Crime Story: नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) ने औपरेशन रेड पिल के दौरान गुजरात के मुंद्रा बंदरगाह पर 227.7 किलोग्राम कैप्टागौन टेबलेट्स जब्त कीं, जिस की कीमत लगभग 182 करोड़ रुपए थी. इस काररवाई में एक सीरियाई नागरिक सहित कई लोगों को गिरफ्तार किया गया और उत्तर प्रदेश का आरिफ भी इसी नेटवर्क का हिस्सा होने के कारण पुलिस के हत्थे चढ़ गया.

आरिफ उत्तर प्रदेश का एक पढ़ालिखा, लेकिन बेरोजगार युवक था. उस के पिता ईरिक्शा चला कर परिवार का गुजारा करते थे और मां चाहती थी कि बेटा सरकारी नौकरी कर के परिवार की गरीबी दूर करे. लगातार प्रतियोगी परीक्षाओं का बारबार टालना, पेपर लीक होना, उन में असफलता, आर्थिक तंगी और समाज के तानों ने आरिफ को भीतर से तोड़ दिया. आज करोड़ों युवा इसके शिकार हैं. सरकार घंटियां बजा रही है. इसी मानसिक कमजोरी का फायदा समीर नाम के एक व्यक्ति ने उठाया, जो बाहर से समाजसेवी दिखाई देता था, लेकिन वास्तव में एक खतरनाक नेटवर्क से जुड़ा था. वह बेरोजगार युवकों को पैसे, सहानुभूति और झूठे सपने दिखा कर अपने जाल में फंसाता था.

समीर ने आरिफ को अपने साथ जोड़ लिया. धीरेधीरे उसे महंगे कपड़े, मोबाइल और खर्च के लिए पैसे मिलने लगे. फिर एक दिन वह उसे एक बंद पड़ी फैक्ट्री में ले गया, जहां कई युवक पहले से मौजूद थे. वहां आरिफ को कैप्टागौन नामक नशीली गोली दी गई. शुरुआत में इसे थकान मिटाने वाली दवा बताया गया, लेकिन यह अत्यंत खतरनाक सिंथेटिक ड्रग थी. पहली ही गोली के बाद आरिफ को असामान्य ऊर्जा, आत्मविश्वास और भयहीनता का अनुभव हुआ. जल्द ही वह इस का आदी बन गया. नशा न मिलने पर उसके हाथ कांपने लगते, सिर में तेज दर्द होता और वह हिंसक व्यवहार करने लगता.

नशे की गिरफ्त में आने के बाद समीर और उसके साथी आरिफ का मानसिक रूप से भी ब्रेनवौश करने लगे. उसे भड़काऊ भाषण सुनाए गए, नफरत फैलाने वाले वीडियो दिखाए गए और धीरेधीरे उस के भीतर से मानवीय संवेदनाएं खत्म होने लगीं.

कैप्टागौन को दुनिया भर में जेहादी ड्रग या आतंकी ड्रग कहा जाता है. यह केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को तीव्र रूप से उत्तेजित करता है, जिस से व्यक्ति में असामान्य ऊर्जा, आक्रामकता और भय समाप्त हो जाता है. आतंकवादी संगठन अपने लड़ाकों को हमलों से पहले यह ड्रग देते हैं, ताकि वे बिना सोए, बिना खाए और दर्द की परवाह किए बिना लंबे समय तक लड़ सकें.

कैप्टागौन का विकास 1961 में जर्मनी में एक वैध दवा के रूप में हुआ था, लेकिन इस के गंभीर दुष्प्रभावों के कारण 1986 में इस पर प्रतिबंध लगा दिया गया. बाद में इस का अवैध रूप सामने आया, जिसे गैरकानूनी प्रयोगशालाओं में एम्फेटामिन, कैफीन और अन्य रसायनों से तैयार किया जाने लगा. इसलामिक स्टेट (आईएस) और हमास जैसे आतंकवादी संगठनों द्वारा इसके उपयोग के कई मामले सामने आ चुके हैं.

आज आतंकवाद और ड्रग्स का गठजोड़ नार्को टेररिज्म के रूप में पूरी दुनिया के लिए गंभीर खतरा बन चुका है. ड्रग्स की तस्करी से मिलने वाला धन आतंकवादी संगठनों की सबसे बड़ी आर्थिक ताकत बन गया है. पश्चिमी एशिया का देश सीरिया वर्तमान में कैप्टागौन का सबसे बड़ा उत्पादन केंद्र माना जाता है, जबकि कट्टर इसलामी सऊदी अरब इस का सब से बड़ा बाजार है.

साथ ही भारत के पश्चिमी तटीय क्षेत्र, विशेष कर कच्छ और मुंद्रा बंदरगाह, अंतरराष्ट्रीय ड्रग्स तस्करी के बड़े केंद्र के रूप में उभर रहे हैं. हाल के वर्षों में यहां से करोड़ों और हजारों करोड़ रुपए मूल्य की कोकीन तथा अन्य नशीले पदार्थों की कई बड़ी खेपें पकड़ी गई हैं. इससे स्पष्ट होता है कि भारत भी अंतरराष्ट्रीय ड्रग्स नेटवर्क बन गया है.

ड्रग्स केवल नशे का माध्यम नहीं, बल्कि एक तरफ फ्रस्टेटेड युवाओं को बहकाने के लिए और दूसरी तरफ इसका डीलर बन कर आर्थिक शक्ति देने और युवाओं को मानसिक तथा शारीरिक रूप से बरबाद करने का हथियार है. लंबी कहानी मनोहर कहानियां के अगस्त अंक में पढ़ें Crime Story

लेखक – वीरेंदर बहादुर सिंह

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