New Generation: शादी का लड्डू न खा कर पछताने वालों की संख्या अगर लगातार बढ़ रही है तो यह ट्रैंड हर किसी के लिए फायदे का सौदा है. जिन के लिए घाटे का सौदा है वे हल्ला मचाने का अपना `धर्म` निभा ही रहे हैं. लेकिन इस लाइफस्टाइल से किसी तरह की अपूर्णता नहीं झलकती, न ही यह किसी तरह का पूर्वाग्रह है. युवा सुखशांति से रहने के लिए अब एक नया विकल्प ट्राई कर रहे हैं.

देश में औसतन रोज 66 हजार बच्चे पैदा होते हैं. यह तादाद कम नहीं है जिस के चलते आबादी में हम ने चीन को भी पीछे छोड़ दिया है लेकिन यह गर्व की बात तभी होती जब हम टैक्नोलौजी और रोजगार के क्षेत्रों में भी चीन से आगे निकल पाते. ये 66 हजार बच्चे कुछ और कर पाएं न कर पाएं लेकिन इतना तय है कि इन में से 99 फीसदी अपनेअपने धर्म के ग्राहक जरूर बनेंगे.

देश में माहौल भले ही घनघोर रूप से धार्मिक हो, सरकार और उस की एजेंसियों पर कब्ज़ा धर्मगुरुओं और दक्षिणपंथियों का हो पर युवाओं का एक वर्ग, जो शिक्षित और जागरूक है, ज्यादा बच्चे पैदा करना घाटे का सौदा समझने लगा है. अब तो एक और नया ट्रैंड यह चल निकला है कि हम एक बच्चा भी क्यों पैदा करें और बच्चा तो दूर की बात है, शादी कर घरगृहस्थी के झंझट में ही क्यों पड़ें. क्यों न हम अपनी मरजी से आजादी से जिएं.

तेजी से बढ़ती इस मानसिकता को ले कर अगर कोई चिंतित है तो वे साधु, संत, धर्मगुरु और बाबाओं सहित आरएसएस सरीखे दक्षिणपंथी ब्राह्मणवादी संगठन हैं जिन का कारोबार और दबदबा ही ग्राहकों की संख्या पर निर्भर है. ये लोग चाहते हैं कि आबादी और बढ़े और रोज औसतन एक लाख बच्चे पैदा हों जिस से दानदक्षिणा, पूजापाठ, यज्ञहवन वगैरह का धंधा फलताफूलता रहे और पंडेपुजारियों को निचली हैसियत यानी शूद्रों सरीखे काम न करना पड़ें.  सार यह कि पुश्तैनी मुफ्तखोरों को मुफ्त के मालपुए मिलते रहें.

इस बाबत ये लोग बहुसंख्यक हिंदुओं को आएदिन उकसाते रहते हैं कि धर्म, देश और संस्कृति सब के सब सिरे से खतरे में हैं. इन्हें बचाने के लिए जरूरी है कि हिंदू ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा करें जिस से देश को इसलामिक और ईसाई देश बनने से रोका जा सके. इस बाबत एक ही थैली के चट्टेबट्टे ये लोग ऐसीऐसी मनगढ़ंत दलीलें व फर्जी आंकड़े वायरल करते हैं जिन से हर हिंदू का दिल भविष्य के बारे में सोच दहल उठता है.

इस का यह मतलब नहीं कि सभी युवा ज्यादा बच्चे पैदा करने तैयार हो जाते हैं या कुंआरे रहने का अपना इरादा छोड़ देते हैं. समझदार, बुद्धिजीवी और दूरदर्शी युवाओं पर इस नैरेटिव का कोई असर नहीं होता क्योंकि वे इन लोगों की मंशा और इरादे समझते हैं. जबकि धर्मभीरु, कमअक्ल और भयभीत लोग इन के झांसे में आने से खुद को चाह कर भी रोक नहीं पाते. उन्हें यह गिल्ट फील होने लगता है कि आज हम ने शादी कर बच्चे पैदा न किए तो कल को धर्म और देश के गुनाहगार और पापी हम ही होंगे और भगवान हमें कभी माफ़ नहीं करेगा. और तो और, हमें मोक्ष भी नहीं मिलेगा.

हिंदू युवाओं से ज्यादा बच्चे पैदा करवाने की परवान चढ़ती मुहिम में हैरानी की बात यह है कि वे लोग अव्वल हैं जो खुद शादी कर घरगृहस्थी का झंझट मोल नहीं लेते. इन में भी अव्वल हिंदू हितैषी संगठन आरएसएस है जिस से जुड़े सक्रिय लोग कुंआरे रहते हैं. इस के बाद नंबर उन बाबाओं का आता है जिन्होंने धर्म के धंधे के दम पर अपना अरबोंखरबों का साम्राज्य खड़ा कर लिया है.

अब भला ये लोग क्यों चाहेंगे कि भविष्य के ग्राहक कम हों. लिहाजा, अपनी कथाओं और प्रवचनों में ये कभी यह नसीहत नहीं देते कि उतने ही बच्चे पैदा करो जितने कि पाल सको या फिर इस बात पर खामोश रहते हैं कि अगर हमारे जैसी ऐशोआराम की, बिना रोकटोक वाली जिंदगी जीना चाहते हो तो शादी कर घरगृहस्थी के झंझट में ही मत पड़ो.

 जिएं अपनी मरजी से

धार्मिक दुकानदारों की खुदगर्जी से परे अपनी जिंदगी से जुड़े अहम फैसले लेने वाले युवाओं के दिलोदिमाग में ही दरअसल कुछ कर गुजरने का जज्बा है. यही जनरेशन और यही क्लास है जो चीन, अमेरिका और जापान सरीखे देशों को चुनौती दे सकती है. यह तभी मुमकिन है जब हर कोई अपनी मरजी से जिए. एक कडवा सच यह भी है कि अपनी मरजी से जीना हर किसी के लिए आसान नहीं क्योंकि धर्म के उसूलों में बंधा समाज इस की इजाजत नहीं देता.

आदमी के पैदा होते ही उस पर उम्मीदों और जिम्मेदारियों का बोझ लाद दिया जाता है कि तुम्हें यह करना है, वह करना है, यह बनना है, वह बनना है, ढेर सा नाम और पैसा कमाना है, खानदान का नाम रोशन करना है, अपनी एक अलग पोजीशन बनाना है, रसूख और रुतबा हासिल करना है वगैरहवगैरह. लेकिन इस से भी अहम बात यह कि वक्त पर शादी कर गृहस्थी बसा लेना है.

इन तमाम नसीहतों की पैदाइश मूलतया धर्म की देन है. हालांकि, एक हद तक प्राकृतिक वजहें भी इस की जिम्मेदार हैं जिन के चलते मानव ने परिवार और समाज के वजूद को आकार दिया. असुरक्षा से बचने के लिए लोगों ने समूह के जिस कौन्सैप्ट को अपनाया अब वही अगर जिंदगी को असुविधाजनक और तकलीफदेह बनाने लगा है तो उसे बड़े पैमाने पर छोड़े जाने का भी दौर शुरू हो गया है.

मौजूदा दौर एडवांस टैक्नोलौजी का है जिस ने अकेले रहना बेहद सहूलियत वाला काम बना दिया है. लेकिन इस का यह मतलब नहीं कि कुंआरे या अकेले रहने वाले लोग खुदगर्ज होते हैं. दुनिया में आए हो तो धर्म और समाज के लिए कुछ जिम्मेदारियां बनती हैं जैसी मानसिकता दरअसल एक बहुत बड़ी साजिश है जिस का मकसद लोगों को उन की मरजी से न रहने देना है. हर वह आदमी जो अकेला रहता है, दूसरों के मुकाबले ज्यादा जिम्मेदार होता है क्योंकि उस पर पारिवारिक दबाव नहीं होते.

इस का यह मतलब नहीं कि वह निरंकुश, उन्मुक्त यानी आवारा टाइप होता है. हकीकत में वह कायदेकानूनों में रहते व्यक्तिगत स्वतंत्रता से रह और जी रहा होता है. यह कोई हर्ज की बात भी नहीं. आंकड़े गवाही देते हैं कि दुनियाभर में अकेले रहने का चलन तेजी से बढ़ रहा है. इस में हैरानी की बात यह कि जिस देश में लोग ज्यादा तादाद में अकेले रह रहे हैं वह ज्यादा सुखी, समृद्ध और खुशहाल है.

 यह है दुनिया का हाल

किस तेजी से लोग घरगृहस्थी के झंझट से बचने के लिए अकेले और अविवाहित रहने को प्राथमिकता दे रहे हैं, इस बाबत कई सर्वेक्षणों के आंकड़े आएदिन सामने आते रहते हैं. उन्हीं आकंड़ों में एक नतीजा यह भी छिपा रहता है कि जिन देशों में अकेले रहने का चलन ज्यादा अपनाया गया है वही खुद को और दुनिया को कुछ दे पा रहे हैं. इन में नौर्डिक देशों की जगह सब से ऊपर है. फिनलैंड में 48 फीसदी से भी ज्यादा लोग अकेले रह रहे हैं तो नार्वे में यह संख्या 48 छूने वाली है. स्वीडन में 46.5 फीसदी, डैनमार्क में लगभग 45 और नीदरलैंड में 40 फीसदी लोग घरगृहस्थी के झंझट को बायबाय कह चुके हैं.

अब इस तसवीर का दूसरा पहलू देखें जो न केवल दिलचस्प है बल्कि एक सबक यह भी देता है कि खुश रहने के लिए जरूरी है कि आप अपनी मरजी से रहें. किसी दबाब में गृहस्थी का बोझ सिर पर न लादें. साल 2025 की वर्ल्ड हैप्पीनैस इंडैक्स यानी विश्व खुशहाली सूची में फिनलैंड पहले नंबर पर, डैनमार्क दूसरे नंबर पर, स्वीडन चौथे नंबर पर, नीदरलैंड 5वें नंबर पर और नौर्वे ७वें नंबर पर हैं.

तीसरे नंबर पर आइसलैंड है जहाँ अकेले रह रहे लोगों की संख्या लगभग 35 फीसदी है. यानी, इन देशों के युवा न केवल ज्यादा संतोषजनक जिंदगी जी रहे हैं बल्कि एक मजबूत सामाजिक सुरक्षा में भी रह रहे हैं जिस मे धर्म का दखल न के बराबर है. गौरतलब है कि वर्ल्ड हैप्पीनैस इंडैक्स में 147 देशों का मूल्यांकन गेलप, औक्सफोर्ड वैल बीइंग रिसर्च सैंटर और दूसरी कई महत्त्वपूर्ण एजेंसियों द्वारा किया जाता है.

इस अहम सर्वे के 6 स्केल या पैमाने हैं- प्रति व्यक्ति जीडीपी, स्वास्थ्य व जीवन प्रत्याशा, उदारता, सामाजिक समर्थन, स्वतंत्रता और भ्रष्टाचार के प्रति राय. अब अगर नौर्डिक देशों को इन पैमानों पर सब से ज्यादा अंक मिलते हैं तो उस की सब से बड़ी वजह गृहस्थ जीवन के झंझट से मुक्ति के फैसले पर अमल है, न कि मोक्ष की इच्छा लिए मंदिरों, तीर्थों और धर्मस्थलों पर धक्के खाते रहना जो लोगों, खासतौर से युवाओं, को भयभीत और दुखी रखने वाली बात है.

इन देशों के सभी युवा पूरी तरह नास्तिक भी नहीं हैं लेकिन उन्हें यह एहसास है कि मरने के बाद कोई उन का श्राद्ध करे न करे, इस से उन्हें कुछ हासिल नहीं होने वाला और न ही व्रत रख कर शरीर को कष्ट देने से सुख मिलने वाला. सुख हासिल करने का सब से आसान रास्ता है घरगृहस्थी के झंझटों से मुक्ति पाना.

 यह ऐसे संभव है

गृहस्थ लोगों की न केवल पूरी बल्कि रोजरोज की जिंदगी भी परेशानियों, तनावों और दुश्वारियों से भरी रहती है. वे सुबह एक तनाव में उठते और रात को तनाव में ही सोते हैं जिस से उन की क्रिएटिव एनर्जी पर नैगेटिव असर पड़ता है. कहीं बीवीबच्चों की झंझट है तो कहीं बूढ़े पेरैंट्स की जिम्मेदारी का भार सिर पर है. इन परेशानियों का दायरा सुरसा के मुंह जैसा होता है जिस का तजरबा हर गृहस्थ को होता है और वह अकसर इन के लिए रोताझींकता भी रहता है कि शादी  कर इस जंजाल में न पड़ते तो न केवल सुखी होते बल्कि अपने और औरों के लिए कुछ कर पा रहे होते.

इन परेशानियों का भार इतना ज्यादा होता है कि लोग दफ्तरों में देर से पहुंचते हैं और वहां मन लगा कर पूरी क्षमताओं से अपना काम नहीं कर पाते. नतीजा असर जीडीपी और जहां जौब कर रहे होते हैं वहां किसी न किसी रूप में पड़ता ही है फिर चाहे वह प्राइवेट कंपनी हो या गवर्नमैंट औफिस. कर्मचारी अपना सौ तो क्या, 50 फीसदी भी नहीं दे पाता.

यह एक बहुत बड़ी वजह देश में देखने में आ रही है कि ज्यादा और बेहतर काम करने के लिए  युवा घरगृहस्थी से तोबा कर रहे हैं क्योंकि वे ज्यादा कमाना चाहते हैं और फिर सुकून से रहना भी चाहते हैं. परंपरावादियों की यह शिकायत आम है कि युवा या तो शादी ही नहीं कर रहे या फिर देर से कर रहे हैं जिस से, खासतौर से, नुकसान युवतियों को उठाना पड़ रहा है जो मां बनने के सुख से वंचित रह रही हैं.

बात अकेले मां बनने या युवतियों की चिंता में दुबलाने की नहीं है बल्कि अपनी दुकान और धंधे की है. शादी नहीं होगी तो बच्चे पैदा नहीं होंगे, बच्चे नहीं होंगे तो उन के संस्कार भी नहीं होंगे. यानी, वह फायदा भी गया जो शादी कराने पर होता और वे फायदे तो गए ही जो जिंदगीभर जेबें भरते रहते.

आदमी अगर शादी कर बच्चे पैदा करे तो वह जिंदगीभर एक नियमित अंतराल से कुछ न कुछ दानदक्षिणा देता रहता है. और तो और, मरने के बाद उस के अंतिम संस्कार और श्राद्ध वगैरह से भी जो कमाई होती वह भी मारी गई. अब तो लोग इस के लिए वारिस ही पैदा नहीं कर रहे. इसलिए लोगों को उकसाओ, उन्हें गृहस्थ जीवन का महत्त्व समझाओ कि यही असली तपस्या और प्रकृतिसेवा है जिसे नहीं किया, तो क्या किया.

इधर, युवा भी कमर कस कर तैयार हैं कि कितना ही और किसी भी तरह का होहल्ला मचा लो, हम तुम्हारे बिछाए जाल में फंसने वाले नहीं. हमें अपनी आजादी और सुख प्यारे हैं. हमें रोज सुबह की कलह और तूतू मैंमैं नहीं चाहिए जो सोते वक्त भी पीछा नहीं छोडती. हम रात 12 बजे सोएं या सुबह 4 बजे सोएं, इस में कोई टोकाटाकी मंजूर नहीं. हम 8 बजे उठें या 10 बजे उठें, यह अब हम अपनी सहूलियत से तय करेंगे.

महानगरों से शुरू हुई यह लाइफस्टाइल अब बी टियर शहरों में भी पसर रही है. इस की बड़ी वजह टैक्नोलौजी और उस से मिल रही सहूलियतें भी हैं. जरूरत की हर चीज बाजार में उपलब्ध है और उस की होम डिलेवरी भी हो रही है.

इस होड़ और दौड़ में युवतियां युवकों से उन्नीस नहीं हैं. नोएडा की एक प्राइवेट कंपनी में लगभग 25 लाख रुपए सालाना के पैकेज पर नौकरी कर रही भोपाल की वर्तिका के मुताबिक अलगअलग रह रहीं हम 6 सहेलियां हर तीसरे महीने कहीं न कहीं घूमने निकल जाती हैं और खूब मौजमस्ती करती हैं. कई बार बौयफ्रैंड भी साथ होते हैं.

वर्तिका 34 साल की हो चुकी है और खासी सेविंग्स और इन्वैस्ट भी कर चुकी है लेकिन शादी का उस का कोई इरादा नहीं है. मां बनने का तो कतई नहीं. वह इस मिथक को नहीं मानती कि मां बनना स्त्री जीवन की सार्थकता और पूर्णता है. पेरैंट्स जोर देदे कर रह गए लेकिन वह आजादी छोड़ने की शर्त पर गृहस्थी के बंधन में बंधने को तैयार नहीं. बकौल वर्तिका, यह गले में ढोल लटकाने जैसी बात है जिस का वजन और शोर गले, दिमाग और कानों को जिंदगीभर बरदाश्त करना पड़ेगा.

बात इस लिहाज से ठीक है कि एक बार गृहस्थ जीवन में घुस गए तो उस से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं होता. यह अभिमन्यु वाले चक्रव्यूह सरीखा है जिस से बहार निकलने के जो रास्ते हैं वे बहुत तकलीफदेह हैं, मसलन पटरी न बैठने पर आसानी तो क्या, मुश्किल से भी तलाक न मिलना और हमेशा एक असहज व अपमानजनक स्थिति में रहने को मजबूर होना.

देश में यह चलन अभी परवान चढ़ रहा है कि युवा अकेले बिना शादी और बच्चों व घरगृहस्थी के बगैर रहना पसंद कर रहे हैं. तो तय है, वे सिर्फ अपने बारे में नहीं बल्कि देश के बारे में भी सोच रहे होते हैं कि इस की तरक्की में उत्पादकता बढ़ा कर हम अपना योगदान किस तरह से देंगे. New Generation

 

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