History of Paratha: ‘मानसोल्लास’ 12वीं सदी की संस्कृत की एक किताब है, जिसे चालुक्य राजा सोमेश्वर तृतीय ने 1131 ईस्वी के आसपास लिखा था. ‘मानसोल्लास’ का मतलब है ‘राजा का मनोरंजन’. इस में राजा के जीवन की हर चीज का जिक्र है जैसे खाना, संगीत, शिकार, राजनीति, युद्ध, घर बनाना, सबकुछ.

‘मानसोल्लास’ के ‘अन्नभोग प्रकरण’ यानी खाने वाले अध्याय में ‘पुर्पटा’ का वर्णन है जैसे उस समय में गेहूं के आटे को गूंथ कर पतला बेलते थे. उसे घी या तेल में तलते थे, फिर ऊपर से चीनी, शहद या गुड़ डाल कर खाते थे.

इतिहासकार मानते हैं कि यही आज का परांठा, पूरी या मालपुआ का शुरुआती रूप है, फर्क सिर्फ इतना है कि उस समय इसे मीठा बना कर खाते थे. नमकीन स्टफ्ड परांठा बाद में आया, खासकर मुगलकाल और पंजाब में.

तकनीकी रूप से कहें तो परांठे की जड़ें भारत में 12वीं सदी तक जाती हैं और ‘पुर्पटा’ उस का सब से पुराना लिखित प्रमाण है.

सवाल उठता है कि आज दुनियाभर में कितनी तरह के परांठे मिलते हैं? मोटेतौर पर इस तरह की गिनती करना मुश्किल है, पर तकरीबन 30 से ज्यादा फेमस वैरायटी हैं, जिन्हें हम 4 कैटेगरी में बांट सकते हैं :

1. स्टफ्ड परांठा. इसे सब से पौपुलर कहा जाता है, जैसे आलू परांठा, गोभी परांठा, मूली परांठा, पनीर परांठा आदि. जो नौनवैज खाते हैं उन्हें कीमा परांठा लुभाता है. वैसे, बहुत से लोग मिक्स वेज परांठा भी खाते हैं.

2. लेयर्ड यानी तह वाला परांठा. लच्छा परांठा, मलाबार परांठा, खस्ता परांठा आदि.

3. स्पैशल या मीठा परांठा. मेथी परांठा, पालक परांठा, गुड़ परांठा, पुदीना परांठा आदि.

4. रीजनल स्पैशल परांठा. बंगाली लुची परांठा, गुजराती थेपला. मुगलई परांठा आदि.

तो देर किस बात की. अपनी पसंद का परांठा बनाइए और चाय, दही, मक्खन आदि के साथ नोश फरमाइए. History of Paratha

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