Maid story: शशि का पति आलोक अकसर शशि के सामने अपनी नौकरानी माया के कामकाज और उस के द्वारा बनाए भोजन की तारीफ करता रहता है.

”आज दोपहर में माया ने कढ़ी बहुत शानदार बनाई. मैं तो 3 कटोरी खा गया. मां भी कढ़ी खा कर बड़ी खुश थी. तुम उस से रैसिपी पूछ कर लिख लेना.”

”आज तो माया ने जैसा शाही पनीर बनाया है, वैसा स्वाद तो मैं ने कभी चखा ही नहीं, वाह.”

शशि बुरा नहीं मानती क्योंकि माया खाना ठीक बना लेती है. हालांकि इतना अच्छा भी नहीं कि उस की इतनी तारीफ की जाए. शशि चूंकि एक वर्किंग वुमन है और एक एनजीओ में बड़ी जिम्मेदारी वाली पोस्ट उस के पास है, लिहाजा उसे इतनी फुरसत नहीं होती कि सुबहशाम चौके में खटे. इसलिए उस ने बड़ी देखभाल के बाद माया को खाना बनाने के लिए रखा था. शुरू में उस को काफी इंस्ट्रक्शंस देने पड़े थे.

शशि एक उच्चमध्यवर्गीय परिवार में आई आलोक की पत्नी है. घर में 4 सदस्य हैं और उन पर 3 नौकर हैं. एक ड्राइवर, एक ऊपर का काम करने वाला और एक औरत माया. माया की उम्र लगभग 32 साल है. देखने में साधारण मगर सुडौल शरीर की महिला है. विधवा है और 2 बेटियों की मां है. शशि के यहां काम करते हुए उस को 3 महीने हो गए हैं. इस से पहले वह दोतीन घरों में बरतन और झाड़ूपोंछा करती थी, जिस में ज्यादा आमदनी नहीं होती थी. शशि के वहां वह सुबह से शाम तक रहती है और खाना बनाने के साथसाथ कई और काम भी निबटाती है. समय बचता है तो वह शशि की सास की सेवा भी करती है. लिहाजा, पहले जितना पैसा 3 घरों में काम कर के मिलता था, अब एक ही घर में उस से ज्यादा मिल जाता है.

एक दिन रात के खाने के लिए डाइनिंग टेबल पर सभी बैठे थे- शशि, आलोक, उस की मां, उस का छोटा भाई अंकुर और मुंबई से आए आलोक के एक खास मित्र प्रभात देसाई, जो 2 दिनों के लिए बिज़नैस के सिलसिले में दिल्ली आए थे और उन के घर पर ठहरे थे. माया चपातियां ले कर जैसे ही टेबल के पास आई, आलोक चहक कर बोला- ”माया, आज तो तुम ने कमाल ही कर दिया. हर चीज़ लजीज बनी है. भिंडी का स्वाद तो जबरदस्त है, क्यों देसाई जी?” माया ने सुना और झेंप कर किचन में वापस चली गई.

देसाई ने आलोक की हां में हां मिलाई, ”सचमुच, खाना वाकई बढ़िया है. मैं ने तो सोचा कि यह सब भाभीजी ने बनाया है.”

”अरे नहीं, शशि तो खिचड़ी ही ठीक से बना ले, वही बहुत है. यह सारा कमाल तो माया का है. घर की अन्नपूर्णा तो वही है,” कह कर आलोक हंसने लगे.

आलोक की बात पर उस की मां ने नाराजगीभरी नजर से आलोक को देखा. उन का मतलब था कि बाहरी व्यक्ति के सामने बहू के बारे में क्या बक रहे हो, मगर आलोक उन की नजर का मतलब नहीं समझा और अपनी ही रौ में माया की तारीफों के पुल बांधता रहा.

अचानक शशि खाना छोड़ कर तमतमाते हुए खड़ी हो गई और तेजी से बेडरूम में चली गई. दूसरे दिन आलोक के घर से बाहर जाते ही शशि ने माया का हिसाब कर दिया और फिर कभी उस के घर में न घुसने की हिदायत भी दे डाली. माया रोतीगिड़गिड़ाती रही कि उसे काम से न निकाले, मगर शशि ने उस की एक न सुनी.

दरअसल, गलती आलोक की थी जो बीवी को ताना मारने की नीयत से या बेखयाली में नौकरानी की तारीफ़ उस के सामने करता था. उस ने बिना सोचेसमझे बाहर के व्यक्ति के सामने भी माया की तारीफ करनी शुरू कर दी और यह बेइज्जती शशि सहन नहीं कर पाई. मगर नुकसान माया का हुआ जिस के लिए अपनी 2 नाबालिग बच्चियों को दो वक्त की रोटी खिला पाना अब मुश्किल हो रहा है. शशि के घर से उस को शाम को बचा हुआ सारा खाना मिल जाता था. इस के अलावा यहां उस को पगार भी अच्छी मिलती थी. समयसमय पर कपड़ेलत्ते भी मिलते थे. वह सब अचानक बंद हो गया. अब माया फिर कुछ घरों में बरतन मांजने का काम कर रही है.

अनुराधा के पति का इयरफोन नहीं मिल रहा था. उस ने पूरा कमरा छान मारा. उस ने घर में झाड़ूपोंछा करने वाली नौकरानी भारती पर शक जाहिर किया. दरअसल, भारती अपनी कमर में अपना मोबाइल फ़ोन खोंस कर और कानों में इयरफोन लगा कर गाने सुनते हुए साफसफाई का काम करती थी. लिहाजा, अनुराधा के पति का शक सीधे उस पर गया कि हो सकता है बेड के सिरहाने वाली टेबल पर रखे नए इयरफोन देख कर उस का मन ललचा गया हो और उस ने उठा लिया हो.

अनुराधा ने भारती को उस के घर से बुलवाया और बुरी तरह झिड़कते हुए इयरफोन वापस करने के लिए कहा. भारती कहती रही कि उस ने नहीं लिया, मगर अनुराधा और उस के पति यही कहते रहे कि उस ने नहीं लिया तो टेबल पर रखा इयरफोन क्या हवा में गुम हो गया? भारती ने कहा, ‘आप मेरी तनख्वाह से इयरफोन के पैसे काट लीजिए पर यकीन मानिए मैं ने नहीं उठाया है.’ यह कह कर वह चली गई.

शाम को बाजार जाने के समय अनुराधा के पति ने खूंटी पर टंगी जैकेट उतार कर पहनी और जैसे ही जेब में हाथ डाला, इयरफोन हाथ में आ गया. उसे याद आया कि सुबह छत पर ठंडी हवा खाने के लिए वह यही जैकेट पहन कर गया था और फ़ोन के साथ इयरफोन भी ले गया था. अनुराधा और उस के पति शर्मिंदा तो हुए पर भारती को तब भी उन्होंने सच्ची बात नहीं बताई और कहा, ‘हम ऐसी छोटीछोटी गलतियों के लिए किसी के पैसे नहीं काटते, मगर आइंदा ऐसा न हो, इस का ध्यान रखना.’

घरेलू नौकरानियां जो अपनी गरीबी के कारण दूसरों के घरों में काम करने के लिए मजबूर होती हैं, किसकिस तरह की परेशानियों से जूझती हैं, ये उस की कुछ बानगियां हैं. कई बार तो जवान नौकरानी घर के वहशी पुरुषों की हवस का शिकार भी बन जाती हैं. बौलीवुड ऐक्टर शाइनी आहूजा का केस तो आप को पता ही होगा. वर्ष 2009 में उन के घर में काम करने वाली एक जवान घरेलू सहायिका ने उन पर बलात्कार का आरोप लगाया था. यह मामला काफी चर्चित रहा. बाद में अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर शाइनी आहूजा को दोषी ठहराया और सजा सुनाई थी. इस कांड के बाद उन का फ़िल्मी कैरियर समाप्त ही हो गया.

गौरतलब है कि घरेलू नौकरानियां या घरेलू कामगार महिलाएं समाज की सब से मेहनती लेकिन अकसर सब से कम सुरक्षित और कम सम्मानित श्रमिक वर्ग में आती हैं. वे दूसरों के घरों की सफाई, खाना बनाना, बरतन धोना, कपड़े धोना, बुजुर्गों और बच्चों की देखभाल जैसे काम करती हैं लेकिन खुद अनेक प्रकार की समस्याओं से जूझती हैं.

कम वेतन और आर्थिक असुरक्षा

 1. कई बार छुट्टी लेने पर पैसे काट लिए जाते हैं.

2. बीमारी या किसी पारिवारिक संकट के समय उन की आय पूरी तरह बंद हो जाती है.

3. मालिक कभी भी बिना नोटिस के काम से निकाल सकते हैं.

4. चोरी या किसी सामान के खोने पर सब से पहले शक अकसर नौकरानी पर ही किया जाता है.

5. सुबह बहुत जल्दी काम शुरू करना पड़ता है.

6. कई घरों में काम करने के कारण दिन के 10–12 घंटे तक मेहनत करनी पड़ती है.

 सम्मान की कमी

1. कुछ घरों में उन्हें खाने-पीने के लिए अलग बरतन दिए जाते हैं.

2. कई घरों में नौकर को स्टूल या मोढ़े आदि पर भी बैठने की अनुमति नहीं होती.

यौन उत्पीड़न और सुरक्षा का खतरा

1. महिला नौकरों को मालिक या दूसरे नौकरों, ड्राइवरों से छेड़छाड़ या यौन उत्पीड़न किए जाने का सामना करना पड़ सकता है.

2. लगातार झुक कर काम करने से घरेलू नौकरानियों को एक उम्र के बाद कमर, घुटनों और गरदन में दर्द रहने लगता है.

3. डिटर्जेंट और कैमिकल के लगातार संपर्क से उन को त्वचा और सांस संबंधी बीमारियां हो सकती हैं.

4. गरीब, दलित, आदिवासी या प्रवासी पृष्ठभूमि की महिलाओं को अतिरिक्त भेदभाव का सामना करना पड़ता है.

 परिवार और बच्चों की चिंता

1. दिनभर दूसरों के बच्चों की देखभाल करने वाली महिलाएं अकसर अपने बच्चों को समय नहीं दे पाती हैं.

2. पति की बेरोजगारी, शराब की लत या घरेलू हिंसा जैसी समस्याएं भी कई कामगार महिलाओं के जीवन को बुरी तरह प्रभावित करती हैं.

3. गांव से शहर आई महिलाओं को रहने की जगह, भाषा और पहचान की समस्याएं होती हैं.

4. बिचौलियों द्वारा शोषण किया जाता है.

मानसिक तनाव

लगातार अपमान या असुरक्षा की भावना आत्मसम्मान को प्रभावित करती है.

कई नौकरानियां अकेलेपन, चिंता और अवसाद जैसी समस्याओं से भी जूझती हैं.

त्योहारों और विशेष अवसरों पर भी उन्हें काम करना पड़ता है. अकसर मालिक त्योहार-समारोह आदि अवसरों पर नौकर को पूरे समय उपस्थित रहने के लिए कहते हैं. बदले में उन्हें भोजन या कुछ बख्शिश दे दी जाती है. कई नियोक्ता अपने नौकरों को नियमित साप्ताहिक अवकाश तक नहीं देते हैं. ऐसे में कामगार के सामने व्यक्तिगत जीवन और काम के बीच संतुलन बनाना कठिन हो जाता है. दिक्कत यह है कि साप्ताहिक अवकाश का कौन्सैप्ट तो ठीक है लेकिन उस दिन का खाना कौन बनाएगा? इस का जवाब किसी के पास नहीं है. मालिक होने का यह मतलब तो नहीं उन्हें भूख नहीं लगेगी.

पश्चिमी देशों, जैसे यूनाइटेड स्टेट, यूनाइटेड किंगडम, जरमनी या कनाडा में तो घरेलू नौकर रखना बहुत ज्यादा महंगा है. वहां श्रम कानून काफी सख्त हैं और अधिकांश लोगों को घरेलू कामगारों को प्रति घंटा अच्छी मजदूरी देनी पड़ती है. इसलिए वहां पूर्णकालिक नौकर रखना केवल संपन्न परिवारों के लिए ही संभव होता है. आम मध्यमवर्गीय परिवार अपने घर के अधिकांश काम खुद करते हैं. उन को तो नौकर मिलते ही नहीं हैं. मगर भारत में गरीबी और बेरोजगारी इतनी ज्यादा है कि निम्नवर्ग का बड़ा हिस्सा बहुत कम तनख्वाह पर दूसरों के घरों में काम करने के लिए मजबूर है. लाखों महिलाएं बहुत कम वेतन पर झाड़ूपोंछा, बरतन, खाना बनाना और बच्चों या बुजुर्गों की देखभाल का काम करती हैं.

घरेलू कामगार दूसरों के घरों को व्यवस्थित और आरामदायक बनाते हैं, इसलिए जिस सम्मान, संवेदनशीलता और गरिमा की अपेक्षा हम अपने लिए करते हैं, वही सम्मान उन्हें भी मिलना चाहिए. एक सभ्य और न्यायपूर्ण समाज की पहचान इसी से होगी कि वह सब से कमजोर और मेहनतकश लोगों के साथ कैसा व्यवहार करता है.

मिसेज कमला अरोड़ा अकेली रहती हैं. उम्र 70 साल के करीब है. दिल्ली के मोतीनगर इलाके में उन के पति की 4 दुकानों से बहुत अच्छा किराया उन को मिलता है. घर के काम के लिए मिसेज अरोड़ा प्लेसमैंट एजेंसी से फुलटाइम मेड हायर करती हैं. कोई भी मेड उन के घर में 2 महीने से अधिक नहीं टिक पाती.

दरअसल, मिसेज अरोड़ा को साफ़सफाई का जनून सा है. उन्हें पूरा घर चमचमाता हुआ चाहिए. लिहाजा, उन के घर की मेड दिनभर कपड़ा लिए डस्टिंग ही करती नज़र आती है. दिन में 3 दफे उन के घर में पोंछा लगता है. रात के 11 बजे जब आधी दुनिया सो चुकी होती है, मिसेज अरोड़ा की मेड पूरे घर में पोंछा लगाती है.

रात का आखिरी पोंछा लगाने के बाद ही मेड छत पर बने एक कोठरीनुमा कमरे में जा कर आराम कर पाती है. इस के अलावा, उस के ऊपर तमाम रिस्ट्रिक्शन हैं. जैसे, यदि उस को अपने घर फ़ोन करना है तो वह सुबह नीचे आने से पहले कर ले या रात में सारा काम हो जाने के बाद जब वह अपने कमरे में ऊपर जाए, तब करे. उस को घर से बाहर जाने या पड़ोसियों से बात करने की इजाजत नहीं है.

मिसेज अरोड़ा जब खुद अपने ड्राइवर के साथ बाहर जाती हैं तो सारे कमरे लौक कर के मेड को बालकनी में बिठा कर जाती हैं. जहां पंखा तक नहीं लगा है. मिसेज अरोड़ा जैसे पैसे वाले लोग भले प्लेसमैंट एजेंसी से महंगे नौकर हायर करते हैं मगर उन के प्रति व्यवहार ऐसा जैसे वह इंसान नहीं, कोई रोबोट हो.

 

 

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