Cockroach Janata Party: कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) और मोदी सरकार के बीच टकराव खत्म होता नहीं दिख रहा है. जंतर-मंतर पर छात्रों का आंदोलन थमा जरूर है, लेकिन अब लड़ाई सड़कों से निकलकर पुलिस कार्रवाई, एफआईआर और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बीच उलझ गई है. सीजेपी का आरोप है कि सरकार अदालत के आदेश में मौजूद एक अपवाद को ढाल बनाकर आंदोलनकारी छात्रों पर दबाव बनाए रखना चाहती है और जो युवा आंदोलन के दौरान हिरासत में लिए गए हैं उन्हें रिहा नहीं करना चाहती है.
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि हाल के प्रदर्शनों में शामिल लोगों के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई न की जाए. मगर साथ ही अदालत ने यह भी कह दिया कि आपराधिक रिकॉर्ड वाले लोगों को इस राहत का लाभ नहीं मिलेगा. सीजेपी ने इस बिंदु पर सवाल उठाये हैं. सीजेपी प्रवक्ता सौरव दास का कहना है कि क्या अब सरकार हर आंदोलनकारी की पुरानी फाइल खंगालकर उसे “अपराधी” बताने और आंदोलन से जुड़ी एफआईआर को जिंदा रखने का रास्ता तलाशेगी?
सौरव दास का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश का राजनीतिक इस्तेमाल नहीं होना चाहिए. अगर किसी व्यक्ति के खिलाफ पहले से गंभीर आपराधिक मामला था और वह जमानत पर बाहर था, तो पुलिस पहले ही उसकी जमानत रद्द कराने अदालत क्यों नहीं गई? आंदोलन में शामिल होने के बाद अचानक उसका पुराना रिकॉर्ड इतना महत्वपूर्ण क्यों हो गया?
यह सवाल इसलिए भी अहम है क्योंकि सरकार और आंदोलनकारियों के बीच बातचीत में भरोसा दिलाया गया था कि छात्रों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होगी. सीजेपी के मुताबिक 25 जुलाई को केंद्रीय मंत्रियों जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह के साथ हुई बातचीत में भी यही आश्वासन मिला था. अगर इसके बाद भी छात्रों को पूछताछ, हिरासत या गिरफ्तारी के डर में रखा जाता है, तो सरकार को बताना होगा कि बातचीत में दिए गए आश्वासन की आखिर कीमत क्या है?
सोशल मीडिया पर छात्रों को हिरासत में लिए जाने या पूछताछ के लिए उठाए जाने के काफी वीडियो वायरल हैं. सुप्रीम कोर्ट ने भी मामले को हल्के में नहीं लिया है. नाबालिगों की रिहाई का निर्देश देने के साथ अदालत ने पुलिस की ज्यादतियों के आरोपों पर निष्पक्ष जांच की जरूरत बताई है. दिल्ली समेत कई राज्यों को नोटिस जारी किए गए हैं और सीसीटीवी फुटेज, ड्रोन रिकॉर्डिंग, वायरलेस संचार तथा दूसरे रिकॉर्ड सुरक्षित रखने का आदेश कोर्ट ने दिया है. यानी अदालत भी चाहती है कि बाद में कोई यह न कह सके कि सबूत गायब हो गए.
इस पूरे विवाद में सबसे गंभीर सवाल उस पत्थरों से भरे ट्रक का है, जिसे धरनास्थल पर लाकर खड़ा करने का आरोप सीजेपी ने दिल्ली पुलिस पर लगाया था. न्यूज़लॉन्ड्री की एक रिपोर्ट के मुताबिक जंतर-मंतर के पास मिला ट्रक प्रदर्शन से पहले कई दिनों तक पुलिस द्वारा जब्त वाहनों में शामिल था. ऐसे में यह सवाल बेहद गंभीर है कि जब्त वाहन प्रदर्शन स्थल के पास कैसे पहुंचा? किसके आदेश पर पहुंचा? और वहां पत्थरों से भरा ट्रक रखने की जरूरत क्या थी? पुलिस ने उसे वहां से हटाया क्यों नहीं?
गौरतलब है कि लोकतंत्र में सरकार की जिम्मेदारी है कि वह असहमति को अपराध की तरह न देख कर उसका जवाब दे. प्रदर्शन में हिंसा करने वाले किसी व्यक्ति पर कानून लागू होना चाहिए, लेकिन किसी शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी को सिर्फ इसलिए डराना कि उसने सत्ता से सवाल पूछा, लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करता है.
सीजेपी ने साफ चेतावनी दी है कि छात्रों को डराने, धमकाने या हिरासत में लेने का सिलसिला अगर जारी रहा तो आंदोलन फिर शुरू होगा. और इस बार देशव्यापी आंदोलन होगा. जंतर-मंतर फिलहाल शांत है, लेकिन छात्रों के सवाल धधक रहे हैं. ऐसा न हो कि पुलिस कार्रवाइयां आग में घी डाल कर इसे विस्फोटक बना दें. वो हालात न देश के लिए ठीक हैं और न मोदी सरकार के लिए. Cockroach Janata Party





