Udhayanidhi Stalin Arrest: तमिलनाडु की राजनीति एक बार फिर आरोप, प्रत्यारोप और गिरफ्तारी के भंवर में फंस गई है. डीएमके नेता और विधानसभा में विपक्ष के नेता उदयनिधि स्टालिन को अभिनेत्री तृषा कृष्णन के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी के आरोप में गिरफ्तार किया गया है. इसमें दोराय नहीं कि राजनीतिक भाषणों की मर्यादा लगातार गिर रही है, मगर सत्ता और विपक्ष के बीच लड़ाई अब ज़ुबानी आरोप-प्रत्यारोप से नहीं बल्कि पुलिस और कानून के इस्तेमाल से लड़ी जा रही है.

तंजावुर में कावेरी जल विवाद को लेकर आयोजित डीएमके के विरोध प्रदर्शन के दौरान उदयनिधि स्टालिन ने मुख्यमंत्री जोसेफ़ विजय और उनकी सरकार पर तीखे हमले किये. भाषण के दौरान भीड़ के नारों के बीच उन्होंने अभिनेत्री तृषा कृष्णन के प्रति जो अशोभनीय और द्विअर्थी बातें कहीं उसने अब बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है. सत्तारूढ़ तमिलगा वेत्री कड़गम (टीवीके) ने इसे महिला का अपमान बताते हुए पुलिस और राष्ट्रीय महिला आयोग में शिकायत दर्ज कराई है, जिसके बाद पुलिस ने नौ धाराओं में एफआईआर दर्ज कर उदयनिधि को उनके चेन्नई स्थित आवास से गिरफ्तार कर लिया है.

एफआईआर में महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाने, सार्वजनिक शांति भंग करने, अश्लील टिप्पणी करने और दंगा भड़काने जैसी धाराएं शामिल की गई हैं. गिरफ्तारी से पहले उनके घर के बाहर भारी पुलिस बल तैनात किया गया, जबकि बड़ी संख्या में डीएमके नेता और कार्यकर्ता वहां पहुंचे, जिससे तनाव का माहौल बन गया.

हालांकि उदयनिधि स्टालिन पूरे मामले में सफाई देते दिखाई दिए. उन्होंने कहा कि जो बातें बताई जा रही हैं वो उन्होंने कही ही नहीं, मेरी बातों को काट-छांटकर सोशल मीडिया पर फैलाया गया और उसी आधार पर झूठा मुकदमा दर्ज किया गया है. उन्होंने दावा किया कि उनका पूरा 22 मिनट का भाषण कावेरी मुद्दे, किसानों के हित और मेकेदातु बांध के विरोध पर केंद्रित था, जबकि सरकार ने केवल कुछ अंशों को आधार बनाकर कार्रवाई की है. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि विधानसभा सत्र शुरू होने से ठीक पहले उन्हें गिरफ्तार करना विपक्ष की आवाज़ दबाने की कोशिश है. ऐसा राजनीतिक प्रतिशोध के इरादे से किया गया है.

दूसरी ओर, टीवीके, बीजेपी और कांग्रेस सहित कई दलों ने उदयनिधि की भाषा की कड़ी आलोचना की है. टीवीके नेताओं ने इसे मुख्यमंत्री का अपमान और राजनीतिक संस्कृति के पतन का उदाहरण बताया, जबकि भाजपा नेताओं अन्नामलाई और ख़ुशबू सुंदर ने सार्वजनिक माफ़ी की मांग करते हुए कहा कि ऐसे बयान लोकतांत्रिक राजनीति को शर्मसार करते हैं.

वहीं डीएमके पूरी तरह अपने नेता के बचाव में उतर आई है. सांसद कनिमोझी ने उदयनिधि की गिरफ्तारी को लोकतांत्रिक मूल्यों पर हमला करार दिया है और कहा कि यदि कोई मामला बनता है तो उसका फैसला अदालत करे, लेकिन विपक्ष के नेता को विधानसभा सत्र से पहले गिरफ्तार करना सत्ता का दमनकारी रवैया है. पार्टी के वरिष्ठ नेता टी.आर. बालू ने भी दावा किया कि उदयनिधि ने किसी विशेष महिला के बारे में कोई टिप्पणी नहीं की और उनके बयान को संदर्भ से काटकर पेश किया गया है.

इस पूरे विवाद ने दो महत्वपूर्ण प्रश्न खड़े किये हैं. पहला, क्या राजनीतिक नेताओं को सार्वजनिक मंचों पर अपनी भाषा की गरिमा बनाए रखने की जिम्मेदारी नहीं निभानी चाहिए? और दूसरा, यदि किसी बयान पर आपत्ति है तो उसका समाधान न्यायिक प्रक्रिया से होना चाहिए या फिर गिरफ्तारी को राजनीतिक हथियार बनाया जाना चाहिए? लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कानून के निष्पक्ष उपयोग, दोनों की रक्षा समान रूप से आवश्यक है. यदि भाषा की मर्यादा टूटती है तो उसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए, लेकिन यदि कानून का इस्तेमाल राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को दबाने के लिए होने लगे, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा बन जाता है. Udhayanidhi Stalin Arrest

और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...