुपये का था आज 900 रुपये के पार है. दूध 35 से 70 रुपये हो गया लेकिन इन सब पर कोई जवाबदेही दिखाई नहीं देती बस हर भाषण में विकास और अमृतकाल का जिक्र होता है. वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स 2024 में भारत 180 देशों में 159वें नंबर पर है. सत्ता से सवाल पूछने वाले पत्रकारों पर UAPA, देशद्रोह और मानहानि के केस दर्ज हो रहे हैं. सरकारी विज्ञापन के जरिए मीडिया को लाइन पर लाया जा रहा है. सीबीआई, ईडी, चुनाव आयोग, CAG जैसी संस्थाओं पर लगातार सवाल उठे हैं और जो इन सवालों को उठाता है उस पर देशद्रोही का लेबल चिपका दिया जाता है.
स्टूडेंट्स के बीच जाकर उनसे सवाल पूछने की नसीहत देना आसान है, मुश्किल है सवाल का जवाब देना. लोकतंत्र भाषणों से नहीं, जवाबदेही से चलता है. जब तक प्रधानमंत्री खुद जनता के आगे अपनी जवाबदेही तय नहीं करते, निष्पक्ष पत्रकारों, पर्यावरण की चिंता करने वालों, कामगारों, बेरोजगारों और कमजोरों के सवालों का जवाब नहीं देते और पिछले 12 सालों में किये गये अच्छे बुरे कामों का हिसाब नहीं देते तब तक IIT के मंच से दी गई नसीहतें प्रधानमंत्री की एक और जुमलेबाजी ही साबित होगी. Prime Minister Narendra Modi





