Development And Environment: फरवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट में पिपावाव पोर्ट, सागरमाला और ग्रेट निकोबार प्रोजैक्ट पर सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत एनवायरनमैंटल एक्टिविस्ट्स को कठघरे में खड़ा करते हुए कहते हैं- "देश में एक भी ऐसा प्रोजैक्ट दिखा दीजिए जिस का इन तथाकथित पर्यावरणविदों ने स्वागत किया हो. हाईवे बनाओ तो विरोध, पोर्ट बनाओ तो विरोध, बुलेट ट्रेन बनाओ तो विरोध, हाइड्रो प्रोजैक्ट बनाओ तो विरोध. पर्यावरण महतत्वपूर्ण है, लेकिन क्या हर इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजैक्ट को सालों तक रोक देना ही एक्टिविज्म है?" जस्टिस सूर्यकांत की यह टिप्पणी आरएसएस की सोच से मेल खाती है. आरएसएस से जुड़े थिंकटैंक एनवायरनमैंटल एक्टिविस्ट को अर्बन नक्सल तक कहते हैं और दावा करते हैं कि विदेशी फंडिंग वाले ये एनजीओ बुलेट ट्रेन, हाईवे, पोर्ट प्रोजैक्ट रुकवाते हैं. सीजेआई का यह बयान आरएसएस के इसी नैरेटिव को बल देता है.
एनजीटी यानी नैशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल पर्यावरण बचाने की विशेष अदालत माना जाता है जो एनजीटी एक्ट 2010 के तहत काम करता है. पर्यावरण के खिलाफ किसी भी मामले को ले कर सीधे एनजीटी में अपील की जा सकती है. अगर सरकार ने किसी प्रोजैक्ट को गलत मंजूरी दे दी, पेड़ काटने की परमिशन दे दी या कोई फैक्ट्री किसी नदी में जहर डाल रही है तो सीधे केस किया जा सकता है. एनजीटी कि हर बैंच में 2 लोग होते हैं. एक ज्यूडिशियल मैंबर जो रिटायर्ड जज होता है और दूसरा एनवायरनमैंटल एक्सपर्ट मैंबर जो पर्यावरण का वैज्ञानिक होता है. यानी, एनजीटी में सिर्फ कानून नहीं, साइंस भी देखी जाती है. सो, इसे क्वासी-ज्यूडिशियल बौडी भी कहते हैं. आम कोर्ट में केस 10-15 साल चलते हैं, वहीं एनजीटी को कानूनन 6 महीने में फैसला देना होता है.
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