Social Media: 14 जनवरी मकर संक्रांति की सुबह 40 वर्षीया सौफ्टवेयर इंजीनियर रमीला मोबाइल में इंस्टाग्राम पर स्क्रौलिंग कर रही थी कि तभी उसे अनिरुद्धाचार्य जी की एक रील दिखी जिस में वे कह रहे थे, ‘आज कई सालों बाद ऐसा संयोग आया है कि एकादशी और मकर संक्रांति एकसाथ पड़े हैं. यह महासंयोग बहुत कम आता है. भले ही आज के दिन खिचड़ी बनती है और खिचड़ी का ही दान किया जाता है लेकिन एकादशी होने के कारण चावल का खाना और दान करना दोनों ही वर्जित है.’ उस रील को देखते ही रमीला ने उस दिन का अपना दिन का मेन्यू तो चेंज किया ही, साथ ही, अपनी बहनों और सहेलियों को भी इस शुभ सूचना से अवगत कराया जिस से उन्होंने भी उस दिन चावल का उपयोग नहीं किया.

एक युवा बैंककर्मी नमिता गुरुवार को काला, शनिवार को नीला और बुधवार को लाला रंग का आउटफिट ही पहनती है. उस ने प्रसिद्ध संत आचार्य विजयानंद जी की रील में देखा था कि दिन के अनुसार वस्त्र धारण करने से बिगड़े काम बनते हैं और हर दिन सब अच्छा ही अच्छा होता है. नमिता कहती है, ‘जब इतने बड़े संत हैं, इतने लोग उन की कथाओं में जाते हैं तो उन की बातों में कुछ सत्यता तो होगी ही न. कपड़े तो पहनने ही हैं तो क्यों न उन के बताए अनुसार ही पहन लें. शायद, कुछ अच्छा हो जाए.’

प्रदीप मिश्रा अपनी एक रील में जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए प्रतिदिन शिव मंदिर में जा कर शिवजी के दर्शन करना अनिवार्य बताते हैं. सिविल इंजीनियर और अपने पिता की कंपनी को संभालने वाले 38 वर्षीय कुश ने जब से उन की रील को देखा है वह सुबह मंदिर में शिवजी के दर्शन कर के ही कुछ खाता है.

टूर के दौरान यदि उसे मंदिर नहीं मिल पाता तो मंदिर में दर्शन करने तक वह भूखा ही रहता है. वह कहता है, ‘कइयों बार ऐसा हुआ है कि मैं किसी कारण से मंदिर नहीं जा पाया तो उस दिन मेरा एक भी काम नहीं बना. इसीलिए मंदिर जाने पर मन में विश्वास रहता है कि आज का दिन अच्छा ही जाएगा और सारे काम अच्छी तरह संपन्न हो जाएंगे.’

30 वर्षीया युवा इंजीनियर और एक मल्टीनैशनल कंपनी में काम करने वाली अहाना सोमवार और गुरुवार का व्रत करती है और शाम को औफिस से आ कर पूजा कर के ही भोजन करती है. यही नहीं, नोएडा जैसे महानगर में रहने के बाद भी वह एकादशी और चतुर्थी का व्रत रखना नहीं भूलती. चौथ और एकादशी की कथा सुन कर ही वह अपना व्रत खोलती है. अपनी इस दिनचर्या के कारण वह 2 बार बीमार हो चुकी है. डाक्टर ने हीमोग्लोबिन भी कम बताया है. इस बावत वह कहती है, ‘बचपन से मां को करते देखा और उन के साथ ख़ुद भी किया. सो, अब यदि मैं किसी दिन भूल जाती हूं तो मन में कुछ अनिष्ट होने का भय सा समाया रहता है.’

सोशल मीडिया के इस युग में किसी भी कंटैंट के वायरल होते देर नहीं लगती जिस से वह बात आम जनता के पास बहुत आसानी से पहुंच जाती है. आजकल सोशल मीडिया पर धार्मिक रील्स की भरमार है. हर उम्र के भगवाधारी साधुसंत अपनी बात को आम जनता तक रील्स के माध्यम से पहुंचाने के लिए बड़ीबड़ी टीम्स हायर करते हैं जिस से पांडालों में प्रवचनों और कथाओं के माध्यम से कही और सुनाई गईं उन की ही बातों को 15 से 20 मिनट के लौंग वीडियो और 3-3 मिनट की हजारों रील्स बना कर सोशल मीडिया प्लेटफौर्म्स पर एकसाथ अपलोड कर दिया जाता है.

एकएक रील और वीडियो पर हजारोंलाखों की संख्या में आए व्यूज और सब्सक्राइबर पर ही उन की कमाई निर्भर रहती है. एआई के इस युग में एआई जनित रील्स की भी भरमार है जिन में अधिकांश बातें फेक होती हैं. कुछ समय पहले समाज के साधुसंतों को भी अपनी बात आम जनता तक पहुंचाने के लिए लोगों के अनुभवों और माउथ पब्लिसिटी पर ही निर्भर रहना पड़ता था परंतु आज तकनीक का युग है जिस में किसी भी बात को एक मिनट के अंदर देश ही नहीं, विश्व के किसी भी हिस्से में पहुंचाया जा सकता है. आज के युवा पूरी तरह मोबाइल की गिरफ्त में हैं. दिन के 4 से 5 घंटे वे मोबाइल पर रील्स देखने में व्यतीत करते हैं. अन्य कंटैंट के साथ ही धार्मिक कंटैंट पर बनी रील्स भी उन की दिनचर्या का एक महतत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी हैं जिन में वे अपने जीवन की अधिकांश समस्यायों का हल खोजने का प्रयास करते हैं.

3-3 मिनट की ये धार्मिक रील्स उन की तार्किक क्षमता को नष्ट कर के पूरी तरह से उन का ब्रेन वाश कर रही हैं. यही नहीं, इन रील्स को देख कर ये तथाकथित मौडर्न युवा अपना भविष्य और वर्तमान दोनों ही बरबाद कर के धार्मिकता के अंधें कुएं में धंसते चले जा रहे हैं. खाटू श्याम बाबा आजकल देश के हर युवा की पहली पसंद हैं. उन की एक रील जिस पर लगभग डेढ़ करोड़ व्यूज हैं, कहा जा रहा है, ‘खाटू श्याम जाने से पहले 3 बातें जरूर जान लीजिए. पहली, बाबा का मुख दर्शन करने का सब से अच्छा और फलदाई समय सुबह के साढ़े 4 बजे से 12 बजे तक का है.

फिर भी, रात को 8 बजे से पहले दर्शन ज़रूर कर लेने चाहिए. दूसरा, अपनी कोई मांग या इच्छा पूरी करवानी है तो उन के चरणों में गुलाब का फूल, चादर और चूरमा अर्पित करें और यदि आप उन के परिसर में ‘हारे का सहारा, खाटू श्याम हमारा’ 5 बार बोल देते हैं तो बाबा जी बिना बोले ही आप की समस्या का समाधान कर देते हैं. इस तरह की रील्स देख कर झुंड के झुंड में युवा खाटू श्याम जा रहे हैं, ‘हारे का सहारा खाटू श्याम हमारा’ का नारा लगा रहे हैं और जो समय अपनी पढ़ाई, कार्य, नौकरी में और जीवन को उन्नत बनाने में लगाना चाहिए वहां वे भजनकीर्तन और बाबा की सेवा में व्यतीत कर रहे हैं.

बाबाओं को समृद्ध बना रही हैं रील्स 

एक ओर जहां युवा इन धार्मिक रील्स को स्क्रौल कर के अपना कीमती समय बरबाद करते हैं वहीं साधुसंत इन से अपनी अतिरिक्त कमाई करते हैं क्योंकि सोशल मीडिया पर व्यूज, लाइक और सब्सक्राइबर से कमाई होती है.

प्रसिद्ध कथावाचक प्रदीप मिश्रा एक कथा कहने का लगभग 7 से 24 लाख रुपए, धीरेंद्र शास्त्री 3 से साढ़े 3 लाख रुपए, वहीं अनिरुद्धाचार्य एक दिन की कथा का 1 से 3 लाख और 7 दिन की कथा का 10 से 15 लाख रुपए तक लेते हैं. जगह, कथा की अवधि और आयोजनकर्ता के अनुसार इस में बढ़ोतरी भी हो जाती है. इस शुल्क के अलावा ये प्रसिद्ध कथावाचक कथा में आए चढ़ावे से भी अपनी जेबें भरते हैं, वहीं दूसरी तरफ़ सोशल मीडिया पर आए व्यूज से अपने बैंक अकाउंट को समृद्ध करते हैं.

युवाओं को अपना जो समय अपने जीवन की बेहतरी के लिए उत्पादक कार्यों में लगाना चाहिए वही वे इन में बरबाद कर के अपनी ही उन्नति पर प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं. उन्हें यह सोचना होगा कि आज की गई उन की मेहनत ही उन के भविष्य को सुनहरा बनाएगी. बाबाओं और आचार्यों की रील्स देखने में बिताया गया समय उन्हें खोखला कर रहा है और बाबाओं को समृद्ध.

सोचने की क्षमता का हनन 

विभिन्न अध्ययनों के अनुसार सोशल मीडिया पर देखा गया कंटैंट कुछ समय बाद ही आप की मैमोरी से समाप्त हो जाता है. रील्स और शौर्ट्स का एल्गोरिदम ही इस प्रकार का होता है कि आप को जो पसंद है वही कंटैंट वह बारबार दिखता है. स्क्रौलिंग करते समय आप एक के बाद एक लगातार रील्स देखते जाते हैं जिस से किसी भी कंटैंट का स्थायी प्रभाव आप के मस्तिष्क पर नहीं रहता और आप की सोचनेसमझने व विश्लेषण करने की क्षमता प्रभावित हो जाती है. साथ ही, दूसरों को देख कर तनाव और चिंता जैसे इश्यूज भी होने लगते हैं.

यही नहीं, कई बार तो एक ही विषय पर इतने अधिक विविध जानकरी वाले कंटैंट होते हैं कि आप सही और ग़लत का भेदभाव तक नहीं कर पाते. रील्स को देखने का असर आप के जीवन के अन्य क्षेत्रों में भी दिखाई देने लगता है जिस से आप अपनी जौब और घर पर भी फोकस नहीं कर पाते.

समय का दुरुपयोग 

रील्स देखने में 10 मिनट का समय कब एक घंटे में बीत जाता है, यह रील देखने वाले को पता ही नहीं चलता क्योंकि भले ही आप एक रील देख रहे हों परंतु मेटा का एल्गोरिदम ही ऐसा है जिस में एक के बाद एक उसी विषय का कंटैंट आप के सामने अपनेआप ही आता जाता है और आप उसे देखते जाते हैं जिस से मिनटों का समय कब घंटों में बदल जाता है आप को पता नहीं चलता. इस तरह आप रील बनाने वाले को व्यूज और लाइक्स का लाभ दे रहे हैं जबकि अपने कीमती समय को बरबाद कर रहे हैं.

बढ़ रहा अंधविश्वास 

आजकल सोशल मीडिया पर धार्मिक प्रवचनों और पूजापाठ के कंटैंट की भरमार है. किसी में ये दिन के अनुसार वस्त्र धारण करना सफलता का राज बताते है, तो कहीं पर नित्य स्नान कर के पूजा कर के अन्न ग्रहण करने से पुण्य मिलने की बात कहते हैं, तो कहीं पर एकादशी को चावल और शुक्रवार को खट्टा खाना वर्जित बताते हैं. किसी की कुंडली में मंगल दोष, किसी की में काल सर्प दोष तो किसी पर शनि का भारी होना बता कर युवाओं को भ्रमित कर देते हैं.

आश्चर्य की बात यह है कि हर रील के कौर्नर में इन पंडितों का नंबर मेंशन रहता है ताकि इन दोषों का प्रभाव समाप्त करवाने के लिए युवा इन से संपर्क कर सकें. एक तरह से वे अपनी स्ट्रेटजी में सफल भी हो जाते हैं क्योंकि जब एक बेरोजगार युवा अपनी कुंडली उन्हें भेजता है तो वे उस में विभिन्न दोष बताते हैं और फिर उस के निराकरण के लिए खासा शुल्क वसूलते हैं जिस से उन की तो कमाई हो जाती है पर बेचारा बेरोजगार युवा न नौकरी पाता है और न अपनी स्थिति में कोई सुधार बल्कि अपने मातापिता की गाढ़ी कमाई और बाबा जी को दे बैठता है.

न  केवल अल्पशिक्षित बल्कि वैल एजूकेटेड युवा भी जीवन की विभिन्न समस्याओं को पंडितों के बताए दोषों से जोड़ कर उन के समाधान के लिए उन से संपर्क करते हैं. आज का युवा इन धार्मिक रील्स से इतना अधिक प्रभावित हो जाता है कि वह इन रील्स में बताए गए उपायों को ही जीवन की समस्त समस्याओं का समाधान मानने लगता है. उसे लगता है कि इन उपायों को करने से ही उस की जिंदगी की गाड़ी उन्नति के पथ पर अग्रसर होगी.

धैर्य और एकाग्रता की कमी  

सोशल मीडिया पर हर कोई खुद को बेहद खुश और संतुष्ट दिखाता है जिस से युवाओं में फोमो (फियर औफ़ मिसिंग) की प्रवृत्ति बढ़ रही है. वे दूसरों को देख कर ख़ुद में कमियां देखना प्रारंभ कर देते हैं. कई बार तो यह फोमो इतना बढ़ जाता है कि युवा अपने जीवन से असंतुष्ट हो कर अपना जीवन ही समाप्त कर लेते हैं. इसी धैर्य की कमी के कारण युवा परस्पर धार्मिक झगड़े कर बैठते हैं. धार्मिक रील्स के कारण ही युवा आपस में धार्मिक भेदभाव करने लगते हैं.

रील्स नहीं रियलिटी में जीने की जरूरत है 

भले ही सोशल मीडिया पर कितने ही कंटैंट की भरमार हो लेकिन जिंदगी कभी फैंटेसी या कल्पना से नहीं चलती. यह केवल और केवल यथार्थ के धरातल पर ही चलती है. कोई भी साधुसंत आप के जीवन की समस्यायों को हल नहीं कर सकता और न ही आप को किसी भी शौर्टकट से सफलता दिलवा सकता है क्योंकि अपने जीवन की समस्याओं का हल इंसान ख़ुद ही कर सकता है. सफलता का कोई शौर्टकट नहीं होता. इसे प्राप्त करने के लिए कड़ी मेहनत और खुले दिमाग़ की आवश्यकता होती है.

स्किल में दक्षता है जरूरी 

धार्मिक रील्स जहां अंधविश्वासी और फैंटेसी में जीना सिखाती हैं वहीं उसी समय में सीखी गई कोई स्किल जीवन में आगे बढ़ने के अवसर प्रदान करती है. सो,  साधुसंतों की ही नहीं, किसी भी प्रकार की रील्स को देख कर अपना समय बरबाद करने की अपेक्षा कोई नया हुनर सीखने का प्रयास करना जरूरी है ताकि जीवन निरंतर प्रगति के पथ पर अग्रसर होता रहे.

दिल नहीं, दिमाग से सोचें

विचारणीय प्रश्न यह है कि आज आप जो भी कर रहे हैं वह अपनी मेहनत के बलबूते पर ही कर रहे हैं. फिर कोई भी साधु या संत आप के जीवन की समस्या का हल कैसे कर सकता है. कोई भी वस्त्र या पूजा आप को नौकरी में प्रमोशन या सैलरी का पैकेज नहीं बढ़ा सकती. तो फिर रील्स देख कर अपना समय बरबाद करने और पंडितों के व्यूज बढ़ाने की क्या आवश्यकता.

भेड़चाल के पीछे भागने की अपेक्षा जरूरत है दिमाग और लौजिक का प्रयोग कर के यह विचार करने की कि क्या सच में ये साधुसंत या उन के प्रवचन आप का भला कर सकते हैं या क्या उन के द्वारा कही गई बात तर्कसम्मत है. उदाहरण के लिए अनिरुद्धाचार्य जी अपनी एक रील, जिस पर लाखों की संख्या में व्यूज हैं, में एकादशी को चावल न खाने का बड़ा ही हास्यास्पद कारण बताते हैं. उन के अनुसार, ‘एकादशी सारे पापों का नाश करने के लिए प्रकट हुई थीं और चावल के एक खेत ने पापों को अपने खेत में पनाह दे दी. इस से रुष्ट हो कर एकादशी ने चावलों को शाप दे दिया था. इसीलिए एकदशी के दिन चावल खाने से पाप लगता है.’

आज जब इंसान मंगल ग्रह पर बस्ती बसाने की योजना बना रहा है, जब एआई इंसानी दिमाग़ को भी मात दे रहा है, जब विज्ञान और आधुनिक तकनीक के सहारे कैंसर जैसी बड़ी बीमारियों पर निरंतर नए शोध किए जा रहे हैं तब आचार्य जी की चावल के खेत में पापों को पनाह देने की बेतुकी बात केवल जनता को बेवक़ूफ़ बनाने के अलावा कुछ नहीं है. आश्चर्य इस बात का है कि उन की कही बात पर शिक्षित युवा बिना सोचेसमझे भरोसा कर रहा है और एकादशी पर चावल नहीं खा रहा.

सही मायनों में बनें आधुनिक 

आमतौर पर आधुनिक होने का तात्पर्य मौडर्न और बदनउघाड़ू कपड़े पहनने, घर को आधुनिक गैजेट्स से भर लेने या फिर टीवी पर इंग्लिश मूवीज को देखना मान लिया जाता है परंतु यह केवल मौडर्न होने का दिखावा करना है. यदि आज हम सदियों पुराने या अपनी दादीनानी के टाइम के आउटफिट्स नहीं पहनते, उन के समय के तौरतरीकों से नहीं जीते, घरों में दीये और लालटेन से रोशनी नहीं करते तो फिर उस जमाने के अंधविश्वासों को छाती से चिपकाने से क्या लाभ.

धार्मिक रील्स में परंपरा का वास्ता दे कर तमाम व्रतउपवास करने की बात की जाती है लेकिन जब घर के इंटीरियर और पहनावे में आधुनिकता का पालन किया गया तो पुरांतनपंथी सोच को अपनाने का क्या तात्पर्य है. हमारी दादी, नानी या मम्मी करती आई हैं, यह सोच कर थोथे व्रत, उपवास और पूजा करने के स्थान पर अपनी सोच को वैज्ञानिक और तार्किक बनाने की आवश्यकता है.

समय का सदुपयोग है जरूरी 

आजकल शहरों में अधिकांश वर्किंग कपल्स होते हैं जिन के पास समय का अभाव होता है. ऐसे में धार्मिक रील्स देख कर अंधविश्वासी बनने और अपना समय बरबाद करने की अपेक्षा कुछ प्रोडक्टिव काम करें, अपने परिवार या दोस्तों को समय दें ताकि अड़ोसपड़ोस में कुछ व्यवहार बन सके और वक्तमुसीबत में वे आप के काम आ सकें या फिर कोई हाउबी को परस्यू करें जो आप को मानसिक शांति और सुकून देगी.

हर दिन मंदिर जा कर भगवान के दर्शन करने की अपेक्षा उस समय में अपने मातापिता से मिलें और यदि दूर रहते हैं तो फ़ोन पर उन के हालचाल लें ताकि वे अपनी संतान और परवरिश पर गर्व कर सकें. यकीन मानिए, उन के चेहरे की खुशी आप के बिगड़े काम बना देगी. Social Media

 

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