CJP Protest: जंतर-मंतर से उठी युवाओं की आवाज ने शिक्षा व्यवस्था से शुरू हुई बहस को अब पूरे सिस्टम की जवाबदेही तक पहुंचा दिया है. शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को अपनी पहली जीत मान रही कॉकरोच जनता पार्टी ने साफ कर दिया है कि उसका आंदोलन यहीं थमने वाला नहीं है. न्यायपालिका, चुनाव आयोग, महिला प्रतिनिधित्व, मीडिया और दल-बदल जैसे मुद्दों पर घोषणापत्र जारी कर सीजेपी ने अब व्यवस्था की व्यापक ‘ओवरहालिंग’ का एजेंडा सामने रखा है. सवाल यह है कि क्या यह आंदोलन सत्ता के लंबे होते पंजों पर अंकुश लगाने वाली नई जनशक्ति बन पाएगा?
जंतर मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन, सोनम वांगचुक के अनशन और देश भर की सड़कों पर उतर आये जेन-जी से डर कर मोदी सरकार ने अपने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लेकर देश की शिक्षा व्यवस्था में सुधार की घोषणा तो कर दी है. मगर वह कितना सुधार करेगी, कितनी जवाबदेही तय कर पाएगी, कितने दोषियों को सजा दिला पाएगी, यह सब अभी समय के गर्भ में है.
मोदी सरकार में देश की ध्वस्त हो चुके एजुकेशन सिस्टम के खिलाफ कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके के एक आह्वान पर लाखों युवाओं का एकजुट हो जाना…… दिल्ली के जंतर मंतर पर उमड़ पड़ना ….. नीट पेपर लीक के खिलाफ एक व्यापक जन आंदोलन का शुरू होना…… पर्यावरणविद और शिक्षा सुधारक सोनम वांगचुक का आंदोलन के समर्थन में 26 दिन लंबा चला अनशन, 20 जुलाई को संसद कूच के लिए उमड़ा जनसैलाब, कॉकरोचों से बातचीत के लिए सरकार का मजबूर होना और अंततः 25 जुलाई को शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा जेन-जी की बहुत बड़ी उपलब्धि है. उन्हें बहुत बहुत मुबारकबाद. यह लड़ाई उन्होंने अपने लिए नहीं बल्कि अपने उन युवा साथियों को न्याय दिलाने के लिए लड़ी, जिन्होंने नीट पेपर लीक के बाद हताशा में अपने प्राण दे दिए. यह लड़ाई कॉकरोचों ने उन मातापिता के लिये लड़ी जिनकी जवान और होनहार संताने मोदी सरकार ने हमेशा हमेशा के लिए छीन लीं. यह लड़ाई कॉकरोचों ने आने वाली कई पीढ़ियों के लिए शुरू की है, जो इस देश का भविष्य लिखेंगे.
देशव्यापी आंदोलन के चलते सरकार आंदोलनकारियों के आगे झुकने और उनकी तमाम शर्तें मानने के लिए मजबूर हुई है. इसमें उसकी अपनी मंशा कतई नहीं थी. अगर नीट पेपर लीक पर शिक्षा मंत्री की चूलें कसने और जवाब मांगने की मोदी सरकार की अपनी कोई मंशा होती तो वह आंदोलन शुरू होने के एक हफ्ते के भीतर ही एक्शन में आ जाती, आंदोलनकारियों से मिलती, उनकी सुनती, बात करती, मगर आंदोलन के 34वे दिन, जब वो स्थिति आ गई कि लगा कहीं सरकार का तख्ता ही न पलट जाए, तब सरकार मजबूरी में झुकी और रात के साढ़े बारह बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने मोबाइल फ़ोन से युवाओं को आश्वासन देना पड़ा कि सरकार उनकी सुनेगी.
बीते 12 साल की मोदी सरकार में हर सिस्टम को जंग लग चुका है. हर सिस्टम की ओवरहालिंग की जरूरत है. चाहे वह स्वास्थ्य का मुद्दा हो, बिजली का मुद्दा हो, सड़कों का मुद्दा हो, रोजगार का मुद्दा हो, रक्षा का, पुलिस का, राष्ट्रीय जांच एजेंसियों का या निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया का. कहीं भी हालात ठीक नहीं हैं. दिल्ली के आंदोलन के साथ देश के विभिन्न हिस्सों में अनेक तरह के आंदोलन चल रहे हैं. कहीं वनों को बचाने का आंदोलन जारी है, कहीं ग्रामीण अपनी जमीनों को सरकार से बचाने के लिए आंदोलनरत हैं तो कहीं पानी के लिए हाहाकार मचा है. मगर जनता की आवाज सत्ता-मद में चूर लोगों के कानों तक नहीं पहुंच रही है. जिस मीडिया की जिम्मेदारी है कि वह जनता की आवाज को उठाये वह खुद मोदी की गोदी में बैठा है.
इन हालातों में अब तमाम मोर्चों पर जेन-जी और जेन-एल्फा को जूझना है. अगर यह आंदोलन यहीं रुक गया तो यह सरकार अपनी मनमानियां करती रहेगी, क्योंकि उसकी विचारधारा मनुवाद को अस्तित्व में लाने की है. लिहाजा युवाओं को अभी जूझना होगा. क्योंकि लोकतंत्र में इस तरह की सरकारें जो अपने आप को तानाशाह समझने की भूल कर बैठती हैं, उनकी मनमानियों पर अंकुश लगाना जरूरी है. इसलिए यह आंदोलन यहीं नहीं रुकना चाहिए.
इस आंदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि जनता के दिल से तानाशाह सरकार का डर ख़त्म हो गया. पूरे आंदोलन के दौरान जिस तरह से सोशल मीडिया और जंतर मंतर पर युवाओं के मीम्स, मजाक, म्यूजिक और नारों ने मोदी सरकार की मिट्टी पलीद की है, दिल्ली पुलिस की वीभत्स हरकतों को अनेकानेक वीडियोज के जरिये दुनिया के सामने नंगा किया है, वह सब कुछ भाजपा के इतिहास का काला अध्याय बन गया है.
कॉकरोचों के इस आंदोलन ने देश में अभिव्यक्ति की आजादी को पुनर्जीवित कर दिया है. इस आंदोलन ने बता दिया कि लोकतंत्र की असली ताकत अभी भी जनता की आवाज में है. तानाशाह चीखते रहें, गरजते रहें, बरसते रहें, कहर ढाते रहें, मगर जब जनता सीना तान कर खड़ी हो जाए तो बड़े बड़े सिंहासन डोलने लगते हैं और ‘छप्पन इंच की छाती’ सिकुड़ जाती है. इस आंदोलन के जरिये जेन-जी ने बता दिया कि हम न तो गोली से डरते हैं, न बोली से, न जेल से, न मौत से.
गौरतलब है कि जंतर मंतर के आंदोलन को कुचलने के लिए मोदी सरकार ने सारे जतन कर लिए. उसने युवाओं पर पुलिस की लाठियां चलवायीं, ऐसी लाठियां जिनमें लम्बी लम्बी लोहे की कीलें लगी हुई थी, पैलेट गन चलवाई, अश्रु गैस के गोले फिंकवाए, महिलाओं और बच्चियों के कोमल अंगों पर प्रहार किये, पुलिस ने उनके गुदाद्वार में लाठी डालने का प्रयास किया, उनके कपड़े फाड़े, पुलिस के वीभत्स कारनामों को सोशल मीडिया के जरिये प्रसारित होने से रोकने के लिए पूरे इलाके का इंटरनेट और ब्लू टूथ तक मोदी सरकार बंद करवा दिया, धरनास्थल पर खाने और पानी की सप्लाई को रोक दी, यहां तक कि शौचालय की व्यवस्था को भी ध्वस्त कर दिया, मगर युवा तब भी डंटे रहे. वे धरना-स्थल से तब तक नहीं डिगे जब तक सरकार को अपने कदमों पर झुका कर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा नहीं ले लिया.
इस आंदोलन ने एक बात अच्छी तरह समझा दी है कि पांच साल के लिए मिला बहुमत पांच साल की मनमानी का लाइसेंस नहीं होता है. लोकतंत्र में प्रधानमंत्री से लेकर ग्राम प्रधान तक हर निर्वाचित व्यक्ति जनता का प्रतिनिधि है, मालिक नहीं. इसलिए उसे जनता की बात सुननी ही होगी.
कॉकरोच जनता पार्टी ने अनेक मुद्दों पर जनता का आह्वान किया है कि वह उनसे जुड़ें और अपनी समस्याएं इस मंच पर रखें. बहुत मुमकिन है कि आने वाले समय में यह एक पोलिटिकल पार्टी में तब्दील हो जाए. फिलहाल जंतर-मंतर से उठा छात्रों और युवाओं का आंदोलन सिर्फ शिक्षा व्यवस्था की खामियों तक सीमित नहीं रहेगा. गाड़ी का एक पहिया खराब हो और आप सिर्फ उसी की मरम्मत करा लें, जबकि इंजन, ब्रेक और स्टीयरिंग सभी जवाब दे रहे हों, तो पूरी गाड़ी की ओवरहालिंग होनी जरूरी है. देश में शिक्षा, रोजगार, भर्ती परीक्षाएं, पुलिस, प्रशासन, स्वास्थ्य, न्याय और चुनाव, हर संस्था में सुधारों की जरूरत है. शिक्षा से चुनाव तक हर सिस्टम की ओवरहालिंग जरूरी है.
कॉकरोच जनता पार्टी का मेनिफेस्टो : अभी तो जंग की शुरुआत है
जंतर-मंतर से उठी आवाज अब केवल नारे, पोस्टर, मीम और धरने तक सीमित रहने का संकेत नहीं दे रही है. कॉकरोच जनता पार्टी ने अपना राजनीतिक घोषणापत्र सामने रखकर साफ कर दिया है कि वह व्यवस्था से केवल शिकायत नहीं करना चाहती, बल्कि व्यवस्था के उन हिस्सों को बदलने का दावा कर रही है जिन्हें वह सत्ता, संस्थाओं और बड़े आर्थिक हितों के गठजोड़ का प्रतीक मानती है.
इस घोषणापत्र में पांच प्रमुख वादे न्यायपालिका, चुनाव आयोग, महिला प्रतिनिधित्व, मीडिया स्वामित्व और राजनीतिक दल-बदल जैसे मुद्दों पर सीधे प्रहार हुआ है.
सवाल यह है कि क्या ये वादे संवैधानिक और कानूनी कसौटी पर टिक पाएंगे? यह अलग बहस है, लेकिन घोषणापत्र जिस राजनीतिक असंतोष को आवाज देता है, उसे समझना जरूरी है.
पहला वादा : रिटायरमेंट के बाद ‘इनाम’ की राजनीति पर ताला
कॉकरोच जनता पार्टी का पहला बड़ा निशाना न्यायपालिका से रिटायर होने के बाद मिलने वाले राजनीतिक पद हैं. पार्टी का कहना है कि सत्ता में आने पर ऐसी व्यवस्था बनाई जाएगी जिसमें रिटायर मुख्य न्यायाधीश को राज्यसभा भेजने जैसी नियुक्तियों पर रोक लगेगी.
इस वादे के पीछे मूल सवाल न्यायपालिका की स्वतंत्रता और जनता के भरोसे का है.
न्यायाधीश का फैसला केवल निष्पक्ष होना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि आम नागरिक को वह निष्पक्ष दिखना भी चाहिए. यदि सर्वोच्च संवैधानिक पद से रिटायर होने के तुरंत बाद किसी व्यक्ति को सरकार की ओर से राजनीतिक पद मिलता है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या रिटायरमेंट के बाद मिलने वाला पद पहले से मौजूद किसी समीकरण का परिणाम था?
कॉकरोच जनता पार्टी का कहना है कि वह इसके लिए स्पष्ट ‘कूलिंग-ऑफ पीरियड’ और संवैधानिक व्यवस्था चाहती है, ताकि न्यायिक पद पर बैठा व्यक्ति भविष्य की राजनीतिक नियुक्ति की संभावना से पूरी तरह स्वतंत्र रहे.
संदेश साफ है – न्याय की कुर्सी से सत्ता की कुर्सी तक सीधा गलियारा बंद होना चाहिए.
दूसरा वादा : किसी का वोट काटा तो चुनाव आयोग को जवाब देना होगा
घोषणापत्र का दूसरा वादा सबसे विस्फोटक है. पार्टी का कहना है कि किसी नागरिक का वैध वोट जानबूझकर मतदाता सूची से हटाया गया तो जिम्मेदारी केवल किसी छोटे कर्मचारी पर डालकर मामला खत्म नहीं किया जाएगा. ऐसी स्थिति में मुख्य चुनाव आयुक्त तक जवाबदेही तय करने और गंभीर मामलों में यूएपीए जैसे कठोर कानून का इस्तेमाल किया जाएगा.
पार्टी कहती है – किसी नागरिक से उसके मतदान का अधिकार छीनना लोकतंत्र की जड़ पर हमला है.
घोषणा के पीछे राजनीतिक संदेश बेहद आक्रामक है: यदि लोकतंत्र में एक वोट सरकार बनाने और गिराने की ताकत रखता है तो किसी नागरिक का वैध वोट जानबूझकर गायब करना मामूली प्रशासनिक लापरवाही मानकर क्यों छोड़ा जाए?
सीजेपी इसी सवाल को हथियार बना रही है.
तीसरा वादा : महिलाओं को 33 नहीं, सत्ता में 50 प्रतिशत हिस्सेदारी
कॉकरोच जनता पार्टी का तीसरा वादा भारतीय राजनीति की संरचना को सीधे चुनौती देता है. पार्टी का कहना है कि महिलाओं को 33 प्रतिशत प्रतिनिधित्व देने भर से बराबरी पूरी नहीं होती. जब देश की आबादी में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग आधी है तो सत्ता में उनकी हिस्सेदारी भी 50 प्रतिशत होनी चाहिए. और सीजेपी इसे केवल संसद तक सीमित नहीं रखना चाहती है.
घोषणापत्र के मुताबिक महिला प्रतिनिधित्व की यह नीति संसद से लेकर मंत्रिमंडल और अन्य राजनीतिक सत्ता-संरचनाओं तक लागू करने का लक्ष्य होगा. इससे भी दिलचस्प बात यह है कि पार्टी इसके लिए सांसदों की कुल संख्या बढ़ाने को समाधान नहीं मानती है. यानी नई कुर्सियां बनाकर महिलाओं को बैठाने के बजाय मौजूदा राजनीतिक हिस्सेदारी में बराबरी की बात की जा रही है.
अब यह देखना दिलचस्प होगा कि इस मुद्दे पर यदि कोई आंदोलन शुरू होता है तो क्या राजनीतिक दल अपने आधे टिकट महिलाओं को देने को तैयार हैं? क्या सरकार अपने मंत्रिमंडल में बराबर हिस्सेदारी देने को तैयार है?
सीजेपी का दावा है कि वह ‘महिला सशक्तीकरण’ को भाषण से निकालकर सत्ता के बंटवारे तक ले जाना चाहती है.
चौथा वादा : अंबानी-अडानी से जुड़े मीडिया समूहों की चूलें कसी जाएंगी
घोषणापत्र का चौथा हिस्सा सबसे ज्यादा विवाद पैदा कर सकता है. पार्टी ने अंबानी और अडानी समूह से जुड़े मीडिया संस्थानों के लाइसेंस रद्द करने की बात कही है ताकि स्वतंत्र मीडिया को जगह मिल सके. इसके साथ ही ‘गोदी मीडिया’ के चुनिंदा एंकरों बैंक खातों की जांच कराने का वादा भी किया गया है.
पांचवां वादा : दलबदल किया तो राजनीतिक वनवास
पांचवां वादा भारतीय राजनीति के उस खेल पर हमला है जिसमें जनता किसी उम्मीदवार को एक दल के टिकट पर चुनती है और बाद में वही जनप्रतिनिधि दूसरे खेमे में चला जाता है.
पार्टी का कहना है कि कोई विधायक या सांसद यदि दल-बदल करता है तो उसे चुनाव लड़ने से रोका जाए और अगले 20 वर्षों तक किसी सार्वजनिक पद के लिए अयोग्य घोषित किया जाए. मतदाता ने यदि किसी उम्मीदवार को एक पार्टी, विचारधारा और घोषणा-पत्र के आधार पर चुना है, तो चुनाव जीतने के बाद उसका पाला बदलना मतदाता के फैसले को पलटने जैसा है.
कॉकरोच जनता पार्टी का घोषणापत्र दरअसल स्थापित राजनीति के खिलाफ एक आरोप-पत्र है. उनके पांचों वादों को यदि एकसाथ पढ़ें तो एक साझा धागा नजर आता है – सत्ता की जवाबदेही.
न्यायपालिका के सर्वोच्च पद पर रहे व्यक्ति को रिटायरमेंट के बाद राजनीतिक पुरस्कार मिलने की आशंका हो, मतदाता सूची से नागरिक का नाम गायब हो, संसद में महिलाओं की भागीदारी कम रहे, बड़े आर्थिक घरानों का मीडिया पर प्रभाव बढ़े या विधायक रातोंरात पार्टी बदल दे, ‘कॉकरोच’ इन सभी समस्याओं को एक ही बीमारी के अलग-अलग लक्षण के रूप में देख रहा है.
मगर कॉकरोच जनता पार्टी के घोषणापत्र की असली परीक्षा उसके नारों की तीव्रता नहीं, उन वादों को संवैधानिक संस्थाओं, प्राकृतिक न्याय और नागरिक स्वतंत्रता के साथ लागू करने की क्षमता होगी.
हालांकि यह घोषणा-पत्र भारतीय राजनीति के सामने कुछ बेहद असुविधाजनक सवाल रखता है,जैसे – न्यायपालिका को सत्ता से कितनी दूर होना चाहिए? एक वोट की कीमत आखिर कितनी है? आधी आबादी को आधी सत्ता क्यों नहीं? मीडिया की स्वतंत्रता उसके मालिक से कैसे बचाई जाए? और मतदाता के जनादेश को लेकर दल बदलने वाले नेता की जवाबदेही क्यों न हो?
यदि इन सवालों पर देश में गंभीर बहस शुरू होती है, तो कॉकरोच जनता पार्टी की सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धि शायद चुनाव जीतना भी नहीं होगी. उसकी उपलब्धि यह होगी कि उसने उस आम आदमी को सवाल पूछना सिखा दिया जिसे व्यवस्था ने लंबे समय तक केवल पांच साल में एक बार वोट डालने वाला समझ रखा था.
इस आंदोलन से देश की जनता के सामने कुछ बातें बहुत स्पष्ट हो गयी है. सरकार किसी की भी हो, चाहे भाजपा की, कांग्रेस की या किसी क्षेत्रीय दल की, जनता को उससे सवाल पूछने का अधिकार हमेशा रहना चाहिए. लोकतंत्र में किसी नेता को इतना बड़ा नहीं होने देना चाहिए कि संस्थाएं उसके सामने छोटी पड़ जाएं.
दूसरा जिस तरह जेन-जी ने धरना स्थल पर पूरे महीने भूखे-प्यासे रह कर,नाच-गाकर, डंडे खा कर, मीम्स बना कर, बैनर-पोस्टरों के जरिये रोचक सवालों की झड़ी लगाकर मोदी सरकार को हैरान-परेशान किया, उसने राजनीतिक दलों को साफ़ समझा दिया है कि सत्ता को जनता से डर नहीं, बल्कि उसके प्रति जवाबदेह होना होगा.
गौरतलब है कि किसी भी सरकार की तानाशाही अचानक पैदा नहीं होती है. वह धीरे-धीरे पैदा होती है. जब जनता द्वारा सवाल पूछना कम हो जाता है, जब संस्थाओं की स्वतंत्रता कमजोर पड़ती है, जब समर्थक हर फैसले को सही बताने लगते हैं और जब जनता मान लेती है कि पांच साल में एक वोट डाल देना ही लोकतंत्र है. सत्ता में बैठा व्यक्ति अपनी हनक में, अपने अहंकार में किसी को डंडा मार कर चुप करा दे और वह आवाज उठाने की बजाय घर में घुस कर बैठ जाए तो उससे सत्ताधारी का अहंकार और बलवान होता है. यह बात जनता को समझनी चाहिए.
हम लोकतंत्र में हैं, जिसमें ‘लोक’ आगे और ‘तंत्र’ पीछे है. तंत्र लोक के प्रति जवाबदेह है. लोकतंत्र रोज चलता है. संसद में, अदालत में, मीडिया में, अस्पताल में, शैक्षणिक संस्थाओं में, विश्वविद्यालय में, सड़क पर और नागरिक के सवाल में. इसलिए किसी आंदोलन की सबसे बड़ी जीत किसी मंत्री का पद जाना नहीं बल्कि असली जीत तब होगी जब सरकारें यह समझें कि जनता को जवाब देना उनकी मजबूरी नहीं, संवैधानिक जिम्मेदारी है.
सीजेपी के प्रवक्ता आशुतोष रांका ने कहा है कि अपने वादों को लेकर अब पार्टी पूरे देश में जाएगी. सरकार यह न सोचे कि एक मंत्री का इस्तीफा हो गया तो अब हम चुप बैठ जाएंगे. हम अपने मुद्दों को लेकर बार बार जंतर मंतर पर वापस आएंगे. और शायद इसीलिए कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने मंच से नारा दिया है – ‘अभी तो जंग की शुरुआत है.’ CJP Protest





