Vijay Anand: बॉलीवुड ने हमेशा से भारत की कल्चरल डाइवर्सिटी को जिंदा रखा है. बॉलीवुड ने कई बार लोगों के निजी जीवन को सिनेमा में उतारा तो कई बार बॉलीवुड के लोगों ने अपने निजी जीवन को ही सिनेमा बना दिया. देवानंद के भाई विजयानन्द ने दूसरी शादी सुषमा से की और इस शादी की खबर से ही देश में हंगामा शुरू हो गया. यह शादी इतनी अजीबोगरीब थी की देवानंद कई हफ़्तों सदमे में रहे और किसी से बात नहीं की.

विजय आनंद, देवानंद के छोटे भाई थे और गाइड ज्वेल थीफ, जॉनी मेरा नाम जैसी सुपरहिट फिल्मों के डायरेक्टर थे. 1978 में विजय आनंद ने अपनी सगी भांजी सुषमा कोहली से शादी की. सुषमा विजय आनंद की बड़ी बहन की बेटी थीं. फिल्म `राम बलराम` की शूटिंग के दौरान इश्क हुआ और तुरंत उन्होंने शादी कर ली. अंकल-नीस के बीच की शादी उत्तर भारत में पाप समझी जाती थी इसलिए उस समय काफी बवाल हुआ. परिवार और समाज दोनों ने इस शादी का विरोध किया. विरोध के बावजूद दोनों की शादी जिंदगी भर चली और उनका एक बेटा भी है, वैभव आनंद. ये उनकी दूसरी शादी थी. पहली शादी लवलीन थदानी से हुई थी जो बाद में टूट गई थी.

तमिलनाडु, आंध्र और कर्नाटक में मुरै मामन रिवाज़ है. वहां मामा-भांजी की शादी को सामाजिक मान्यता मिली हुई है और कानूनी रूप से भी हिंदू मैरिज एक्ट 1955 के सेक्शन 5(v) के “कस्टम” के तहत जायज है. हिंदू मैरिज एक्ट में अगर दोनों समुदायों में ये कस्टम न भी हो तो ऐसे रिश्ते “प्रोहिबिटेड डिग्री” में आते हैं इसलिए उनकी शादी रजिस्टर हो गई. विजय आनंद साउथ के नहीं थे. वो पंजाब के गुरदासपुर में पैदा हुए थे. पंजाबियों में इस तरह की शादी का दूर दूर तक कोई रिवाज़ नहीं था इसलिए विजय आनंद के सभी रिश्तेदारों ने इस शादी का विरोध किया. यहाँ तक की पूरे पंजाब में विजय आनंद की फिल्मों का बायकोट कर दिया गया.

देव आनंद अपने छोटे भाई से बेहद प्यार करते थे लेकिन इस शादी ने दोनों भाइयों के बीच गहरा मतभेद पैदा कर दिया. देगानंद ने अपनी आत्मकथा “Romancing with Life” में भी इस घटना का जिक्र किया है. परिवार को लगता था कि विजय आनंद ने जल्दबाज़ी में ऐसा फैसला लिया जिससे पूरे परिवार की इज्जत मिट्टी में मिल गई लेकिन विजय आंनद के लिए यह अपनी पसंद का मामला था.

यह वो दौर था जब ओशो की आध्यात्मिक दुकानदारी की शुरुआत हो चुकी थी. विजय आनंद ओशो के कट्टर अनुयायी बन चुके थे. ओशो के प्रभाव ने विजय आनंद की सोच और निजी फैसलों पर असर डाला. बाद में ओशो ने भी अपने एक प्रवचन में विजय आनंद का नाम लेते हुए इस शादी और उससे जुड़े विवाद का जिक्र किया था. देव आनंद अपने भाई के इस फैसले के लिए ओशो को ही जिम्मेदार मानते थे.

विजय आनंद का मामला सिर्फ एक फिल्मी गॉसिप भर नहीं था. इस मामले ने यह सवाल भी खड़ा किया कि व्यक्ति की निजी पसंद, पारिवारिक परंपराएँ और समाज की नैतिक मान्यताएँ जब टकराती हैं तो भूचाल आना लगभग तय होता है. नैतिकता के नजरिये से विजय आनंद की शादी कितनी जायज थी यह बहस का विषय हो सकता है लेकिन इस बात में कोई बहस नहीं कि भारत विविधताओं का देश है और यह विविधता धर्म और संस्कृति की ही नहीं है बल्कि सोच, विचार और अपने तरीके से जीने की भी है. कोई सरकार इस इंद्रधनुष जैसी डाइवर्सिटी को एक रंग में रंगने की लाख कोशिश करे लेकिन यह कभी मुमकिन ही नहीं. Vijay Anand

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